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नगर पालिका: दुकान किसी के नाम, काबिज कोई और

Sun, 02 Aug 2015 11:18 PM IST
ब्यूराे/अमर उजाला
ब्यूराे/अमर उजाला Updated Sun, 02 Aug 2015 11:18 PM IST
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ललितपुर। नगरीय सीमा में नगर पालिका की दुकानों में 50 प्रतिशत से अधिक दुकानदार दूसरों के नाम (सिकमी किरायेदार) पर दुकानदारी कर रहे हैं। बोर्ड कमेटी की बैठक नहीं होने के कारण दुकानदार मूल किराएदार नहीं बन पा रहे हैं।
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26 वार्डों वाली नगर पालिका परिषद विभिन्न स्थानों पर दुकानों का निर्माण करती है। वर्तमान में मां कर्माबाई कांपलेक्स, डा. शादीलाल दुबे कामर्शियल भवन, पुरानी नगर पालिका और संगठित विकास योजना अंतर्गत नगर में करीब 1,200 दुकानें बनी हुई हैं। इसके अलावा संगठित विकास योजना के तहत 180 दुकानें भी शामिल हैं। इनका निर्माण नगर नियोजक झांसी के मद से किया गया और इन दुकानों से आने वाला किराया भी इसी मद में जमा किया जाता है। नगर पालिका की दुकानों के साथ संगठित विकास योजना की दुकानों में 50 प्रतिशत से अधिक दुकानदार सिकमी किरायेदार (किरायेदार के किरायेदार) बने हुए हैं। इनमें से सैकड़ों दुकानदार तो ऐसे हैं, जिन्होंने लंबे समय से अपना प्रीमियम भी पूरा जमा नहीं किया है। साथ ही किराया भी लेट देते चले आ रहे हैं। दरअसल, यह किराएदार नगर पालिका की मर्जी के बगैर दुकानों में डट गए हैं। मूल आवंटी ने दुकान किराए पर दे दी। इसके बाद आवंटी या तो किराया ले रहा है अथवा उसने पगड़ी लेकर दुकान दे दी है, लेकिन नगर पालिका इस ओर ध्यान नहीं दे रही है।
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नगर पालिका की दुकानों का स्थायी किरायेदार बनाने के लिए अधिशासी अधिकारी और अध्यक्ष की सहमति जरूरी है। हालांकि कई वर्ष हो गए लेकिन, सिकमी किरायेदार को मूल किरायेदार बनाने की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। संगठित विकास योजना के सिकमी दुकानदारों का और भी बुरा हाल है। इसमें भी एक कमेटी बनी हुई है, जिसमें समिति का अध्यक्ष नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष को बनाया गया है तथा सदस्य के रूप में नगर नियोजक झांसी, एडीएम, नपा ईओ, अधिशासी अभियंता लोक निर्माण विभाग, अधिशासी अभियंता विद्युत व जल निगम को भी रखा गया है। अध्यक्ष के साथ इन सातों सदस्य की मुहर लगने के बाद ही सिकमी किरायेदार मूल किरायेदार बन सकते हैं। लेकिन पिछले कई वर्षों से बोर्ड कमेटी की बैठकें नहीं होने के कारण सिकमी किरायेदार ही व्यवसाय कर रहे हैं।
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अवैध हैं दुकानदार
सिकमी किरायेदार मूल किरायेदार नहीं होने के कारण अवैध माने गए हैं, लेकिन नगर में सिकमी किरायेदारों की संख्या अधिकांश है। इस कारण इन पर न तो कार्रवाई होती और न ही संबंधित दुकान पर तालाबंदी की जाती है। 
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