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न जाने कितनी सीतायें रावणों के अनीति बंधन में हैं...
Updated Sun, 21 Oct 2018 02:00 AM IST
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न जाने कितनी सीताएं रावणों के अनीति बंधन में हैं...
दशहरा पर्व के उपलक्ष्य में आयोजित हुआ कवि सम्मेलन
अमर उजाला ब्यूरो
ललितपुर। असत्य पर सत्य की जीत विजयादशमी दशहरा के पावन पर्व पर कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। जिसमें शायरों एवं कवियों ने देश में अमन शांति के लिए माता जगदंबे से प्रार्थनाएं कीं। साथ ही अपनी रचनाओं, गीतों गजलों से श्रोताओं का मन हो लिया।
हिंदी, उर्दू, अदबी साहित्यिक संस्था के अध्यक्ष व कवि रामकृष्ण कुशवाहा ने शेर पढ़ते हुए कहा कि न जाने कितनी सीताएं रावणों के अनीति बंधन में हैं, लंका दहन को तुम इतने हनुमान कहां से लाओगे। रामस्वरूप नामदेव अनुरागी ने गीत पढ़ते हुए कहा कि सुर असुरों ने पूजा तुमको तेरी लीला न्यारी है, जग जननी है मां तेरी तो सिंह सवारी है। युवा शायर पूनम रानी ने गजल पढ़ते हुए कहा. खूबसूरती में गुलाब जैसी है, मेरी जिंदगी किताब जैसी है। केके पाठक ने अपनी प्रस्तुति देते हुए कहा कि पत्थरों की मूरतों को कितना सजा रहे हो, फिर मां के लाड़लों को काहे रुला रहे हो। दशरथ पटेल परदेशी ने कहा कि हम अमन के पुजारी संदेश है अमन का, खिला रहे हर फूल में देश के चमन का। हास्य कवि किशन सिंह बंजारा ने कहा कि राजनीति में नेताजी खूब फले फूले, कटोरा लेके आए थे सूटकेस लेके चले। एमआर खान सोज ने कहा कि रेजा रेजा बिखर गया हूं मैं। अशोक क्रांतिकारी ने कहा कि भ्रष्टाचार का रावण हंस रहा था, क्योंकि कागज का रावण जल रहा था। श्रीराम काका ललितपुरी ने कहा कि कभी चांदी का जूता भी काम कर जाता है, और कभी शर्म से आदमी मर जाता है। कवियित्री सुमनलता शर्मा चांदनी ने कहा कि धूम मची नवरातों की मां के सजे हुए दरबार, खड़े भक्त द्वारे पे मां के बोले जय जाय कारा। कार्यक्रम में श्रीराम काका ललितपुरी, शिखरचंद मुफलिस, एमआर भटनागर, श्यामलाल श्याम, सरवर हिंदोस्तानी, मधुर, अरविंद, त्रिवेणी देवी, कमला देवी, सुनयना, शेफाली त्रिपाठी, स्नेहा पंथ, जितेंद्र पंथ, गीता कुशवाहा, संजय, नंदलाल पहलवान, राजाराम खटीक, कैलाश नारायण, हरगोविंद अहिरवार व मनीष कुशवाहा आदि उपस्थित रहे।
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दशहरा पर्व के उपलक्ष्य में आयोजित हुआ कवि सम्मेलन
अमर उजाला ब्यूरो
ललितपुर। असत्य पर सत्य की जीत विजयादशमी दशहरा के पावन पर्व पर कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। जिसमें शायरों एवं कवियों ने देश में अमन शांति के लिए माता जगदंबे से प्रार्थनाएं कीं। साथ ही अपनी रचनाओं, गीतों गजलों से श्रोताओं का मन हो लिया।
हिंदी, उर्दू, अदबी साहित्यिक संस्था के अध्यक्ष व कवि रामकृष्ण कुशवाहा ने शेर पढ़ते हुए कहा कि न जाने कितनी सीताएं रावणों के अनीति बंधन में हैं, लंका दहन को तुम इतने हनुमान कहां से लाओगे। रामस्वरूप नामदेव अनुरागी ने गीत पढ़ते हुए कहा कि सुर असुरों ने पूजा तुमको तेरी लीला न्यारी है, जग जननी है मां तेरी तो सिंह सवारी है। युवा शायर पूनम रानी ने गजल पढ़ते हुए कहा. खूबसूरती में गुलाब जैसी है, मेरी जिंदगी किताब जैसी है। केके पाठक ने अपनी प्रस्तुति देते हुए कहा कि पत्थरों की मूरतों को कितना सजा रहे हो, फिर मां के लाड़लों को काहे रुला रहे हो। दशरथ पटेल परदेशी ने कहा कि हम अमन के पुजारी संदेश है अमन का, खिला रहे हर फूल में देश के चमन का। हास्य कवि किशन सिंह बंजारा ने कहा कि राजनीति में नेताजी खूब फले फूले, कटोरा लेके आए थे सूटकेस लेके चले। एमआर खान सोज ने कहा कि रेजा रेजा बिखर गया हूं मैं। अशोक क्रांतिकारी ने कहा कि भ्रष्टाचार का रावण हंस रहा था, क्योंकि कागज का रावण जल रहा था। श्रीराम काका ललितपुरी ने कहा कि कभी चांदी का जूता भी काम कर जाता है, और कभी शर्म से आदमी मर जाता है। कवियित्री सुमनलता शर्मा चांदनी ने कहा कि धूम मची नवरातों की मां के सजे हुए दरबार, खड़े भक्त द्वारे पे मां के बोले जय जाय कारा। कार्यक्रम में श्रीराम काका ललितपुरी, शिखरचंद मुफलिस, एमआर भटनागर, श्यामलाल श्याम, सरवर हिंदोस्तानी, मधुर, अरविंद, त्रिवेणी देवी, कमला देवी, सुनयना, शेफाली त्रिपाठी, स्नेहा पंथ, जितेंद्र पंथ, गीता कुशवाहा, संजय, नंदलाल पहलवान, राजाराम खटीक, कैलाश नारायण, हरगोविंद अहिरवार व मनीष कुशवाहा आदि उपस्थित रहे।
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