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पानी पाउच पांच में, बोतल मिल रही 20 रुपये में
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 02 May 2016 12:55 AM IST
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शैलेष गौतम
ललितपुर। ग्रामीण क्षेत्रों में बने रेलवे स्टेशनों का हाल भी बहुत अच्छा नहीं है। छोटी रेलवे स्टेशनों पर ठहरने वाली ट्रेनों के यात्रियों के लिए पानी आसानी से उपलब्ध नहीं होता। यदि उपलब्ध होता भी है, तो यात्रियों को इसके लिए दाम चुकाने होते हैं, तब कहीं जाकर कंठ की प्यास बुझती है। ऐसा ही कुछ हाल ललितपुर से बीना और बबीना के बीच बनी छोटी स्टेशनों का है। यहां पानी की पर्याप्त उपलब्धता नहीं होने के कारण यात्रियों को रेलवे स्टेशनों पर पानी मनमाने दामों में बेचा जा रहा है। रेल यात्रियों भी मजबूरी में अपनी व परिजनों की प्यास बुझाने को पानी का मोल समझकर दाम खर्च कर रहे हैं।
इस वर्ष जनपद में सूखा का असर दिखाई दे रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में कुआं सूख गए हैं, तो हैंडपंपों ने पानी छोड़ना शुरू कर दिया है। यदि किसी गांव से निकल रहे किसी राहगीर को प्यास लगे तो उसे पानी के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। इससे भी बुरा हाल ग्रामीण क्षेत्रों के रेलवे स्टेशनों का है। जिले में ललितपुर से बीना की ओर जाखलौन और धौर्रा रेलवे स्टेशनों पर झांसी-बीना शटल, झांसी-इटारसी पैैसेंजर ट्रेन के अलावा कुछ एक्सप्रेस ट्रेनों का ठहराव भी होता है। रेलवे स्टेशन जीरोन, मोहासा, करौंदा व आगासौद पर पैसेंजर ट्रेनों को ही हाल्ट दिया गया है। इसी प्रकार झांसी की ओर ललितपुर के बाद रेलवे स्टेशन दैलवारा, जखौरा, बिजरौठा, तालबेहट, माताटीला स्टेेशनों पर भी दोनों ओर की पैसेंजर ट्रेनों को हाल्ट दिया गया है, जबकि तालबेहट में कई एक्सप्रेस ट्रेनें ठहरती हैं। रेलवे द्वारा साफ-सफाई व अन्य यात्री सुविधाएं प्रदान कर रेलवे स्टेशनों को अवार्ड तक दिया जाता है। लेकिन, हकीकत सच्चाई से बिल्कुल परे है।
एक ओर जहां ट्रेनों में यात्रियों को पीने के पानी के लिए दाम खर्च करने होते हैं, वहीं दूसरी ओर उससे भी खराब स्थिति छोटे रेलवे स्टेशनों की है। इन स्टेशनों पर पानी की भारी किल्लत है। रेलवे द्वारा बनाए गए प्याऊ के नलों से पानी नहीं निकल रहा है और यदि कभी पानी निकलता भी है तो तेज धूप के कारण गर्म पानी ही यात्रियों को उपलब्ध होता है। इस भीषण गर्मी में पानी के लिए परेेशान यात्रियों की मजबूरी का फायदा स्थानीय लोगों द्वारा खूब उठाया जा रहा है। रेलवे स्टेशनों पर ट्रेन आते ही ऐसे लोग सक्रिय हो जाते हैं और पानी के पाउच पांच से दस रुपए में तक बेचे जा रहे हैं। वहीं, लोकल बोतलों में भी पानी भरकर बेचने का काम भी जारी है। इतना ही नहीं कुछ रेलवे कैंटीन के कर्मचारियों द्वारा 15 रुपए प्रिंट की बोतल 20 से 25 रुपये में बेची जा रही है। गामीण क्षेत्रों में रेलवे स्टेशनों पर स्थानीय लोगों द्वारा रेल यात्रियों की मजबूरी में पानी से बेचकर रोजगार चलाया जा रहा है और रेल यात्रियों की जेब पर डाका डाला जा रहा है। जबकि, रेलवे द्वारा यात्रियों की सुविधा के लिए करोड़ों रुपये बिजली, पानी व ठहराव के लिए खर्च करने का दावा किया जाता रहा है। इस प्रकार रेलवे द्वारा करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी यात्रियों को जरूरी सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
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प्राइवेट प्याऊ से हो रही पानी की पूर्ति
ललितपुर। आदर्श रेलवे स्टेशन का दर्जा प्राप्त ललितपुर रेलवे स्टेशन पर भी तपन भरी गर्मी में पानी की समस्या से इंकार नहीं किया जा सकता है। यहां स्थापित वाटर कूलर भी कई बार गर्म पानी उगलते हैं, जिससे यात्रियों को पीने के पानी के लिए परेशान होना पड़ता है। सबसे अधिक परेशानी प्लेटफार्म नंबर दो व तीन पर रहती है। यहां ठहरनी वाली ट्रेनों के यात्रियों के लिए पानी के लिए भटकना पड़ता है। इसके लिए यहां प्राइवेट संस्थान द्वारा संचालित की जा रही प्याऊ से यात्रियों के लिए पानी की पूर्ति की जा रही है। कई बार तो यहां रेलवे द्वारा स्थापित किए गए प्याऊ से पानी निकलता ही नहीं है।
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ललितपुर। ग्रामीण क्षेत्रों में बने रेलवे स्टेशनों का हाल भी बहुत अच्छा नहीं है। छोटी रेलवे स्टेशनों पर ठहरने वाली ट्रेनों के यात्रियों के लिए पानी आसानी से उपलब्ध नहीं होता। यदि उपलब्ध होता भी है, तो यात्रियों को इसके लिए दाम चुकाने होते हैं, तब कहीं जाकर कंठ की प्यास बुझती है। ऐसा ही कुछ हाल ललितपुर से बीना और बबीना के बीच बनी छोटी स्टेशनों का है। यहां पानी की पर्याप्त उपलब्धता नहीं होने के कारण यात्रियों को रेलवे स्टेशनों पर पानी मनमाने दामों में बेचा जा रहा है। रेल यात्रियों भी मजबूरी में अपनी व परिजनों की प्यास बुझाने को पानी का मोल समझकर दाम खर्च कर रहे हैं।
इस वर्ष जनपद में सूखा का असर दिखाई दे रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में कुआं सूख गए हैं, तो हैंडपंपों ने पानी छोड़ना शुरू कर दिया है। यदि किसी गांव से निकल रहे किसी राहगीर को प्यास लगे तो उसे पानी के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। इससे भी बुरा हाल ग्रामीण क्षेत्रों के रेलवे स्टेशनों का है। जिले में ललितपुर से बीना की ओर जाखलौन और धौर्रा रेलवे स्टेशनों पर झांसी-बीना शटल, झांसी-इटारसी पैैसेंजर ट्रेन के अलावा कुछ एक्सप्रेस ट्रेनों का ठहराव भी होता है। रेलवे स्टेशन जीरोन, मोहासा, करौंदा व आगासौद पर पैसेंजर ट्रेनों को ही हाल्ट दिया गया है। इसी प्रकार झांसी की ओर ललितपुर के बाद रेलवे स्टेशन दैलवारा, जखौरा, बिजरौठा, तालबेहट, माताटीला स्टेेशनों पर भी दोनों ओर की पैसेंजर ट्रेनों को हाल्ट दिया गया है, जबकि तालबेहट में कई एक्सप्रेस ट्रेनें ठहरती हैं। रेलवे द्वारा साफ-सफाई व अन्य यात्री सुविधाएं प्रदान कर रेलवे स्टेशनों को अवार्ड तक दिया जाता है। लेकिन, हकीकत सच्चाई से बिल्कुल परे है।
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एक ओर जहां ट्रेनों में यात्रियों को पीने के पानी के लिए दाम खर्च करने होते हैं, वहीं दूसरी ओर उससे भी खराब स्थिति छोटे रेलवे स्टेशनों की है। इन स्टेशनों पर पानी की भारी किल्लत है। रेलवे द्वारा बनाए गए प्याऊ के नलों से पानी नहीं निकल रहा है और यदि कभी पानी निकलता भी है तो तेज धूप के कारण गर्म पानी ही यात्रियों को उपलब्ध होता है। इस भीषण गर्मी में पानी के लिए परेेशान यात्रियों की मजबूरी का फायदा स्थानीय लोगों द्वारा खूब उठाया जा रहा है। रेलवे स्टेशनों पर ट्रेन आते ही ऐसे लोग सक्रिय हो जाते हैं और पानी के पाउच पांच से दस रुपए में तक बेचे जा रहे हैं। वहीं, लोकल बोतलों में भी पानी भरकर बेचने का काम भी जारी है। इतना ही नहीं कुछ रेलवे कैंटीन के कर्मचारियों द्वारा 15 रुपए प्रिंट की बोतल 20 से 25 रुपये में बेची जा रही है। गामीण क्षेत्रों में रेलवे स्टेशनों पर स्थानीय लोगों द्वारा रेल यात्रियों की मजबूरी में पानी से बेचकर रोजगार चलाया जा रहा है और रेल यात्रियों की जेब पर डाका डाला जा रहा है। जबकि, रेलवे द्वारा यात्रियों की सुविधा के लिए करोड़ों रुपये बिजली, पानी व ठहराव के लिए खर्च करने का दावा किया जाता रहा है। इस प्रकार रेलवे द्वारा करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी यात्रियों को जरूरी सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
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प्राइवेट प्याऊ से हो रही पानी की पूर्ति
ललितपुर। आदर्श रेलवे स्टेशन का दर्जा प्राप्त ललितपुर रेलवे स्टेशन पर भी तपन भरी गर्मी में पानी की समस्या से इंकार नहीं किया जा सकता है। यहां स्थापित वाटर कूलर भी कई बार गर्म पानी उगलते हैं, जिससे यात्रियों को पीने के पानी के लिए परेशान होना पड़ता है। सबसे अधिक परेशानी प्लेटफार्म नंबर दो व तीन पर रहती है। यहां ठहरनी वाली ट्रेनों के यात्रियों के लिए पानी के लिए भटकना पड़ता है। इसके लिए यहां प्राइवेट संस्थान द्वारा संचालित की जा रही प्याऊ से यात्रियों के लिए पानी की पूर्ति की जा रही है। कई बार तो यहां रेलवे द्वारा स्थापित किए गए प्याऊ से पानी निकलता ही नहीं है।