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जीवन में आत्महत्या नहीं, समस्या का समाधान करो

Mon, 03 Aug 2020 10:36 PM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Mon, 03 Aug 2020 10:36 PM IST
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Not attempt sucide in life lets solve problem
आत्महत्या - फोटो : ?????????
ललितपुर। जिले में लगातार बढ़ रहे आत्महत्याओं के मामलों से बुद्धिजीवी और मनोविश्लेषकों ने आत्महत्या से बचाव के सुझाव दिए। उन्होंने कहा की जब जीने की वजह हो तो आत्महत्या नहीं, बल्कि समाधान की ओर आगे बढ़ो। यही लक्ष्य आत्महत्या से दूर ले जाकर जीवन के नजदीक पहुंचाता है और जीने की नई उम्मीद जगाता है।
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मनोविश्लेषक डॉ. संजीव कुमार शर्मा नेहरू महाविद्यालय में काउंसलिंग कराते हैं। कोरोना महामारी के कारण वह वर्तमान में मोबाइल के माध्यम से ऑनलाइन काउंसलिंग करा रहे हैं। जिले में बीते एक माह में 27 आत्महत्याओं के मामले अकेले फांसी लगाने के कारण सामने आए हैं। इनमें किसान, मजदूर, छात्र-छात्राएं, महिलाएं, युवक, शहरी व ग्रामीण क्षेत्र के लोग शामिल हैं। आत्महत्या की घटनाएं कृषि संकट, बेरोजगारी, गंभीर बीमारी, परीक्षा में अच्छी सफलता, ऊंचा मुकाम नहीं मिलने के कारण हो रही हैं।
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जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष श्रीप्रकाश चौबे ने कहा कि आत्महत्या आर्थिक तंगी, मानसिक तनाव एवं घरेलू कलह के कारण तात्कालिक उठाया गया कदम होता है। यदि आत्महत्या का कदम उठाने से पहले व्यक्ति अपनी परेशानी दूसरों से साझा कर ले तो उसे समस्या का समाधान भी मिल जाएगा और उसका जीवन भी बच जाएगा।
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आत्महत्या बुंदेलखंड की प्रमुख समस्या है। पिछले कुछ समय से आत्महत्या की घटनाएं काफी बढ़ी हैं, जो चिंता का विषय है। कोई भी व्यक्ति आत्महत्या की घटना से पहले संकेत देना शुरू कर देता है। आत्महत्या करना है, यह कोई एक क्षण में नहीं लिया गया निर्णय नहीं है। बल्कि, आत्महत्या करने से कई घंटे या कई दिन पहले इस बात के संकेत दिखाई देने लगते हैं। आत्महत्या करने वाला व्यक्ति शाब्दिक रूप से एक बार चेतावनी जरूर देता है। लेकिन, हम इस चेतावनी को नजरअंदाज कर देते हैं। यदि व्यक्ति आत्महत्या की चेतावनी देता है तो परिवारीजनों को उस व्यक्ति से इस संबंध में बात करनी चाहिए और उसका हौसला बढ़ाते हुए उसकी समस्याओं के समाधान में मदद करनी चाहिए।

- डॉ. संजीव कुमार शर्मा, मनोविश्लेषक।
आत्महत्या जैसी घटनाओं को रोकने के लिए जरूरी है कि ऐसे लोगों की मनोस्थिति जानें और उसका समाधान करें। ग्राम पंचायत स्तर पर मनोविश्लेषकों द्वारा काउंसलिंग जैसे कार्यक्रम आयोजित करना चाहिए। लोगों में आपसी संवाद स्थापित करते हुए उनकी आर्थिक स्थिति, कृषि कार्यों, बेरोजगारी संकट एवं घरेलू संवाद करना चाहिए। शैक्षिक स्तर पर भी पाठ्यक्रमों में एक अध्याय के रूप में मनोविश्लेषकों के विचार शामिल करना चाहिए। अध्ययन के रूप में छात्रों को बताना चाहिए। इससे शुरुआत से ही विद्यार्थियों की मनोस्थिति मजबूत हो सकेगी और उनमें किसी भी स्थिति व परिस्थिति से निपटने की सामर्थ्य हो सकेगी। - पुष्पेंद्र सिंह चौहान, एडवोकेट सामाजिक कार्यकर्ता।
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