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नौ लोगों के परिवार में सात नेत्रहीन
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 02 Jun 2017 01:04 AM IST
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hospital, lalitpur news
- फोटो : demo
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महरौनी (ललितपुर)। तहसील क्षेत्र के ग्राम गुढ़ा में एक परिवार के नौ लोगों में सात जन्म से नेत्रहीन हैं। ऐसे में उनका भरण पोषण मुश्किल हो गया है। स्वास्थ्य विभाग की अनदेखी से इन लोगों की जिंदगी में रोशनी की किरण नहीं आ पाई है। हालात यह हैं कि अभी तक किसी का भी विकलांग प्रमाण भी नहीं बना है।
ग्राम गुढ़ा के मौजा टीकरी में रहने वाले दिब्बू (35) पुत्र नन्नू बढ़ई के परिवार के आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। उसके नाम 66 डिसमिल जमीन है। वह मजदूरी कर परिवार का पालन पोषण कर रहा है। दिब्बू ने बताया कि उसने 14 साल पहले ग्राम बरखिरिया जिला टीकमगढ़ की अशादेवी से विवाह किया। आशा नेत्रहीन है। पत्नी ने छह बेटियों और एक बेटे को जन्म दिया। इनमें से वर्षा (10), रिंकी (9), रश्मि (7), रंजना (6), नीतू (4), अर्चना (3) और अरविंद (1) है। इनमें से केवल रंजना को ही आंखों की रोशनी मिली है। वर्षा और रिंकी कन्या पाठशाला में पढ़ने जाती हैं, जबकि अन्य पुत्रियां घर पर ही रहती हैं।
दिब्बू ने बताया कि पत्नी और पुत्रियों के नेत्रहीन होने से दैनिक कार्यों में परेशानी होती है। उसके पास राशन कार्ड नहीं है। स्वास्थ्य विभाग की अनदेखी से अभी तक किसी का भी विकलांग प्रमाण पत्र भी नहीं बना है। कई बार अधिकारियों से सरकारी योजनाओं का लाभ न मिलने की शिकायत की, लेकिन हुआ कुछ नहीं। गुढ़ा की ग्राम प्रधान साधना खरे ने बताया कि दिब्बू के गरीब परिवार को निजी तौर पर हरसंभव आर्थिक मदद दी जायेगी और जल्द ही उसे सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए पहल करूंगी।
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अगर पति पत्नी दोनों अंधे हैं या दोनों में से कोई एक अंधा है तो उनकी संतानों पर भी इसका आनुवांशिक प्रभाव पड़ता है। ऐसे में बच्चे भी अंधे हो सकते हैं। यह आनुवांशिकता एक अनुपात के तहत परिणाम देती है, जो कि पति-पत्नी के डीएनए पर निर्भर होती है। इसमें कभी चार बच्चे सामान्य तो एक अंधा या फिर चार अंधे तो एक सामान्य बच्चा हो सकता है।
डॉ. राजेश वर्मा, चिकित्सा अधीक्षक- सीएचसी महरौनी
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ग्राम गुढ़ा के मौजा टीकरी में रहने वाले दिब्बू (35) पुत्र नन्नू बढ़ई के परिवार के आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। उसके नाम 66 डिसमिल जमीन है। वह मजदूरी कर परिवार का पालन पोषण कर रहा है। दिब्बू ने बताया कि उसने 14 साल पहले ग्राम बरखिरिया जिला टीकमगढ़ की अशादेवी से विवाह किया। आशा नेत्रहीन है। पत्नी ने छह बेटियों और एक बेटे को जन्म दिया। इनमें से वर्षा (10), रिंकी (9), रश्मि (7), रंजना (6), नीतू (4), अर्चना (3) और अरविंद (1) है। इनमें से केवल रंजना को ही आंखों की रोशनी मिली है। वर्षा और रिंकी कन्या पाठशाला में पढ़ने जाती हैं, जबकि अन्य पुत्रियां घर पर ही रहती हैं।
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दिब्बू ने बताया कि पत्नी और पुत्रियों के नेत्रहीन होने से दैनिक कार्यों में परेशानी होती है। उसके पास राशन कार्ड नहीं है। स्वास्थ्य विभाग की अनदेखी से अभी तक किसी का भी विकलांग प्रमाण पत्र भी नहीं बना है। कई बार अधिकारियों से सरकारी योजनाओं का लाभ न मिलने की शिकायत की, लेकिन हुआ कुछ नहीं। गुढ़ा की ग्राम प्रधान साधना खरे ने बताया कि दिब्बू के गरीब परिवार को निजी तौर पर हरसंभव आर्थिक मदद दी जायेगी और जल्द ही उसे सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए पहल करूंगी।
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अगर पति पत्नी दोनों अंधे हैं या दोनों में से कोई एक अंधा है तो उनकी संतानों पर भी इसका आनुवांशिक प्रभाव पड़ता है। ऐसे में बच्चे भी अंधे हो सकते हैं। यह आनुवांशिकता एक अनुपात के तहत परिणाम देती है, जो कि पति-पत्नी के डीएनए पर निर्भर होती है। इसमें कभी चार बच्चे सामान्य तो एक अंधा या फिर चार अंधे तो एक सामान्य बच्चा हो सकता है।
डॉ. राजेश वर्मा, चिकित्सा अधीक्षक- सीएचसी महरौनी