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बम फटने से झुलस गया हाथ तो क्रांतिकारी ने खुद काट डालीं अपनी उंगलियां

Fri, 13 Aug 2021 12:20 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Fri, 13 Aug 2021 12:20 AM IST
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When the hand got burnt due to the explosion of the bomb, the revolutionary himself cut his fingers
खीरी बमकांड से बौखला उठा था जिले का ब्रिटिश प्रशासन
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पकड़े गए क्रांतिकारियों को मिली थी दो से छह साल की सजा
लखीमपुर खीरी। जिले के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में खीरी का बमकांड क्रांतिकारियों की गौरव गाथा का बखान करता है। जनवरी 1930 में क्रांतिकारियों के बम बनाते वक्त जब बम फटा तो एक क्रांतिकारी का हाथ झुलस गया। सबूत मिटाने के लिए उस महान क्रांतिकारी ने अपनी उंगलियां ही काट डाली थीं। आजादी के बाद राज्य सूचना विभाग की ओर से प्रकाशित ‘स्वतंत्रता संग्राम के सैनिक’ पुस्तक में भी इस घटना का उल्लेख है।
1930 के दौर में स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने वाले क्रांतिकारियों ने गांधीजी के अहिंसक आंदोलन के साथ-साथ जिले के नौजवानों ने सशस्त्र क्रांति की अलख जगा रखी थी। शाहजहांपुर में राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाउल्ला खां और रोशन सिंह को फांसी दिए जाने के बाद खीरी जिले के नौजवानों का ब्रिटिश सरकार के खिलाफ खून खौल उठा। वे सशस्त्र क्रांति की ज्वाला को तेज करने की तैयारी में जुट गए।
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इसी बीच नमक सत्याग्रह में गिरफ्तार हुए बलभद्र सिंह जेल से छूटकर आ गए। वह कुछ क्रांतिकारी नौजवानों के साथ मिलकर लखीमपुर शहर में घोसियाना के पास अरहर के खेतों में छिपकर बम बना रहे थे। इसी दौरान एक बम बनते ही फट गया। यह घटना सात जनवरी 1930 की है।
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हादसे में जगदंबा प्रसाद मिश्र का हाथ बुरी तरह झुलस गया। इस बहादुर नौजवान ने सबूत मिटाने के लिए अपनी झुलसी हुई उंगलियों को ही काट डाला। यह धमाका पुलिस कप्तान के बंगले के पास हुआ था। इसके बाद क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी का सिलसिला शुरू हो गया। कुल 12 लोग गिरफ्तार किए गए, जिनमें से नौ लोगों पर मुकदमा चलाया गया। मामले की सुनवाई के लिए विशेष अदालत बनाई गई। महीनों तक लगातार पेशियां होती रहीं। अंत में पांच अगस्त 1932 को फैसला सुनाया गया, जिसमें तीन लोगों को बरी कर दिया गया। छह लोगों को सजा सुनाई गई। सबसे ज्यादा सजा बलभद्र सिंह को हुई। उन्हें छह साल कैद की सजा मिली। सबसे कम श्रीराम गुप्त उर्फ पितरिया को दो साल की सजा दी गई।

श्रीराम पितरिया सबसे कम उम्र के थे और उन दिनों वह पढ़ाई कर रहे थे। उनके खिलाफ स्कूल की एक कापी सबूत के रूप में पेश की गई, जिसमें देशभक्ति पूर्ण ओजस्वी कविताएं लिखी हुई थीं। जिन लोगों को सजा सुनाई गई उनमें जगदंबा प्रसाद मिश्र, बलभद्र सिंह, दाताराम, परागदत्त, श्रीधर मिश्र, श्रीराम पितरिया और साधू राम शुक्ल शामिल थे। इन्हें दो वर्ष से छह वर्ष तक की सजा दी गई। राम स्वरूप त्रिपाठी, चिरौंजी पासी और एक अन्य क्रांतिकारी को सेशन कोर्ट से रिहा कर दिया गया। इस बम कांड का प्रांतीय क्रांतिकारी दल से कोई संबंध नहीं था। फिर भी यह घटना क्रांतिकारियों के जोश और आजादी के लिए कुछ कर गुजरने की भावना की प्रतीक थी।
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