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प्राचीन कुंआ बने कूडा घर, पानी का संकट
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 21 Apr 2016 01:39 AM IST
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water crisis, lalitpur news
- फोटो : amar ujala
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महरौनी (ललितपुर)। कभी सैकड़ों परिवारों की प्यास बुझाने वाले नगर के परंपरागत जलस्रोत प्राचीन कुएं और बावड़ी अपना अस्तित्व बचाने के संकट से जूझ रहे हैं। स्थिति यह है कि अधिकांश कुंआ ऐसे हैं, जो पूरी तरह से सूख चुके हैं। कुछ कुओं का वजूद ही मिट चुका है।
एक समय ऐसा भी था कि महरौनीवासी पेयजल व अन्य घरेलू उपयोग हेतु पानी के लिए कुओं पर निर्भर थे। प्राचीन कुओं के घाटों पर कुछ साल पहले तक रोज सुबह-शाम पानी भरने वालों की भीड़ जमा होती थी और अच्छी खासी चहल-पहल रहती थी, लेकिन अब यहां वीरानी छाई रहती है। जलस्तर नीचे गिरने और समुचित रखरखाव नहीं होने के कारण अधिकांश कुआं सूख चुके हैं और इन कुओं के अंदर झांकने पर अब कचरा के ढेर नजर आते हैं।
लेकिन, कुओं की दुर्दशा होने से कस्बावासियों को पानी के संकट में इन कुओं की उपेक्षा का अहसास हो रहा है। मास्टर कालोनी निवासी राजेश झा हों अथवा अंशुल दुबे, उनका कहना है कि पाइप लाइन, हैंडपंप और बोरिंग सरीखे जल संसाधन आ जाने से कुओं की उपेक्षा होने लगी और स्थिति यह हो गई कि लोगों ने आरामदायक संसाधन से पानी लेना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं पानी लेने में आराम
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महसूस होने पर जल की खूब बरबादी की गई, जिसका नतीजा यह निकला कि अब पानी का संकट हो गया है। पहले कुओं के माध्यम से सिर्फ उतना ही पानी लिया जाता था, जितनी जरूरत होती थी।
पिछले कुछ सालों में अन्य दूसरे जल संसाधन विकसित होने के कारण परंपरागत जलस्रोत धीरे-धीरे उपयोग के बाहर होते चले गए। अब घर-घर में बोरिंग हो गई है, नल कनेक्शन हो गए और गली-मुहल्ले में जगह-जगह सरकारी हैंडपंप लग जाने से लोगों का कुंआ से पानी भरने के काम से मोहभंग हो गया।
इसी वजह से इन प्राचीन कुआं व बावड़ी के रखरखाव पर न तो नागरिकों और न ही प्रशासन द्वारा कोई ध्यान दिया गया। अनेक कुआं अतिक्रमण की चपेट में आकर अपना अस्तित्व खोते जा रहें तो अनेक सूखे पडे़ कुआं अपना वजूद बचाने की चुनौती से जूझ रहे हैं, जबकि इनका इतिहास नगर की पुरानी पीढ़ी के लोगों के लिए वरदान की कहानी अपने आप में समेटे है।
प्राचीन कुओं की बदहाली की दास्तान
नगर के मंडी रोड स्थित प्राचीन शेख का कुआं अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। इसका पानी काफी अच्छा था और इससे साल भर पर्याप्त जलापूर्ति होती थी। इस कुआं पर कुछ समय पहले तक नगर की बड़ी आबादी प्यास बुझाने के लिए निर्भर थी। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि इसके पानी में कुछ दैवीय वरदान था। ऐसी मान्यता थी कि इस पानी से शारीरिक व्याधियों और त्वचा संबंधी रोगों से मुक्ति मिलती है।
इसी वजह से रोज दूसरे मुहल्लों के लोग भी यहां पीने का पानी भरने आते थे। लेकिन, अब ऐसा नहीं है क्योंकि समय के साथ-साथ उपेक्षा का शिकार हुए इस कुएं का वजूद मिटने लगा है। लगभग दस साल से यह कुआं सूखा पड़ा है और लोग इसमें कूड़ा करकट फेंकने लगे हैं। कुंआ में कचरा डाले से अब इसकी गहराई बहुत कम बची है।
इसी तरह रामलीला मैदान स्थित प्राचीन कुआं भी लगभग एक दशक से सूखा पड़ा है। इससे पहले तक इस कुआं पर पानी भरने वालों के नंबर लगते थे, लेकिन समय के साथ-साथ यह भी उपेक्षा का शिकार होता गया। कुछ साल पहले इस कुआं की जगत पर अतिक्रमण भी हो चुका है और सूखा पड़ा यह कुंआ भी धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर है ।
पुराना सौजना रोड दलित बस्ती स्थित प्राचीन कुआं भी सूख चुका है और इससे मुहल्लेवालों की मुसीबतें बढ़ गई हैं, क्योंकि मुहल्ले के अधिकांश परिवार इसी कुंआ पर जलापूर्ति हेतु आश्रित थे। अभी केवल बरसात के दिनों में ही कुआं में पानी नजर आता है और बाकी दिनों में इसकी सतह पर कीचड़ अथवा सूखा रहता है। वहीं, किले के हनुमान मंदिर के पीछे स्थित प्रसिद्ध जमुनिया कुंआ भी धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खोता जा रहा है। यह कुआं भी सूख चुका है। इस कुआं में पिछले कुछ सालों तक भगवान का जलविहार कराया जाता था, लेकिन अब इसमें जल नहीं, बस गंदगी का अंबार है।
इसी प्रकार कोतवाली के बाहर बाबा साहब की मजार के बगल में स्थित प्राचीन बावड़ी भी अब सूख गई है, जिसमें हमेशा पानी बना रहता था। बताया जाता है कि इस बावड़ी से एक प्राचीन सुरंग मार्ग निकलता है जो बानपुर स्थित महाराजा मर्दन सिंह के किले तक जाता है। यह मार्ग आपातकालीन स्थिति में प्रयोग में लाया जाता था और काफी चौड़ा भी था, जिससे घोड़े तक दौड़ाए जा सकते थे। अब बावड़ी के सूखने के बाद इसको ऊपर से पूरी तरह ढंक दिया गया है।
कोतवाली के बाहर मैदान में सद्भावना मंच के ठीक सामने आठ-दस साल पहले तक प्रसिद्ध लेन का कुआं हुआ करता था, लेकिन धीरे-धीरे यह कुआं पूर्ण रूप से गायब हो गया है और वह स्थान अब समतल होकर आम रास्ते में मिल गया है। मास्टर कालोनी में देवी मंदिर के पास का प्राचीन कुआं भी कचरे और गंदगी से पूरी तरह पट चुका है और इसका भी अस्तित्व खत्म होने की कगार पर है।
इसी तरह नगर के कुछ अन्य प्रसिद्ध प्राचीन कुआं जिनमें कोतवाली परिसर के अंदर का कुआं, तहसील का कुआं, पशु अस्पताल के समीप का कुआं, बाबा का कुआं और अन्य छोटे-बडे कुआं भी लगातार गिरते जल स्तर और उपेक्षा का शिकार होने के कारण अपने अस्तित्व को बचाने के संकट से जूझ रहे हैं।
जल की कीमत अनमोल
महरौनी। सूखा के संकट में जल की अहमियत समझ में आती है, लेकिन यदि पानी का सदुपयोग किया जाए तो काफी हद तक इसकी कमी से बचा जा सकता है।
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एक समय ऐसा भी था कि महरौनीवासी पेयजल व अन्य घरेलू उपयोग हेतु पानी के लिए कुओं पर निर्भर थे। प्राचीन कुओं के घाटों पर कुछ साल पहले तक रोज सुबह-शाम पानी भरने वालों की भीड़ जमा होती थी और अच्छी खासी चहल-पहल रहती थी, लेकिन अब यहां वीरानी छाई रहती है। जलस्तर नीचे गिरने और समुचित रखरखाव नहीं होने के कारण अधिकांश कुआं सूख चुके हैं और इन कुओं के अंदर झांकने पर अब कचरा के ढेर नजर आते हैं।
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लेकिन, कुओं की दुर्दशा होने से कस्बावासियों को पानी के संकट में इन कुओं की उपेक्षा का अहसास हो रहा है। मास्टर कालोनी निवासी राजेश झा हों अथवा अंशुल दुबे, उनका कहना है कि पाइप लाइन, हैंडपंप और बोरिंग सरीखे जल संसाधन आ जाने से कुओं की उपेक्षा होने लगी और स्थिति यह हो गई कि लोगों ने आरामदायक संसाधन से पानी लेना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं पानी लेने में आराम
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महसूस होने पर जल की खूब बरबादी की गई, जिसका नतीजा यह निकला कि अब पानी का संकट हो गया है। पहले कुओं के माध्यम से सिर्फ उतना ही पानी लिया जाता था, जितनी जरूरत होती थी।
पिछले कुछ सालों में अन्य दूसरे जल संसाधन विकसित होने के कारण परंपरागत जलस्रोत धीरे-धीरे उपयोग के बाहर होते चले गए। अब घर-घर में बोरिंग हो गई है, नल कनेक्शन हो गए और गली-मुहल्ले में जगह-जगह सरकारी हैंडपंप लग जाने से लोगों का कुंआ से पानी भरने के काम से मोहभंग हो गया।
इसी वजह से इन प्राचीन कुआं व बावड़ी के रखरखाव पर न तो नागरिकों और न ही प्रशासन द्वारा कोई ध्यान दिया गया। अनेक कुआं अतिक्रमण की चपेट में आकर अपना अस्तित्व खोते जा रहें तो अनेक सूखे पडे़ कुआं अपना वजूद बचाने की चुनौती से जूझ रहे हैं, जबकि इनका इतिहास नगर की पुरानी पीढ़ी के लोगों के लिए वरदान की कहानी अपने आप में समेटे है।
प्राचीन कुओं की बदहाली की दास्तान
नगर के मंडी रोड स्थित प्राचीन शेख का कुआं अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। इसका पानी काफी अच्छा था और इससे साल भर पर्याप्त जलापूर्ति होती थी। इस कुआं पर कुछ समय पहले तक नगर की बड़ी आबादी प्यास बुझाने के लिए निर्भर थी। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि इसके पानी में कुछ दैवीय वरदान था। ऐसी मान्यता थी कि इस पानी से शारीरिक व्याधियों और त्वचा संबंधी रोगों से मुक्ति मिलती है।
इसी वजह से रोज दूसरे मुहल्लों के लोग भी यहां पीने का पानी भरने आते थे। लेकिन, अब ऐसा नहीं है क्योंकि समय के साथ-साथ उपेक्षा का शिकार हुए इस कुएं का वजूद मिटने लगा है। लगभग दस साल से यह कुआं सूखा पड़ा है और लोग इसमें कूड़ा करकट फेंकने लगे हैं। कुंआ में कचरा डाले से अब इसकी गहराई बहुत कम बची है।
इसी तरह रामलीला मैदान स्थित प्राचीन कुआं भी लगभग एक दशक से सूखा पड़ा है। इससे पहले तक इस कुआं पर पानी भरने वालों के नंबर लगते थे, लेकिन समय के साथ-साथ यह भी उपेक्षा का शिकार होता गया। कुछ साल पहले इस कुआं की जगत पर अतिक्रमण भी हो चुका है और सूखा पड़ा यह कुंआ भी धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर है ।
पुराना सौजना रोड दलित बस्ती स्थित प्राचीन कुआं भी सूख चुका है और इससे मुहल्लेवालों की मुसीबतें बढ़ गई हैं, क्योंकि मुहल्ले के अधिकांश परिवार इसी कुंआ पर जलापूर्ति हेतु आश्रित थे। अभी केवल बरसात के दिनों में ही कुआं में पानी नजर आता है और बाकी दिनों में इसकी सतह पर कीचड़ अथवा सूखा रहता है। वहीं, किले के हनुमान मंदिर के पीछे स्थित प्रसिद्ध जमुनिया कुंआ भी धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खोता जा रहा है। यह कुआं भी सूख चुका है। इस कुआं में पिछले कुछ सालों तक भगवान का जलविहार कराया जाता था, लेकिन अब इसमें जल नहीं, बस गंदगी का अंबार है।
इसी प्रकार कोतवाली के बाहर बाबा साहब की मजार के बगल में स्थित प्राचीन बावड़ी भी अब सूख गई है, जिसमें हमेशा पानी बना रहता था। बताया जाता है कि इस बावड़ी से एक प्राचीन सुरंग मार्ग निकलता है जो बानपुर स्थित महाराजा मर्दन सिंह के किले तक जाता है। यह मार्ग आपातकालीन स्थिति में प्रयोग में लाया जाता था और काफी चौड़ा भी था, जिससे घोड़े तक दौड़ाए जा सकते थे। अब बावड़ी के सूखने के बाद इसको ऊपर से पूरी तरह ढंक दिया गया है।
कोतवाली के बाहर मैदान में सद्भावना मंच के ठीक सामने आठ-दस साल पहले तक प्रसिद्ध लेन का कुआं हुआ करता था, लेकिन धीरे-धीरे यह कुआं पूर्ण रूप से गायब हो गया है और वह स्थान अब समतल होकर आम रास्ते में मिल गया है। मास्टर कालोनी में देवी मंदिर के पास का प्राचीन कुआं भी कचरे और गंदगी से पूरी तरह पट चुका है और इसका भी अस्तित्व खत्म होने की कगार पर है।
इसी तरह नगर के कुछ अन्य प्रसिद्ध प्राचीन कुआं जिनमें कोतवाली परिसर के अंदर का कुआं, तहसील का कुआं, पशु अस्पताल के समीप का कुआं, बाबा का कुआं और अन्य छोटे-बडे कुआं भी लगातार गिरते जल स्तर और उपेक्षा का शिकार होने के कारण अपने अस्तित्व को बचाने के संकट से जूझ रहे हैं।
जल की कीमत अनमोल
महरौनी। सूखा के संकट में जल की अहमियत समझ में आती है, लेकिन यदि पानी का सदुपयोग किया जाए तो काफी हद तक इसकी कमी से बचा जा सकता है।