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पूर्व विधायक के पुश्तैनी कस्बा में आज भी सुविधाओं का टोटा
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दो छोटे कमरों में चलता सरकारी अस्पताल
- फोटो : LALITPUR
पाली। इस कस्बे की माटी ने एक दर्जन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दिए है। इनमें कोई गांधीजी तो कोई नेताजी से प्रभावित होकर मातृभूमि को आजाद कराने के लिए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मैदान में उतरा था। इनमें एक बड़ा नाम है, स्व. रमानाथ खैरा का, जो उच्चकोटि के वकील होने के साथ-साथ दो बार जनता के प्रतिनिधि चुने गए। इन्हीं की विरासत में उनके बेटे राजेश खैरा 1985 में कांग्रेस से ललितपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए। तब कांग्रेस की सरकार थी, लेकिन पालीवासियों को न तो अस्पताल की सौगात मिल सकी और न ही भू राजस्व का नक्शा बन सका है।
पाली की कई धरोहरें हैं, जिससे उसकी अपनी पहचान है। यहां भूतभावन भगवान श्री नीलकंठेश्वर और यहां पैदा होने वाले पान के लिए पाली को विशेष तौर पर जाना जाता है। बात करें स्वतंत्रता सेनानियों की तो पाली के अधिकांश युवा इनकी गौरव गाथा से भी ठीक से परिचित नहीं हैं। इसके पीछे का कारण यहां ऐसे कोई विकास कार्य नहीं हुए, जो इन सेनानियों को समर्पित किए गए हों। श्री नीलकंठेश्वर धाम पर्यटन के रूप में विकसित नहीं हो सका और पान किसान भी उपेक्षित हैं।
पूर्व विधायक के पुश्तैनी क्षेत्र की तीनों बड़ी पहचानें अपने आप में सिमट गईं हैं। लोगों का मानना है कि पूर्व विधायक के कार्यकाल में उतना बजट नहीं मिलता था, लेकिन राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री बने तो उस समय काफी पैसा आया, इसके बाद भी पाली का विकास नहीं हो सका। हालात यह हो गए कि जो जनता कभी नेताओं के आश्वासनों पर तालियां बजाती थी, आज नेताओं के यही आश्वासन जनता के ह्रदय में तीर की तरह चुभ रहे हैं।
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कस्बे में एक सुविधायुक्त अस्पताल की मांग पूर्व विधायक के कार्यकाल से चली आ रही है, लेकिन आज भी कस्बे में अस्पताल का निर्माण लोगों के बीच सपना बनकर रह गया। अस्पताल के अभाव में समय से इलाज नहीं मिल पाने के कारण गरीबों की जान जाने का सिलसिला बरकरार है। पाली का भू-राजस्व नक्शा रहस्यमय तरीके से गायब है। जमीन के अभाव में विकास कार्य प्रभावित रहते हैं। एक ही जमीन को लेकर कई लोग आमने- सामने आ जाते हैं। जमीनों के मामले न्यायालय में विचाराधीन हैं।
स्वतंत्रता सेनानियों ने आबादी के बीच में धरोहर के रूप में गांधी चौक को पहचान दी थी, इसका चबूतरा आज भी वीरान पड़ा है। इस चबूतरे पर समय रहते गौर कर लिया जाता तो इस पर गांधीजी की प्रतिमा के साथ- साथ स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मान मिल गया होता, पर अफसोस ऐसा हुआ नहीं। यहां पर आज भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। ठीक तरह से सर्वे किया जाए तो जिला मुख्यालय के अंतर्गत कस्बे के लोग सबसे ज्यादा पलायन कर गए। यहां न तो रोजगार और न शिक्षा के अवसर हैं। जहां जिला मुख्यालय को पहले एक दर्जन से ज्यादा बसें चलती थीं, आज तीन- चार बसें ही आने-जाने के साधन हैं।
पाली के स्वतंत्रता सेनानी पूर्व विधायक राजेश खेरा के पिता स्व. रमानाथ खैरा दो बार विधायक रहे। 1952 में कांग्रेस से विधायक बनने पर उन्होंने किसानों के लिए संघर्ष किया। प्रदेश में कृषि मंत्री चौधरी चरण सिंह के कार्यकाल के दौरान उन्होंने घोषणा की थी कि ऊबड़- खाबड़ जमीन को कृषि योग्य बनाने के लिए बुलडोजर निशुल्क उपलब्ध कराए जाएंगे। तब रमानाथ खैरा ने बड़े पैमाने पर लोगों की जमीनों का समतलीकरण कराया था। सरकार ने इसके लिए वसूली प्रारंभ की तो उन्होंने डटकर विरोध किया। सरकार नहीं मानी तो वह मुद्दे को लेकर हाईकोर्ट चले गए। हाईकोर्ट ने उनकी बात को जायज माना और सरकार को पीछे हटना पड़ा। अगला चुनाव आया तो कांग्रेसी ने उन्हें टिकट देने से इनकार कर दिया। इस पर वह निर्दलीय के तौर पर चुनाव लड़े और दोबारा विधायक चुने गए।
1971 में बनी नगर पंचायत
1971 से पहले पाली गांव हुआ करता था, लेकिन 1971 में पाली को नगर पंचायत का दर्जा मिला। यहां के पहले नगर पंचायत अध्यक्ष बनने का गौरव महेंद्र प्रताप सिंह को मिला।
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नहीं है भू राजस्व का नक्शा
पाली का भूराजस्व का नक्शा गायब है। इस नक्शे की सभी जगह खोज कर ली गई। जहां पर अभिलेखागार के भंडार हैं, वहां पर भूराजस्व का नक्शा नहीं है।
कांग्रेस सरकार में विकास कार्य तेजी से हुए, लेकिन पूर्व विधायक अपने पिता की जन्मस्थली के प्रति अपने कर्तव्यों का ध्यान नहीं रख सके। इससे पाली नगर पंचायत होने के बाद विकास से वंचित है। राजस्व नक्शे की कमी हमेशा अखरती है।
-लक्ष्मण प्रसाद पाटकार, पूर्व पार्षद
पूर्व विधायक राजेश खैरा हमारे सहपाठी रहे हैं। वो अगर चाहते तो पाली विकास के मामले में काफी ऊंचे पायदान पर खड़ा होता। कांग्रेस ने लंबे समय तक शासन किया है। इसका लाभ पाली को भी दिलाना था, जिसमें अस्पताल को प्राथमिकता से शामिल करना था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका।
- महेंद्र कुमार रसिया, पूर्व नगर पंचायत उपाध्यक्ष
उनका कई वर्ष तक विधायक होना पाली को गौरवान्वित करता है। जाखलौन पंप कैनाल से पाली की ओर नहर का उदगम हो जाता तो यहां के किसानों के खेतों में पानी की कोई कमी नहीं होती। नहर यहां तक आ जाने से किसानों में आर्थिक संपन्नता बढ़ती।
- बालमुकुंद चौरसिया, लोकतंत्र सेनानी
पूर्व विधायक अपने कार्यकाल में काफी कार्य कराए हैं। जिले में ट्रेनों के स्टॉपेज कराए। पाली में विकास कार्यों का धरातली रूप ज्यादा नहीं दिख रहा। आज की तरह सोशल मीडिया होती तो उनके कार्य दिख रहे होते। स्थानीय होने के कारण लोग उनसे ज्यादा उम्मीद रखते थे।
- आजाद खां मंसूरी, अध्यक्ष रामलीला समिति
आज साप्ताहिक बाजार का दायरा बढ़ गया है। पूर्व विधायक के पुश्तैनी मकान तक बाजार बढ़ गया है। हाट बाजार खुले आसमान के नीचे चलता है, जहां ग्राहकों के सामने दुकानदारों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। अलग से हाट बाजार नहीं बन सका।
- अतुल जैन, व्यापारी
नवोदय विद्यालय को जमीन नहीं मिली, जिससे उसका निर्माण नहीं हो सका। ऐसे स्कूल व कॉलेज नहीं हैं, जिनमें गरीब तबके के छात्र- छात्राएं मनमाफिक विषय पढ़कर अपने भविष्य को तैयार कर सकें। तहसील स्तर पर शिक्षा के संस्थान होना जरूरी है।
- अरुण चौरसिया
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किसानों के लिए काम किया
भुखमरी में खोल दिए थे अनाज के भंडार
कसबा पाली से खैरा परिवार का पुराना नाता है। वर्ष 1973 में जब भुखमरी के हालात बने तो पूर्व विधायक राजेश खैरा के दादा जगन्नाथ प्रसाद खैरा व मौजीलाल खैरा ने अनाज के बंडे (भंडार) लोगों के लिए खोल दिए थे, जिसे लोग आज भी याद करते हैं।
पाली में पान अनुसंधान केंद्र के लिए धनराशि स्वीकृत कराई। श्रीनीलकंठेश्वर मंदिर की सड़क सूखाग्रस्त योजना में स्वीकृत कराई। हैंडपंप लगवाए। टाउन एरिया के लिए काफी संघर्ष किया। ललितपुर विधानसभा में पॉलिटेक्निक, आईटीआई और नवोदय विद्यालय प्रारंभ कराए। नेहरू महाविद्यालय में एमए में दो विषयों से मान्यता दिलवाई। तालबेहट तहसील के राजकीय इंटर कॉलेज भवन निर्माण के लिए पैसा स्वीकृत कराया। ललितपुर में जूनियर हाईस्कूल एवं प्राइमरी पाठशाला खुलवाए। चिकित्सालय के भवन के लिए पैसा उपलब्ध कराया। तालबेहट में 30 बेड के अस्पताल को स्वीकृत कराया। टीवी रिले केंद्र व इलेक्ट्रॉनिक स्वचालित केंद्र हमारी उपलब्धि है। जिले को तीन बार सूखाग्रस्त घोषित कराकर लगभग 6 करोड रुपये स्वीकृत कराए।
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पाली की कई धरोहरें हैं, जिससे उसकी अपनी पहचान है। यहां भूतभावन भगवान श्री नीलकंठेश्वर और यहां पैदा होने वाले पान के लिए पाली को विशेष तौर पर जाना जाता है। बात करें स्वतंत्रता सेनानियों की तो पाली के अधिकांश युवा इनकी गौरव गाथा से भी ठीक से परिचित नहीं हैं। इसके पीछे का कारण यहां ऐसे कोई विकास कार्य नहीं हुए, जो इन सेनानियों को समर्पित किए गए हों। श्री नीलकंठेश्वर धाम पर्यटन के रूप में विकसित नहीं हो सका और पान किसान भी उपेक्षित हैं।
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पूर्व विधायक के पुश्तैनी क्षेत्र की तीनों बड़ी पहचानें अपने आप में सिमट गईं हैं। लोगों का मानना है कि पूर्व विधायक के कार्यकाल में उतना बजट नहीं मिलता था, लेकिन राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री बने तो उस समय काफी पैसा आया, इसके बाद भी पाली का विकास नहीं हो सका। हालात यह हो गए कि जो जनता कभी नेताओं के आश्वासनों पर तालियां बजाती थी, आज नेताओं के यही आश्वासन जनता के ह्रदय में तीर की तरह चुभ रहे हैं।
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कस्बे में एक सुविधायुक्त अस्पताल की मांग पूर्व विधायक के कार्यकाल से चली आ रही है, लेकिन आज भी कस्बे में अस्पताल का निर्माण लोगों के बीच सपना बनकर रह गया। अस्पताल के अभाव में समय से इलाज नहीं मिल पाने के कारण गरीबों की जान जाने का सिलसिला बरकरार है। पाली का भू-राजस्व नक्शा रहस्यमय तरीके से गायब है। जमीन के अभाव में विकास कार्य प्रभावित रहते हैं। एक ही जमीन को लेकर कई लोग आमने- सामने आ जाते हैं। जमीनों के मामले न्यायालय में विचाराधीन हैं।
स्वतंत्रता सेनानियों ने आबादी के बीच में धरोहर के रूप में गांधी चौक को पहचान दी थी, इसका चबूतरा आज भी वीरान पड़ा है। इस चबूतरे पर समय रहते गौर कर लिया जाता तो इस पर गांधीजी की प्रतिमा के साथ- साथ स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मान मिल गया होता, पर अफसोस ऐसा हुआ नहीं। यहां पर आज भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। ठीक तरह से सर्वे किया जाए तो जिला मुख्यालय के अंतर्गत कस्बे के लोग सबसे ज्यादा पलायन कर गए। यहां न तो रोजगार और न शिक्षा के अवसर हैं। जहां जिला मुख्यालय को पहले एक दर्जन से ज्यादा बसें चलती थीं, आज तीन- चार बसें ही आने-जाने के साधन हैं।
पाली के स्वतंत्रता सेनानी पूर्व विधायक राजेश खेरा के पिता स्व. रमानाथ खैरा दो बार विधायक रहे। 1952 में कांग्रेस से विधायक बनने पर उन्होंने किसानों के लिए संघर्ष किया। प्रदेश में कृषि मंत्री चौधरी चरण सिंह के कार्यकाल के दौरान उन्होंने घोषणा की थी कि ऊबड़- खाबड़ जमीन को कृषि योग्य बनाने के लिए बुलडोजर निशुल्क उपलब्ध कराए जाएंगे। तब रमानाथ खैरा ने बड़े पैमाने पर लोगों की जमीनों का समतलीकरण कराया था। सरकार ने इसके लिए वसूली प्रारंभ की तो उन्होंने डटकर विरोध किया। सरकार नहीं मानी तो वह मुद्दे को लेकर हाईकोर्ट चले गए। हाईकोर्ट ने उनकी बात को जायज माना और सरकार को पीछे हटना पड़ा। अगला चुनाव आया तो कांग्रेसी ने उन्हें टिकट देने से इनकार कर दिया। इस पर वह निर्दलीय के तौर पर चुनाव लड़े और दोबारा विधायक चुने गए।
1971 में बनी नगर पंचायत
1971 से पहले पाली गांव हुआ करता था, लेकिन 1971 में पाली को नगर पंचायत का दर्जा मिला। यहां के पहले नगर पंचायत अध्यक्ष बनने का गौरव महेंद्र प्रताप सिंह को मिला।
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नहीं है भू राजस्व का नक्शा
पाली का भूराजस्व का नक्शा गायब है। इस नक्शे की सभी जगह खोज कर ली गई। जहां पर अभिलेखागार के भंडार हैं, वहां पर भूराजस्व का नक्शा नहीं है।
कांग्रेस सरकार में विकास कार्य तेजी से हुए, लेकिन पूर्व विधायक अपने पिता की जन्मस्थली के प्रति अपने कर्तव्यों का ध्यान नहीं रख सके। इससे पाली नगर पंचायत होने के बाद विकास से वंचित है। राजस्व नक्शे की कमी हमेशा अखरती है।
-लक्ष्मण प्रसाद पाटकार, पूर्व पार्षद
पूर्व विधायक राजेश खैरा हमारे सहपाठी रहे हैं। वो अगर चाहते तो पाली विकास के मामले में काफी ऊंचे पायदान पर खड़ा होता। कांग्रेस ने लंबे समय तक शासन किया है। इसका लाभ पाली को भी दिलाना था, जिसमें अस्पताल को प्राथमिकता से शामिल करना था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका।
- महेंद्र कुमार रसिया, पूर्व नगर पंचायत उपाध्यक्ष
उनका कई वर्ष तक विधायक होना पाली को गौरवान्वित करता है। जाखलौन पंप कैनाल से पाली की ओर नहर का उदगम हो जाता तो यहां के किसानों के खेतों में पानी की कोई कमी नहीं होती। नहर यहां तक आ जाने से किसानों में आर्थिक संपन्नता बढ़ती।
- बालमुकुंद चौरसिया, लोकतंत्र सेनानी
पूर्व विधायक अपने कार्यकाल में काफी कार्य कराए हैं। जिले में ट्रेनों के स्टॉपेज कराए। पाली में विकास कार्यों का धरातली रूप ज्यादा नहीं दिख रहा। आज की तरह सोशल मीडिया होती तो उनके कार्य दिख रहे होते। स्थानीय होने के कारण लोग उनसे ज्यादा उम्मीद रखते थे।
- आजाद खां मंसूरी, अध्यक्ष रामलीला समिति
आज साप्ताहिक बाजार का दायरा बढ़ गया है। पूर्व विधायक के पुश्तैनी मकान तक बाजार बढ़ गया है। हाट बाजार खुले आसमान के नीचे चलता है, जहां ग्राहकों के सामने दुकानदारों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। अलग से हाट बाजार नहीं बन सका।
- अतुल जैन, व्यापारी
नवोदय विद्यालय को जमीन नहीं मिली, जिससे उसका निर्माण नहीं हो सका। ऐसे स्कूल व कॉलेज नहीं हैं, जिनमें गरीब तबके के छात्र- छात्राएं मनमाफिक विषय पढ़कर अपने भविष्य को तैयार कर सकें। तहसील स्तर पर शिक्षा के संस्थान होना जरूरी है।
- अरुण चौरसिया
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किसानों के लिए काम किया
भुखमरी में खोल दिए थे अनाज के भंडार
कसबा पाली से खैरा परिवार का पुराना नाता है। वर्ष 1973 में जब भुखमरी के हालात बने तो पूर्व विधायक राजेश खैरा के दादा जगन्नाथ प्रसाद खैरा व मौजीलाल खैरा ने अनाज के बंडे (भंडार) लोगों के लिए खोल दिए थे, जिसे लोग आज भी याद करते हैं।
पाली में पान अनुसंधान केंद्र के लिए धनराशि स्वीकृत कराई। श्रीनीलकंठेश्वर मंदिर की सड़क सूखाग्रस्त योजना में स्वीकृत कराई। हैंडपंप लगवाए। टाउन एरिया के लिए काफी संघर्ष किया। ललितपुर विधानसभा में पॉलिटेक्निक, आईटीआई और नवोदय विद्यालय प्रारंभ कराए। नेहरू महाविद्यालय में एमए में दो विषयों से मान्यता दिलवाई। तालबेहट तहसील के राजकीय इंटर कॉलेज भवन निर्माण के लिए पैसा स्वीकृत कराया। ललितपुर में जूनियर हाईस्कूल एवं प्राइमरी पाठशाला खुलवाए। चिकित्सालय के भवन के लिए पैसा उपलब्ध कराया। तालबेहट में 30 बेड के अस्पताल को स्वीकृत कराया। टीवी रिले केंद्र व इलेक्ट्रॉनिक स्वचालित केंद्र हमारी उपलब्धि है। जिले को तीन बार सूखाग्रस्त घोषित कराकर लगभग 6 करोड रुपये स्वीकृत कराए।

बदहाल पड़ा कब्रिस्तान को जाने वाला रास्ता।- फोटो : LALITPUR