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पोस्टमार्टम रिपोर्ट में खुलासा, डायरिया से हुई थी बाघिन की मौत
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किशनपुर सेंक्चुरी में घटनास्थल की छानबीन करते अफसर, साथ में वन कर्मी। संवाद
- फोटो : LAKHIMPUR
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बांकेगंज (लखीमपुर खीरी)। दुधवा टाइगर रिजर्व की किशनपुर सेंक्चुरी में बीमारी से हुई बाघिन की मौत के बाद उसके शव का बुधवार को आईवीआरआई बरेली के डॉक्टरों की टीम ने पोस्टमार्टम किया। रिपोर्ट में डायरिया से बाघिन की मौत की बात सामने आई है।
पोस्टमार्टम करने वाली डॉक्टरों की टीम को बाघिन के पेट में राउंड, टेप वर्म (कीड़े ) के साथ ही सेही के कांटे और जंगली सुअर के बाल मिले हैं।
किशनुपर सेंक्चुरी के मैलानी रेंज की चलतुआ बीट में सोमवार सवेरे गश्त कर रहे वन कर्मियों को रास्ते में बाघिन सुस्त बैठी दिखाई दी जो काफी कमजोर और बीमार दिख रही थी। मंगलवार दोपहर निगरानी कर रही वन कर्मियों की टीम ने बाघिन के शरीर में कोई हलचल न मिलने पर सूचना उच्चधिकारियों दी। पशु चिकित्सकों की टीम के साथ दुधवा नेशनल पार्क के उपनिदेशक मनोज सोनकर मौके पर पहुंचे। पार्क के डॉक्टर ने बाघिन का परीक्षण कर उसे मृत घोषित कर दिया।
बुधवार को बाघिन के शव का आईवीआरआई बरेली में पोस्टमार्टम किया गया। दुधवा टाइगर रिजर्व के मुख्य वन संरक्षक संजय पाठक ने इस बात की पुष्टि करते हुए बताया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक बाघिन को डायरिया होने से वह कमजोर होती चली गई, जिससे उसकी मौत हो गई।
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दस साल में जा चुकी है 14 बाघों की जान
बांकेगंज। दुधवा टाइगर रिजर्व में बाघों की बढ़ती आबादी के साथ ही उन पर खतरा भी बढ़ता जा रहा है, जिसमें सबसे बड़ा खतरा वजूद को लेकर आपसी संघर्ष है। पिछले दस वर्षों में 14 बाघों की मौत हुई, इनमें से अधिकतर की जान आपसी संघर्ष में गई।
सोमवार को किशनपुर सेंक्चुरी के मैलानी रेंज की चलतुआ बीट में सुस्त और कमजोर दिखी बाघिन की मंगलवार को हुई मौत के बाद प्रथम दृष्टया यही अनुमान लगाया जा रहा है कि इससे पहले बाघिन और किसी अन्य बाघ के बीच प्रणय संघर्ष हुआ होगा। जिससे उसके शरीर के पिछले हिस्से में बाघ के पंजे की खरोंच लगने से हुए मामूली घाव पर जंगली कुकर मक्खी बैठ गई, जिससे वह कमजोर होती चली गई। इसके बाद डायरिया होने से उसकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम के दौरान बाघिन के पिछले हिस्से पर मिला मामूली घाव इस बात का प्रमाण है।
दुधवा टाइगर रिजर्व और कतर्निया घाट में पिछले दस वर्षों में 14 बाघों की मौत हो चुकी है। सड़क हादसों में भी कई बाघ मारे गए। इसके अलावा शिकारियों के जाल में फंसकर भी कई बाघों की मौत हुई।
वर्ष 2018 में किशनुपर सेंक्चुरी की चलतुआ बीट में एक बाघिन को गुस्साई भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला था। वह बाघिन भी काफी कमजोर हो गई थी। 2018 अगस्त माह में भारत-नेपाल सीमा से सटे संपूर्णानगर रेंज के सुतिया नाले में तेंदुए का सड़ा गला शव पाया गया था। 2019 को शारदा बैराज गेट में तेंदुए का शव फंसा मिला था।
बाघों में अक्सर सीमा को लेकर संघर्ष होता है। जवान हो रहे बाघ अपना इलाका स्थापित करने के लिए बूढ़े बाघों से लड़कर उन्हें बाहर कर देते हैं। इस संघर्ष में कभी-कभी कमजोर बाघ / बाघिन की मौत भी हो जाती है।
अनुमान लगाया जा रहा है कि किशनपुर सेंक्चुरी की चलतुआ बीट में मिली बाघिन के साथ कुछ ऐसा ही हुआ होगा। मेटिंग के लिए भी आपस में अक्सर संघर्ष की घटनाएं होती हैं। कभी-कभी एक बाघिन पर एक से ज्यादा नर बाघ फिदा हो जाते हैं तब मेटिंग के लिए दोनों में संघर्ष होता है।
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इंसानों की तरह जानवरों में भी आपसी संघर्ष की घटनाएं होती हैं। संघर्ष के दौरान अक्सर वन्यजीव घायल भी होते हैं। कभी-कभी उनकी मौत भी हो जाती है।
- संजय पाठक, मुख्य वन संरक्षक, दुधवा टाइगर रिजर्व
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पोस्टमार्टम करने वाली डॉक्टरों की टीम को बाघिन के पेट में राउंड, टेप वर्म (कीड़े ) के साथ ही सेही के कांटे और जंगली सुअर के बाल मिले हैं।
किशनुपर सेंक्चुरी के मैलानी रेंज की चलतुआ बीट में सोमवार सवेरे गश्त कर रहे वन कर्मियों को रास्ते में बाघिन सुस्त बैठी दिखाई दी जो काफी कमजोर और बीमार दिख रही थी। मंगलवार दोपहर निगरानी कर रही वन कर्मियों की टीम ने बाघिन के शरीर में कोई हलचल न मिलने पर सूचना उच्चधिकारियों दी। पशु चिकित्सकों की टीम के साथ दुधवा नेशनल पार्क के उपनिदेशक मनोज सोनकर मौके पर पहुंचे। पार्क के डॉक्टर ने बाघिन का परीक्षण कर उसे मृत घोषित कर दिया।
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बुधवार को बाघिन के शव का आईवीआरआई बरेली में पोस्टमार्टम किया गया। दुधवा टाइगर रिजर्व के मुख्य वन संरक्षक संजय पाठक ने इस बात की पुष्टि करते हुए बताया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक बाघिन को डायरिया होने से वह कमजोर होती चली गई, जिससे उसकी मौत हो गई।
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दस साल में जा चुकी है 14 बाघों की जान
बांकेगंज। दुधवा टाइगर रिजर्व में बाघों की बढ़ती आबादी के साथ ही उन पर खतरा भी बढ़ता जा रहा है, जिसमें सबसे बड़ा खतरा वजूद को लेकर आपसी संघर्ष है। पिछले दस वर्षों में 14 बाघों की मौत हुई, इनमें से अधिकतर की जान आपसी संघर्ष में गई।
सोमवार को किशनपुर सेंक्चुरी के मैलानी रेंज की चलतुआ बीट में सुस्त और कमजोर दिखी बाघिन की मंगलवार को हुई मौत के बाद प्रथम दृष्टया यही अनुमान लगाया जा रहा है कि इससे पहले बाघिन और किसी अन्य बाघ के बीच प्रणय संघर्ष हुआ होगा। जिससे उसके शरीर के पिछले हिस्से में बाघ के पंजे की खरोंच लगने से हुए मामूली घाव पर जंगली कुकर मक्खी बैठ गई, जिससे वह कमजोर होती चली गई। इसके बाद डायरिया होने से उसकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम के दौरान बाघिन के पिछले हिस्से पर मिला मामूली घाव इस बात का प्रमाण है।
दुधवा टाइगर रिजर्व और कतर्निया घाट में पिछले दस वर्षों में 14 बाघों की मौत हो चुकी है। सड़क हादसों में भी कई बाघ मारे गए। इसके अलावा शिकारियों के जाल में फंसकर भी कई बाघों की मौत हुई।
वर्ष 2018 में किशनुपर सेंक्चुरी की चलतुआ बीट में एक बाघिन को गुस्साई भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला था। वह बाघिन भी काफी कमजोर हो गई थी। 2018 अगस्त माह में भारत-नेपाल सीमा से सटे संपूर्णानगर रेंज के सुतिया नाले में तेंदुए का सड़ा गला शव पाया गया था। 2019 को शारदा बैराज गेट में तेंदुए का शव फंसा मिला था।
बाघों में अक्सर सीमा को लेकर संघर्ष होता है। जवान हो रहे बाघ अपना इलाका स्थापित करने के लिए बूढ़े बाघों से लड़कर उन्हें बाहर कर देते हैं। इस संघर्ष में कभी-कभी कमजोर बाघ / बाघिन की मौत भी हो जाती है।
अनुमान लगाया जा रहा है कि किशनपुर सेंक्चुरी की चलतुआ बीट में मिली बाघिन के साथ कुछ ऐसा ही हुआ होगा। मेटिंग के लिए भी आपस में अक्सर संघर्ष की घटनाएं होती हैं। कभी-कभी एक बाघिन पर एक से ज्यादा नर बाघ फिदा हो जाते हैं तब मेटिंग के लिए दोनों में संघर्ष होता है।
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इंसानों की तरह जानवरों में भी आपसी संघर्ष की घटनाएं होती हैं। संघर्ष के दौरान अक्सर वन्यजीव घायल भी होते हैं। कभी-कभी उनकी मौत भी हो जाती है।
- संजय पाठक, मुख्य वन संरक्षक, दुधवा टाइगर रिजर्व