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धूमधाम से मनाया गया कजलियों का त्योहार
Updated Tue, 28 Aug 2018 01:25 AM IST
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धूमधाम से मनाया कजलियों का त्योहार
पाली (ललितपुर)। पाली में धूमधाम से कजलियों का त्योहार मनाया गया। इस मौके पर लोगों ने एक दूसरे को कजलियां देकर और गले मिलकर बधाईयां दी। इस दौरान कजलियों को अपने घरों में उगाने वाले लोगों ने मोहल्ले और आसपास के लोगों को एकत्रित कर भुजरया ताल पर गये और वहां पर कजलियों को साफ किया गया। महिलाएं मांगलिक गीत गाती हुई कजलियां अवध बिहारी मंदिर एवं नीलकंठेश्वर मंदिर, हजारिया मंदिर पर अर्पित की, इसके बाद शुरू हुआ एक दूसरे को कजलियों को अदान-प्रदान करने का सिलसिला जो देर रात तक चलता रहा। नगर के आसपास ग्रामीण अंचलों और कस्बाई इलाकों के लोगों ने नदियों, तालाबों और पोखरों में कजलियों को प्रवाहित कर भगवान को चढ़ाने के बाद एक दूसरे को कजलियां की शाखा देते हुए हर जन्म में इस तरह के मित्र, सखा, बंधु, परिवार और ग्रामीण मिलने की कामना की तथा लोगों को घर में बुलाकर बैठाकर कजलियों का त्योहार धूमधाम से मनाया गया। आल्हा ऊदल के विजय उत्सव का प्रतीक कजली उत्सव विंध्य क्षेत्र में लगातार रक्षाबंधन के दूसरे दिन कजलियां विसर्जित किया था। बताया जाता है कि यह त्योहार उन्हीं के याद में लगातार मनाया जा रहा है। आल्हाखंड के भुजरियों की लड़ाई में इस प्रसंगा का संपूर्ण वर्णन भी किया गया है। इसलिए इस त्योहार को एक दूसरे के साथ मिलकर विजय उत्सव के रूप में आज भी मनाया जा रहा है। नगर और आसपास ग्रामों में यह त्योहार बड़े ही धूम.धाम से मनाया गया।
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पाली (ललितपुर)। पाली में धूमधाम से कजलियों का त्योहार मनाया गया। इस मौके पर लोगों ने एक दूसरे को कजलियां देकर और गले मिलकर बधाईयां दी। इस दौरान कजलियों को अपने घरों में उगाने वाले लोगों ने मोहल्ले और आसपास के लोगों को एकत्रित कर भुजरया ताल पर गये और वहां पर कजलियों को साफ किया गया। महिलाएं मांगलिक गीत गाती हुई कजलियां अवध बिहारी मंदिर एवं नीलकंठेश्वर मंदिर, हजारिया मंदिर पर अर्पित की, इसके बाद शुरू हुआ एक दूसरे को कजलियों को अदान-प्रदान करने का सिलसिला जो देर रात तक चलता रहा। नगर के आसपास ग्रामीण अंचलों और कस्बाई इलाकों के लोगों ने नदियों, तालाबों और पोखरों में कजलियों को प्रवाहित कर भगवान को चढ़ाने के बाद एक दूसरे को कजलियां की शाखा देते हुए हर जन्म में इस तरह के मित्र, सखा, बंधु, परिवार और ग्रामीण मिलने की कामना की तथा लोगों को घर में बुलाकर बैठाकर कजलियों का त्योहार धूमधाम से मनाया गया। आल्हा ऊदल के विजय उत्सव का प्रतीक कजली उत्सव विंध्य क्षेत्र में लगातार रक्षाबंधन के दूसरे दिन कजलियां विसर्जित किया था। बताया जाता है कि यह त्योहार उन्हीं के याद में लगातार मनाया जा रहा है। आल्हाखंड के भुजरियों की लड़ाई में इस प्रसंगा का संपूर्ण वर्णन भी किया गया है। इसलिए इस त्योहार को एक दूसरे के साथ मिलकर विजय उत्सव के रूप में आज भी मनाया जा रहा है। नगर और आसपास ग्रामों में यह त्योहार बड़े ही धूम.धाम से मनाया गया।