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अस्सी करोड़ मिट्टी में मिले, गूल गायब
lalitpur
Updated Mon, 21 Nov 2016 12:49 AM IST
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कृष्ा
- फोटो : amar ujala
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खेतों की सिंचाई के लिए रामगंगा कमांड परियोजना द्वारा अस्सी करोड़ रुपये की लागत से जनपद में बनवाईं गईं अधिकांश गूलें गायब हो गई हैं। जो बची हैं, वे भी जर्जर हैं, जिससे पानी रुक नहीं रहा है। बुंदेलखंड विकास पैकेज से बनवाई गईं इन गूलों में कटाव होने पर खेतों में पानी भर रहा है। इस कारण किसान परेशान हैं। ऐसे हालातों में अनेक किसानों ने खुद कच्ची गूलें बनाकर पानी खेतों में पहुंचाना शुरू कर दिया है।
बुंदेलखंड पैकेज से जनपद में सिंचाई सुविधा आसान करने के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए गए। बांधों से नहरें निकालने के अलावा गूलों का जाल बिछाने की योजना बनाई गई। गूलें बनाने का काम रामगंगा कमांड परियोजना को सौंपा गया। 2009-10 में बारह डिवीजन बनाकर जनपद के विभिन्न इलाकों में गूलें बनवाईं। सबसे ज्यादा गूलों का निर्माण जाखलौन पंप कैनाल व लोअर राजघाट कैनाल पर किया गया। चार लाख बारह हजार अड़तीस मीटर लंबी पक्की गूलें बनाईं गईं। वहीं, बारह लाख उनहत्तर हजार छप्पन मीटर लंबी कच्ची गूलें भी बनाईं गईं। शुरूआत से ही यह पैकेज की योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई। गूलों को बनाने में मानकों को दरकिनार कर दिया गया। खराब गुणवत्ता की गूलें बनाईं गईं। इस कारण ये कुछ दिन ही किसानों को सहारा दे सकीं। पानी का बहाव होते ही गूलें फटने लगीं।
नतीजा यह रहा कि अधिकांश पक्की गूलें गायब हो चुकी हैं। कुछ जगह गूल बची भी हैं, तो वे केवल नाम मात्र की रह गई हैं। ऐसे हालातों में किसानों को कच्ची गूल के सहारे खेतों में पानी पहुंचाना पड़ रहा है। कई जगहों पर कच्ची गूल के फट जाने से खेतों में पानी भर रहा है, जिससे किसान परेशान हैं। वहीं, दूसरी तरफ पाइपों व पंप से पानी पहुंचाने के लिए किसानों को काफी रुपया भी खर्च करना पड़ रहा है।
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कच्ची गूलों के नाम पर भी हुआ खेल
चार करोड़ रुपये बनाई गईं कच्ची गूल में भी खूब खेल किया गया। कागजों में कच्ची गूल बना दी गईं और भुगतान निकाल लिया गया। जांच के दौरान कच्ची गूल न मिलने पर विभागीय अधिकारियों ने किसानों पर सारा दोष मढ़ दिया। उन्होंने कहा कि किसानों ने गूल को खेत में जोत दिया। जानकारों का कहना है कि आधे से ज्यादा गूल कागजों में बनाई गईं। यही कारण है कि गूलों का निशान तक नहीं बचा है।
यह था उद्देश्य
सूखे से जूझ रहे जनपद में गूलें बनाने का मकसद मुख्य नहर से खेतों तक बिना बर्बाद हुए आसानी से पानी पहुंचाना था। सिंचाई विभाग की मानें तो पक्की गूलों से सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध होने पर बीस फीसदी पानी की हानि रुकती है।
कहीं हो रहा पानी बर्बाद तो कहीं सूखी पड़ी नहर
वर्तमान में जाखलौन पंप कैनाल व लोअर राजघाट कैनाल पर कई जगहों पर पानी की बर्बादी हो रही है। वहीं दोनों कैनाल के टेल पर बसे गांव के लोग पानी के अभाव में खेत में बुआई नहीं कर पा रहे हैं।
एक ठोकर में टूटती थी गूल
ग्राम दावनी के बुजुर्ग किसान नन्हे लोधी बताते हैं कि सरकार द्वारा बनाई गूलें इतनी कमजोर थी कि एक ठोकर में ही टूट जाती थीं। वह बताते हैं कि अगर यह गूलें मजबूत बनाईं जातीं तो किसानों को खेत में पानी के लिए मशक्क्त नहीं करनी पड़ती। ग्राम दावनी में कई किसानों ने सामूहिक रुप से मेहनत करके कच्ची गूल बनाईं है, जिसके जरिए जाखलौन पंप कैनाल की मुख्य नहर से पानी खेतों तक पहुंचाया जा रहा है।
जांच हुई, कार्रवाई नहीं
रामगंगा कमांड की 12 इकाइयों द्वारा जनपद में करोड़ों रुपयों की बनाईं गईं गूलों की गुणवत्ता की शिकायत प्रदेश व केंद्र सरकार से की गई। बुंदेलखंड विकास पैकेज का क्रियान्वयन करने वाली संस्था रेनफेड के चेयरमैन जेएस सामरा ने भी गूलों की जांच की। उन्होंने जांच में गूलों की गुणवत्ता खराब पायी थी, लेकिन इसके बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई।
शासन ने फिर बजट दिया, पर नहीं हुआ काम
किसानों ने गूलों के निर्माण के समय ही एक खंडे के उपयोग पर सवाल उठाए थे। किसानों का कहना था कि एक खंडे की गूल ज्यादा दिनों तक सलामत नहीं रहेगी। हुआ भी यही। इसे देखते हुए तत्कालीन जिलाधिकारी निधि केसरवानी ने शासन को दो खंडे की गूल बनाने के लिए बजट जारी करने को पत्र लिखा। पत्र पर एक्शन लेते हुए शासन ने नया बजट जारी कर दिया था, लेकिन दो खंडे की गूल बनाने के लिए दी गई दर पर कोई ठेकेदार काम करने को तैयार नहीं हुआ। इस कारण से भेजा गया बजट वापस हो गया।
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बुंदेलखंड पैकेज से जनपद में सिंचाई सुविधा आसान करने के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए गए। बांधों से नहरें निकालने के अलावा गूलों का जाल बिछाने की योजना बनाई गई। गूलें बनाने का काम रामगंगा कमांड परियोजना को सौंपा गया। 2009-10 में बारह डिवीजन बनाकर जनपद के विभिन्न इलाकों में गूलें बनवाईं। सबसे ज्यादा गूलों का निर्माण जाखलौन पंप कैनाल व लोअर राजघाट कैनाल पर किया गया। चार लाख बारह हजार अड़तीस मीटर लंबी पक्की गूलें बनाईं गईं। वहीं, बारह लाख उनहत्तर हजार छप्पन मीटर लंबी कच्ची गूलें भी बनाईं गईं। शुरूआत से ही यह पैकेज की योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई। गूलों को बनाने में मानकों को दरकिनार कर दिया गया। खराब गुणवत्ता की गूलें बनाईं गईं। इस कारण ये कुछ दिन ही किसानों को सहारा दे सकीं। पानी का बहाव होते ही गूलें फटने लगीं।
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नतीजा यह रहा कि अधिकांश पक्की गूलें गायब हो चुकी हैं। कुछ जगह गूल बची भी हैं, तो वे केवल नाम मात्र की रह गई हैं। ऐसे हालातों में किसानों को कच्ची गूल के सहारे खेतों में पानी पहुंचाना पड़ रहा है। कई जगहों पर कच्ची गूल के फट जाने से खेतों में पानी भर रहा है, जिससे किसान परेशान हैं। वहीं, दूसरी तरफ पाइपों व पंप से पानी पहुंचाने के लिए किसानों को काफी रुपया भी खर्च करना पड़ रहा है।
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कच्ची गूलों के नाम पर भी हुआ खेल
चार करोड़ रुपये बनाई गईं कच्ची गूल में भी खूब खेल किया गया। कागजों में कच्ची गूल बना दी गईं और भुगतान निकाल लिया गया। जांच के दौरान कच्ची गूल न मिलने पर विभागीय अधिकारियों ने किसानों पर सारा दोष मढ़ दिया। उन्होंने कहा कि किसानों ने गूल को खेत में जोत दिया। जानकारों का कहना है कि आधे से ज्यादा गूल कागजों में बनाई गईं। यही कारण है कि गूलों का निशान तक नहीं बचा है।
यह था उद्देश्य
सूखे से जूझ रहे जनपद में गूलें बनाने का मकसद मुख्य नहर से खेतों तक बिना बर्बाद हुए आसानी से पानी पहुंचाना था। सिंचाई विभाग की मानें तो पक्की गूलों से सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध होने पर बीस फीसदी पानी की हानि रुकती है।
कहीं हो रहा पानी बर्बाद तो कहीं सूखी पड़ी नहर
वर्तमान में जाखलौन पंप कैनाल व लोअर राजघाट कैनाल पर कई जगहों पर पानी की बर्बादी हो रही है। वहीं दोनों कैनाल के टेल पर बसे गांव के लोग पानी के अभाव में खेत में बुआई नहीं कर पा रहे हैं।
एक ठोकर में टूटती थी गूल
ग्राम दावनी के बुजुर्ग किसान नन्हे लोधी बताते हैं कि सरकार द्वारा बनाई गूलें इतनी कमजोर थी कि एक ठोकर में ही टूट जाती थीं। वह बताते हैं कि अगर यह गूलें मजबूत बनाईं जातीं तो किसानों को खेत में पानी के लिए मशक्क्त नहीं करनी पड़ती। ग्राम दावनी में कई किसानों ने सामूहिक रुप से मेहनत करके कच्ची गूल बनाईं है, जिसके जरिए जाखलौन पंप कैनाल की मुख्य नहर से पानी खेतों तक पहुंचाया जा रहा है।
जांच हुई, कार्रवाई नहीं
रामगंगा कमांड की 12 इकाइयों द्वारा जनपद में करोड़ों रुपयों की बनाईं गईं गूलों की गुणवत्ता की शिकायत प्रदेश व केंद्र सरकार से की गई। बुंदेलखंड विकास पैकेज का क्रियान्वयन करने वाली संस्था रेनफेड के चेयरमैन जेएस सामरा ने भी गूलों की जांच की। उन्होंने जांच में गूलों की गुणवत्ता खराब पायी थी, लेकिन इसके बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई।
शासन ने फिर बजट दिया, पर नहीं हुआ काम
किसानों ने गूलों के निर्माण के समय ही एक खंडे के उपयोग पर सवाल उठाए थे। किसानों का कहना था कि एक खंडे की गूल ज्यादा दिनों तक सलामत नहीं रहेगी। हुआ भी यही। इसे देखते हुए तत्कालीन जिलाधिकारी निधि केसरवानी ने शासन को दो खंडे की गूल बनाने के लिए बजट जारी करने को पत्र लिखा। पत्र पर एक्शन लेते हुए शासन ने नया बजट जारी कर दिया था, लेकिन दो खंडे की गूल बनाने के लिए दी गई दर पर कोई ठेकेदार काम करने को तैयार नहीं हुआ। इस कारण से भेजा गया बजट वापस हो गया।