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पूजा से दूर होती है ग्रह बाधा : आचार्य
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महरौनी/ललितपुर। संत आचार्य निर्भय सागर महाराज ने बुधवार को मंगल प्रवचन दिए। उन्होंने भक्ति, पूजा और आराधना का महत्व बताया। बड़ा जैन मंदिर में आचार्यश्री ससंघ एक सप्ताह से विराजमान रहकर लोगों को धार्मिक उपदेश दे रहे हैं।
आचार्यश्री ने कहा कि श्रद्धा सहित की गई भगवान की पूजा, भक्ति और आराधना से ग्रहों की शांति स्वयं हो जाती है। किसी प्रकार के रत्न धारण करने की जरूरत नहीं होती। भगवान के सामने अष्ट द्रव्यों से की गई पूजा नौ ग्रहों की शांति कर देती है। भगवान की पूजा चावल यानी अक्षत और मोती चढ़ाकर करने से चंद्र ग्रह की, रक्त चंदन से सूर्य ग्रह की, केसर से मंगल ग्रह की, इलायची पिस्ता से बुध ग्रह की, बादाम पीली चटक या श्रीफल से गुरु ग्रह की, नारियल की चटक से शुक्र ग्रह की, कमल गट्टा से शनि ग्रह की एवं लौंग से राहु केतु ग्रह की बाधा दूर होती है। इसीलिए जैन धर्मानुयायी अष्ट द्रव्यों से पूजा करते हैं।
उन्होंने कहा कि जब रत्न धारण करने से ग्रह बाधा दूर हो सकती है तो रत्न और चावल आदि द्रव्यों को चढ़ाकर परमात्मा की पूजा करने से भी ग्रह बाधा दूर हो सकती है। परिग्रह वालों को ग्रह लगते हैं, परिग्रह से रहित दिगंबर मुनि को कोई ग्रह नहीं लगते हैं और न ही उन्हें नौ ग्रहों की बाधा परेशान करती है।
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अहिंसा व सदमार्ग पर चलने की प्रेरणा : आचार्य निर्भय सागर महाराज ने अहिंसा एवं सदमार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि भारत के समस्त धर्म सनातन धर्म के ही अंग हैं। आमजन से लेकर जैन संत तक के सफर को विस्तार से समझाया कि मनुष्य को संत बनने के लिए मिट्टी से सोना बनने जैसा तप त्याग करना पड़ता है। इस मौके पर दिगंबर जैन पंचायत अध्यक्ष कोमल चंद्र सिंघई, अभिनंदन सिंघई, प्रमोद सिंघई, अनिल मिठ्या, बाबा, राजेश मलैया, राजा चौधरी उपस्थित रहे।
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आचार्यश्री ने कहा कि श्रद्धा सहित की गई भगवान की पूजा, भक्ति और आराधना से ग्रहों की शांति स्वयं हो जाती है। किसी प्रकार के रत्न धारण करने की जरूरत नहीं होती। भगवान के सामने अष्ट द्रव्यों से की गई पूजा नौ ग्रहों की शांति कर देती है। भगवान की पूजा चावल यानी अक्षत और मोती चढ़ाकर करने से चंद्र ग्रह की, रक्त चंदन से सूर्य ग्रह की, केसर से मंगल ग्रह की, इलायची पिस्ता से बुध ग्रह की, बादाम पीली चटक या श्रीफल से गुरु ग्रह की, नारियल की चटक से शुक्र ग्रह की, कमल गट्टा से शनि ग्रह की एवं लौंग से राहु केतु ग्रह की बाधा दूर होती है। इसीलिए जैन धर्मानुयायी अष्ट द्रव्यों से पूजा करते हैं।
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उन्होंने कहा कि जब रत्न धारण करने से ग्रह बाधा दूर हो सकती है तो रत्न और चावल आदि द्रव्यों को चढ़ाकर परमात्मा की पूजा करने से भी ग्रह बाधा दूर हो सकती है। परिग्रह वालों को ग्रह लगते हैं, परिग्रह से रहित दिगंबर मुनि को कोई ग्रह नहीं लगते हैं और न ही उन्हें नौ ग्रहों की बाधा परेशान करती है।
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अहिंसा व सदमार्ग पर चलने की प्रेरणा : आचार्य निर्भय सागर महाराज ने अहिंसा एवं सदमार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि भारत के समस्त धर्म सनातन धर्म के ही अंग हैं। आमजन से लेकर जैन संत तक के सफर को विस्तार से समझाया कि मनुष्य को संत बनने के लिए मिट्टी से सोना बनने जैसा तप त्याग करना पड़ता है। इस मौके पर दिगंबर जैन पंचायत अध्यक्ष कोमल चंद्र सिंघई, अभिनंदन सिंघई, प्रमोद सिंघई, अनिल मिठ्या, बाबा, राजेश मलैया, राजा चौधरी उपस्थित रहे।