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Maharajganj News: जंगल के पास बढ़ रहे ईंट-भट्ठे, हवा में घुल रहे जहर से हरियाली को खतरा
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निचलौल। सोहगीबरवा वन्य जीव प्रभाग अंतर्गत निचलौल वन रेंज के जंगलों से सटे ईंट भट्ठों के संचालन में नियमों की अवहेलना का मामला सामने आ रहा है। जंगल से सटे ईंट-भट्टे की चिमनियां धुआं उगल रही हैं। इन भट्ठों पर प्रदूषण से निपटने के इंतजाम तो दूर, कइयों के पंजीयन भी नहीं है। हैरान करने वाली बात यह है कि वन विभाग के जिम्मेदार भी भट्ठे संचालकों के इस कारनामे से अंजान बने हुए हैं।
जानकारी के मुताबिक, आधिकारिक तौर पर जिले में इन दिनों करीब 250 ईंट भट्ठे संचालित हो रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, वहीं गैरकानूनी तरीके से चलने वाले भट्ठों को यदि इसमें जोड़ दिया जाए तो यह संख्या करीब 350 के पार पहुंच जाएगी। ईंट भट्ठा चलाने के लिए जिला पंचायत, श्रम विभाग, प्रदूषण व खनन विभाग से अनुमति लेनी पड़ती है।
इतना ही नहीं निर्धारित समयांतराल पर इनका नवीनीकरण भी कराना पड़ता है। नियम के मुताबिक आबादी और जंगलों के आसपास कोई भी ईंट-भट्ठा नहीं खोला जा सकता, न ही यहां मिट्टी डंप की जा सकती है। ईंट की पथाई पर भी पूरी तरह रोक है लेकिन कई भट्ठे इन नियम-कायदों को दरकिनार कर रात-दिन आसमान काला कर रहे हैं।
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क्षेत्र में वन रेंज के पतौना जंगल और करमहिया से सटे जंगल के करीब ईंट भट्टे दिन-रात धुआं उगल रहे हैं। वन विभाग के जिम्मेदारों की लापरवाही इस हद तक है कि करमहिया गांव के दक्षिण सटे जंगलों के बीच के ईंट भट्टे का संचालन किया जा रहा है। जबकि वन विभाग के मुताबिक जंगल तो दूर, उससे सटे 500 मीटर के दायरे में ईंट भट्ठे का संचालन नहीं किया जा सकता। न ही मिट्टी डंप की जा सकती है।
गैर प्रांतों से आने वाले मजदूरों का नहीं है लेखा-जोखा : क्षेत्र के रहने वाले सुनील, विनोद, राजू आदि ने बताया कि भट्ठों पर नाबालिगों से कार्य कराया जाता है। लेकिन श्रम विभाग इसकी जांच नहीं करता है। अधिकतर भट्ठा संचालकों के पास श्रमिकों का लेखा-जोखा भी नहीं है। कोई घटना होने पर मालिक और विभाग पल्ला झाड़ लेते हैं। वहीं श्रम प्रवर्तन विभाग के जिम्मेदारों के मुताबिक, दूसरे प्रदेश से आने वाले मजूदरों को ठेकेदार लाते हैं। भट्ठा मालिक मजदूरों की सूचना भी नहीं देते हैं। बीच-बीच में इसकी जांच कर कार्रवाई भी की जाती है।
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जानकारी के मुताबिक, आधिकारिक तौर पर जिले में इन दिनों करीब 250 ईंट भट्ठे संचालित हो रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, वहीं गैरकानूनी तरीके से चलने वाले भट्ठों को यदि इसमें जोड़ दिया जाए तो यह संख्या करीब 350 के पार पहुंच जाएगी। ईंट भट्ठा चलाने के लिए जिला पंचायत, श्रम विभाग, प्रदूषण व खनन विभाग से अनुमति लेनी पड़ती है।
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इतना ही नहीं निर्धारित समयांतराल पर इनका नवीनीकरण भी कराना पड़ता है। नियम के मुताबिक आबादी और जंगलों के आसपास कोई भी ईंट-भट्ठा नहीं खोला जा सकता, न ही यहां मिट्टी डंप की जा सकती है। ईंट की पथाई पर भी पूरी तरह रोक है लेकिन कई भट्ठे इन नियम-कायदों को दरकिनार कर रात-दिन आसमान काला कर रहे हैं।
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क्षेत्र में वन रेंज के पतौना जंगल और करमहिया से सटे जंगल के करीब ईंट भट्टे दिन-रात धुआं उगल रहे हैं। वन विभाग के जिम्मेदारों की लापरवाही इस हद तक है कि करमहिया गांव के दक्षिण सटे जंगलों के बीच के ईंट भट्टे का संचालन किया जा रहा है। जबकि वन विभाग के मुताबिक जंगल तो दूर, उससे सटे 500 मीटर के दायरे में ईंट भट्ठे का संचालन नहीं किया जा सकता। न ही मिट्टी डंप की जा सकती है।
गैर प्रांतों से आने वाले मजदूरों का नहीं है लेखा-जोखा : क्षेत्र के रहने वाले सुनील, विनोद, राजू आदि ने बताया कि भट्ठों पर नाबालिगों से कार्य कराया जाता है। लेकिन श्रम विभाग इसकी जांच नहीं करता है। अधिकतर भट्ठा संचालकों के पास श्रमिकों का लेखा-जोखा भी नहीं है। कोई घटना होने पर मालिक और विभाग पल्ला झाड़ लेते हैं। वहीं श्रम प्रवर्तन विभाग के जिम्मेदारों के मुताबिक, दूसरे प्रदेश से आने वाले मजूदरों को ठेकेदार लाते हैं। भट्ठा मालिक मजदूरों की सूचना भी नहीं देते हैं। बीच-बीच में इसकी जांच कर कार्रवाई भी की जाती है।