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जागेंगे देव, बजेेंगे बैंड-बाजा, निकलेगी बारातें
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 10 Nov 2016 12:30 AM IST
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cultural news
- फोटो : demo
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चार माह से सोए देव गुरुवार को जाग जाएंगे। इसी के साथ बैंड-बाजा-बारात के साथ अन्य मांगलिक कार्योँ का दौर फिर से शुरू हो जाएगा। कहा जा सकता है कि मौसम के हिसाब से प्रकृति भी हमें कुछ दिनों के ठहराव का वक्त देती है और नई शुरूआत के लिए भरपूर ऊर्जा भी।
कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी के नाम से जानी जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार जगत माता लक्ष्मी ने क्षीर सागर में शेष शैय्या पर विराजे भगवान विष्णु के अनियमित जागरण शयन पर प्रश्न उठाया। उन्होंने उनसे कहा कि उनके शताब्दियों तक जागते रहने और बाद में इसी तरह सदियों तक सोते रहने से सृष्टि की सारी क्रियायें अनियंत्रित हो गई हैं। मान्यता है कि इसलिए भगवान विष्णु ने शयन जागरण का नियमन करते हुए चातुर्मास का प्रावधान रखा।
धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन श्रद्धालु तुलसी और शालिगराम विवाह का आयोजन भी रखते हैं। कहा जाता है कि देवता जब जागते है तो पहली प्रार्थना हरिबल्लभ तुलसी की ही सुनते हैं। पद्म पुराण में कथा है कि जब राजा जलंधर की पत्नी वृन्दा के श्राप से भगवान विष्णु पाषाण के हो गये थे, जिस कारण भगवान को शालिगराम भी कहा जाता है। इसी श्राप से मुक्ति पाने के लिए भगवान विष्णु को शालिगराम रूप में तुलसी से विवाह करना पड़ा था।
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बहरहाल धार्मिक मान्यता कुछ भी हो शायद व्यवहारिक तौर पर पुराने समय में वर्षा ऋतु के प्रारंभ होने या मौसम की प्रतिकूलता के चलते उत्पन्न रोगों व अन्य बाधाओं से बचने के लिए ही इस तरह के उपाय किए हाेंगे।
एकादशी शुभ मुहूर्त भी
देव उठनी एकादशी को शुभ मुहूर्त भी माना जाता है। क्योंकि इस दिन भगवान निंद्रा से जाग्रत होते हैं। इसीलिए इस दिन बिना पंचांग देखे विवाह आयोजन सहित अनेक मांगलिक कार्य होते हैं। इस लिए शुभ-अशुभ का विचार नहीं किया जाता है।
भीष्म पंचक व्रत भी इसी दौरान
कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की एकादशी से पूर्णिमा तक के पांच दिनों के व्रत को भीष्म पंचक कहा जाता है । दरअसल महाभारत का युद्ध समाप्त होने पर जिस समय भीष्म पितामह सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा में बाणों की शैय्या पर शयन कर रहे थे तब भगवान कृष्ण पांचों पांडवों को साथ लेकर उनके पास गए थे। अवसर पाकर युधिष्ठिर ने भीष्म से उपदेश देने का आग्रह किया था। भीष्म ने पांच दिनों तक राजधर्म वर्णधर्म मोक्षधर्म आदि का उपदेश दिया था। उनका उपदेश सुनकर श्रीकृष्ण संतुष्ट हुए और बोले कि पितामह ! आपने शुक्ल पक्ष की एकादशी से पूर्णिमा तक इन पांच दिनों में जो धर्ममय उपदेश दिया है, उससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। मैं इसकी स्मृति मे आपके नाम पर भीष्म पंचक व्रत स्थापित करता हूं। जो श्रद्धालु इस व्रत को करेंगे वे जीवनभर विविध सुख भोगकर अंत में मोक्ष को प्राप्त होगे ।
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कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी के नाम से जानी जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार जगत माता लक्ष्मी ने क्षीर सागर में शेष शैय्या पर विराजे भगवान विष्णु के अनियमित जागरण शयन पर प्रश्न उठाया। उन्होंने उनसे कहा कि उनके शताब्दियों तक जागते रहने और बाद में इसी तरह सदियों तक सोते रहने से सृष्टि की सारी क्रियायें अनियंत्रित हो गई हैं। मान्यता है कि इसलिए भगवान विष्णु ने शयन जागरण का नियमन करते हुए चातुर्मास का प्रावधान रखा।
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धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन श्रद्धालु तुलसी और शालिगराम विवाह का आयोजन भी रखते हैं। कहा जाता है कि देवता जब जागते है तो पहली प्रार्थना हरिबल्लभ तुलसी की ही सुनते हैं। पद्म पुराण में कथा है कि जब राजा जलंधर की पत्नी वृन्दा के श्राप से भगवान विष्णु पाषाण के हो गये थे, जिस कारण भगवान को शालिगराम भी कहा जाता है। इसी श्राप से मुक्ति पाने के लिए भगवान विष्णु को शालिगराम रूप में तुलसी से विवाह करना पड़ा था।
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बहरहाल धार्मिक मान्यता कुछ भी हो शायद व्यवहारिक तौर पर पुराने समय में वर्षा ऋतु के प्रारंभ होने या मौसम की प्रतिकूलता के चलते उत्पन्न रोगों व अन्य बाधाओं से बचने के लिए ही इस तरह के उपाय किए हाेंगे।
एकादशी शुभ मुहूर्त भी
देव उठनी एकादशी को शुभ मुहूर्त भी माना जाता है। क्योंकि इस दिन भगवान निंद्रा से जाग्रत होते हैं। इसीलिए इस दिन बिना पंचांग देखे विवाह आयोजन सहित अनेक मांगलिक कार्य होते हैं। इस लिए शुभ-अशुभ का विचार नहीं किया जाता है।
भीष्म पंचक व्रत भी इसी दौरान
कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की एकादशी से पूर्णिमा तक के पांच दिनों के व्रत को भीष्म पंचक कहा जाता है । दरअसल महाभारत का युद्ध समाप्त होने पर जिस समय भीष्म पितामह सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा में बाणों की शैय्या पर शयन कर रहे थे तब भगवान कृष्ण पांचों पांडवों को साथ लेकर उनके पास गए थे। अवसर पाकर युधिष्ठिर ने भीष्म से उपदेश देने का आग्रह किया था। भीष्म ने पांच दिनों तक राजधर्म वर्णधर्म मोक्षधर्म आदि का उपदेश दिया था। उनका उपदेश सुनकर श्रीकृष्ण संतुष्ट हुए और बोले कि पितामह ! आपने शुक्ल पक्ष की एकादशी से पूर्णिमा तक इन पांच दिनों में जो धर्ममय उपदेश दिया है, उससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। मैं इसकी स्मृति मे आपके नाम पर भीष्म पंचक व्रत स्थापित करता हूं। जो श्रद्धालु इस व्रत को करेंगे वे जीवनभर विविध सुख भोगकर अंत में मोक्ष को प्राप्त होगे ।