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खर-दूषण् बध के बाद रावण ने किया सीता हरण
Updated Fri, 02 Nov 2018 02:12 AM IST
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खर-दूषण वध के बाद रावण ने किया सीता हरण
रामलीला के आठवें दिन किया गया मंचन
अमर उजाला ब्यूरो
बार (ललितपुर)। ग्राम बस्तगुवां में रामलीला के आठवें दिन खर-दूषण वध और सीताहरण की लीला का आयोजन किया गया। भगवान श्रीराम ने चित्रकूट में सभी ऋषियों, मुनियों से भेंट कर धर्म, दर्शन, ज्ञान से संबंध में चर्चा की, वह ऋषि-अगस्त, सती अनुसुइया से भी मिले। सभी ऋषियों को श्रीराम ने प्रणाम कर कुशल क्षेम पूछी। सीताजी ने सती अनुसुइया से आदर्श पत्नी के गुण एवं कर्तव्य पालन के बारे में विस्तार से जानकारी ली। रावण की बहिन सूपनखा सुंदर भेष में भगवान श्रीराम एवं लक्ष्मण के पास विवाह का प्रस्ताव लेकर आयी। श्रीराम ने कहा उनके साथ उनकी पत्नी सीता है एक पत्नी के होते हुये वह दूसरा विवाह कैसे कर सकते हैं। इसके बाद वह लक्ष्मण के पास गई, तो लक्ष्मण ने विवाह करने से मना कर दिया। बाद में वह राक्षसी भेष में आकर क्रोधित होकर भगवान को खाने के लिये दौड़ी, जिस पर लक्ष्मण ने धनुष बाण से सूपनखा की नाक काट दी, वह रोते हुये अपने भाई खर-दूषण के पास पहुंची, इसके बाद खर-दूषण का श्रीराम के साथ भयानक युद्ध हुआ, श्रीराम ने खर व दूषण को यमलोक भेज दिया, बाद में सूपनखा रोती बिलखती हुई दशानन रावण के पास पहुँची, पूरा वितांत रावण को सुनाया, रावण ने क्रोधित होकर कहा कि जिन तपसि लक्ष्मण ने मेरे बहिना की नाक काटी है और खर दूषण का वध किया है मैं उनका बदला लूंगा। रावण ने सीता का हरण करने का निर्णय लिया। रावण मामा मारीच के पास गया, रावण ने मारीच से सोने का हिरन बनने का प्रस्ताव प्रेषित किया, मारीच ने रावण के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया, बाद में रावण माता सीता की कुटी में ब्राह्मण के भेष में भिक्षा मांगने गया। सीता से लक्ष्मण द्वारा खीची गयी रेखा से बाहर निकलकर भिक्षा देने की कहा, सीता ने मना कर दिया, बाद में ब्राह्मण के अनुरोध को सीता ने स्वीकार कर लिया, अकेले में रावण ने माता सीता का हरण कर लिया, जटायू ने रास्ते मे रावण को रोका, इसके बाद जटायु और रावण को युद्ध हुआ, रावण ने चंदहास तलवार से जटायू के पंख काट दिये, वह भूमि पर गिर पड़ा। कथा के व्यास रामेश्वर पटैरिया रहे। संचालन देव नारायण दुबे ने किया। इस मौके पर रामकिशोर बबेले, रामरक्षपाल सिंह, महेंद्र प्रताप सिंह, वीरेंद्र प्रताप सिंह, सोनेजू, जय सिंह, नीरज भार्गव, राकेश भार्गव, जयपाल सिंह, भानसिंह, सोन सिंह, बाबूलाल, शिवराज कुशवाहा आदि का विशेष सहयोग रहा ।
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रामलीला के आठवें दिन किया गया मंचन
अमर उजाला ब्यूरो
बार (ललितपुर)। ग्राम बस्तगुवां में रामलीला के आठवें दिन खर-दूषण वध और सीताहरण की लीला का आयोजन किया गया। भगवान श्रीराम ने चित्रकूट में सभी ऋषियों, मुनियों से भेंट कर धर्म, दर्शन, ज्ञान से संबंध में चर्चा की, वह ऋषि-अगस्त, सती अनुसुइया से भी मिले। सभी ऋषियों को श्रीराम ने प्रणाम कर कुशल क्षेम पूछी। सीताजी ने सती अनुसुइया से आदर्श पत्नी के गुण एवं कर्तव्य पालन के बारे में विस्तार से जानकारी ली। रावण की बहिन सूपनखा सुंदर भेष में भगवान श्रीराम एवं लक्ष्मण के पास विवाह का प्रस्ताव लेकर आयी। श्रीराम ने कहा उनके साथ उनकी पत्नी सीता है एक पत्नी के होते हुये वह दूसरा विवाह कैसे कर सकते हैं। इसके बाद वह लक्ष्मण के पास गई, तो लक्ष्मण ने विवाह करने से मना कर दिया। बाद में वह राक्षसी भेष में आकर क्रोधित होकर भगवान को खाने के लिये दौड़ी, जिस पर लक्ष्मण ने धनुष बाण से सूपनखा की नाक काट दी, वह रोते हुये अपने भाई खर-दूषण के पास पहुंची, इसके बाद खर-दूषण का श्रीराम के साथ भयानक युद्ध हुआ, श्रीराम ने खर व दूषण को यमलोक भेज दिया, बाद में सूपनखा रोती बिलखती हुई दशानन रावण के पास पहुँची, पूरा वितांत रावण को सुनाया, रावण ने क्रोधित होकर कहा कि जिन तपसि लक्ष्मण ने मेरे बहिना की नाक काटी है और खर दूषण का वध किया है मैं उनका बदला लूंगा। रावण ने सीता का हरण करने का निर्णय लिया। रावण मामा मारीच के पास गया, रावण ने मारीच से सोने का हिरन बनने का प्रस्ताव प्रेषित किया, मारीच ने रावण के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया, बाद में रावण माता सीता की कुटी में ब्राह्मण के भेष में भिक्षा मांगने गया। सीता से लक्ष्मण द्वारा खीची गयी रेखा से बाहर निकलकर भिक्षा देने की कहा, सीता ने मना कर दिया, बाद में ब्राह्मण के अनुरोध को सीता ने स्वीकार कर लिया, अकेले में रावण ने माता सीता का हरण कर लिया, जटायू ने रास्ते मे रावण को रोका, इसके बाद जटायु और रावण को युद्ध हुआ, रावण ने चंदहास तलवार से जटायू के पंख काट दिये, वह भूमि पर गिर पड़ा। कथा के व्यास रामेश्वर पटैरिया रहे। संचालन देव नारायण दुबे ने किया। इस मौके पर रामकिशोर बबेले, रामरक्षपाल सिंह, महेंद्र प्रताप सिंह, वीरेंद्र प्रताप सिंह, सोनेजू, जय सिंह, नीरज भार्गव, राकेश भार्गव, जयपाल सिंह, भानसिंह, सोन सिंह, बाबूलाल, शिवराज कुशवाहा आदि का विशेष सहयोग रहा ।