ललितपुर। कृषि विज्ञान केंद्र में महिलाओं ने केंचुआ खाद उत्पादन की तकनीकी एवं उसके प्रयोग के गुर सीखे। वक्ताओं ने कहा कि खेतों में दिन प्रतिदिन रसायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से मिट्टी में जीवांश कार्बन का स्तर घटता जा रहा है। इससे मिट्टी के जीव नष्ट होते जा रहे हैं।
भूमि की उर्वरता एवं जल धारण क्षमता को बनाये रखने के उद्देश्य से आयोजित एक दिवसीय प्रशिक्षण में जिले के विभिन्न गांवों से 35 महिलाओं ने केंचुआ खाद उत्पादन तकनीकी एवं प्रयोग के गुर सीखे। केन्द्र के वैज्ञानिक डॉ. एके पांडेय ने बताया कि केंचुआ खाद एक जैव उर्वरक है जो जैविक अवशिष्ट पदार्थो को केंचुआ द्वारा विघटित करके बनाई जाती है। इसमें पौधों के विकास के लिए आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों की पर्याप्त पायी जाती है। दिन प्रति दिन हमारे द्वारा रासायनिक उर्वरको एवं रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग से मिट्टी में जीवांश कार्बन का स्तर घटता जा रहा है, जिससे मिट्टी के जीव नष्ट होते जा रहे हैं। मृदा, जल एवं वायु प्रदूषण की समस्या बढ़ती जा रही है। फसल की लागत कम करने एवं बीमारियों, मक्खी, मच्छर एवं गंदगी से छुटकारा पाने के लिए पशुओं से प्राप्त गोबर को हम कंपोस्ट एवं केंचुआ खाद के रूप में परिवर्तित करके मृदा की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक क्रियाओं, जल धारण क्षमता, फसल का रोग से बचाव तथा अधिक उत्पादन हेतु खेत में प्रयोग करने की आवश्यकता है। इसकी रोकथाम के लिए हमें केंचुआ खाद उत्पादन एवं प्रयोग को अपनाकर अपनी आय सृजन, शुद्ध वातावरण को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाने की जरूरत है। डॉ. दिनेश तिवारी ने केंचुआ खाद के महत्व एवं उत्पादन विधि के बारे में विस्तृत जानकारी दी।