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Lalitpur News: आधुनिकता में खो गई फूलों के रंगों की होली

Mon, 10 Mar 2025 12:25 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Mon, 10 Mar 2025 12:25 AM IST
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Holi of flowers' colors got lost in modernity
संवाद न्यूज एजेंसी
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बिरधा (ललितपुर)। बुंदेलखंड में युवाओं की बेरुखी के चलते लोक विधाएं और परंपराएं विलुप्त होती जा रही हैं। त्योहार की रौनक भी दिनों दिन कम होती जा रही है। चार दशक पहले फूलों से रंग बनाकर होली खेली जाती थी। इन रंगों का औषधीय महत्व भी था, लेकिन अब पेड़ों पर लगे फूल बुजुर्गों की यादों तक सीमित रह गए हैं।
बुजुर्ग बताते हैं कि फूलों से रंग बनाने में मेहनत लगती थी, लेकिन अब वह रंग और परंपरा गुम हो गई है। होली का पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन लोग एक दूसरे को रंग लगाकर अपनी कटुता को भुलाते हैं। पहले रंगों का पर्व तीन दिन तक मनाया जाता था। पहले दिन कीचड़ से होली खेली जाती थी। इसके बाद अगले दिन रंग व गुलाल लगाते थे। यह पर्व मनाने का सिलसिला रंग पंचमी तक चलता था।
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अब बदलते परिवेश में पर्व केवल एक दिन ही मनाया जाता है। चार दशक पूर्व प्राकृतिक रंगों से होली खेली जाती थी, इसमें लोग फूलों से रंग बनाते थे। कई दिन पहले से तैयारी होती थी। रंगों के लिए पलाश और सेमर समेत अन्य फूलों को घर लाकर सुखा देते थे। इसके बाद पानी में गला कर रखते थे, जिससे केसरिया रंग बनता था। सेमर के फूलों से लाल रंग तैयार होता था। इसके अलावा कई पत्तों को सुखाकर रंग बनाकर होली खेलते थे। अब अधिक मेहनत के चलते प्राकृतिक रंगों का चलन खत्म हो गया है।
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वर्तमान में रासायनिक रंगों का प्रयोग किया जा रहा है, जो सेहत को भी प्रभावित कर रहा है। कई लोगों को चर्म रोग जैसी समस्या हो जाती है।
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