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लापरवाही के बाद वन विभाग जुटा लीपापोती में: मारे गए बालक से ज्यादा चिंता बाघ के हमले को खारिज करने की
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लखीमपुर खीरी के चमरन पुरवा, गौढ़ी चकदहा गांव के लिए नाव से जाती वन विभाग की टीम। संवाद
- फोटो : LAKHIMPUR
बांकेगंज/धौरहरा (लखीमपुर खीरी)। दुधवा टाइगर रिजर्व बफरजोन के धौरहरा रेंज की गनापुर बीट से सटे थाना ईसानगर क्षेत्र के चमरन पुरवा, गौढ़ी चकदहा गांव में सोमवार रात बाघ के हमले में बालक की मौत के मामले में वन विभाग लीपापोती में जुट गया है। उसे बालक की मौत से ज्यादा चिंता बाघ के हमले को खारिज करने पर है। मौके पर पहुंचे वन कर्मियों का कहना है कि मौके पर मिले पगचिह्न बाघ या तेंदुए के नहीं हैं जबकि ग्रामीणों का दावा है कि बाघ ने ही पुतान के बेटे बृजेश (12) पर हमला किया और बाद में उसे खींच कर गन्ने के खेत में ले गया। तलाश करने पर बालक का अधखाया शव उन्होंने बरामद किया।
सोमवार रात के घटनाक्रम का जिक्र करते हुए ग्रामीणों कमला प्रसाद, बैजनाथ, बाबूराम, संतोष, भोले, प्यारेलाल, सर्वेश आदि ने बताया कि पुतान का 12 वर्षीय पुत्र ब्रजेश कुमार घर के सामने खेल रहा था। इसी बीच खेत से निकले बाघ ने उस पर हमला कर दिया और बाद में उसे खींचता हुआ गन्ने के खेत में ले गया। बालक और उसके साथ खेल रहे बच्चों के चीखने की आवाज सुनकर वे मौके पर पहुंचे। जिस पर बाघ बालक का शव खेत में छोड़कर भाग गया, जिसे उन्होंने बाद में बरामद किया।
इधर, मंगलवार को वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची तो शव मिलने वाले स्थान पर किसी जानवर के पगचिह्न दिखाई पड़े। वन कर्मियों का कहना था कि पगचिह्न बाघ या तेंदुए के नहीं है। इस बात को खारिज करते हुए ग्रामीणों ने दावा किया कि पदचिह्न बाघ के ही हैं, उन्होंने आरोप लगाया कि वन कर्मी मामले में लीपापोती करने की कोशिश कर रहे हैं। इधर, वन कर्मियों ने मृतक बालक बृजेश के पिता पुतान को तात्कालिक सहायता के रूप में 10 हजार रुपये भी दिए और अपनी जांच में जुट गए।
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गांव जाने का नहीं है कोई रास्ता, नाव से नदी पार कर पहुंची वन विभाग की टीम
धौरहरा रेंज की गनापुरा बीट का चमरन पुरवा गौढ़ी चकदहा गांव घाघरा नदी के दूसरे छोर पर बसा है। जहां जाने का कोई रास्ता न होने से ग्रामीणों और वन कर्मियों को नाव पर बैठकर गांव पहुंचना पड़ता है। ऐसे में कोई बड़ी घटना होने के बाद वन या पुलिस विभाग की टीम ऐन मौके पर मदद को नहीं पहुंच पाती। यही वजह रही कि वन विभाग की टीम मंगलवार को नाव से गांव पहुंची।
वन कर्मियों की टीम घटनास्थल पर रवाना की गई है। मौके पर मिले पगचिह्न स्पष्ट न होने से यह कहना मुश्किल है कि बालक की मौत किस वन्यजीव के हमले मेें हुई है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
- डॉ अनिल कुमार पटेल, डीडी, डीटीआर, बफरजोन
बाढ़ के बाद अब हिंसक वन्य जीवों की दहशत में जी रहे ग्रामीण
धौरहरा (लखीमपुर खीरी)। ईसानगर वनरेंज गनापुर के लोगों को जब बाढ़ से निजात मिली है तो हिंसक पशुओं का डर सताने लगा है, सोमवार की रात बाघ के हमले में बच्चे की मौत के बाद बाघ की दहशत में लोगों ने खेत खलिहान पर जाना बंद कर दिया है। डर के मारे लोग अपने बच्चों को घर से बाहर नहीं जाने दे रहे हैं। लोग समूहों में घर के बाहर निकल रहे है।
इस संबंध में वन क्षेत्राधिकारी अनिल शाह का कहना है कि हमला बाघ ने नहीं किया है। पदचिह्नों से तेंदुआ प्रतीत होता है। मूवमेंट एरिया में कैमरे लगाए जा रहे हैं। ग्रामीणों को सतर्क रहने और समूह में खेतों में जाने के लिए कहा गया है।
यहां बता दें गनापुर बीट से सटे गांव घाघरा नदी के पास जंगल किनारे हैं। यहां हमेशा हिंसक पशुओं का खतरा बना रहता है। एक साल से इस क्षेत्र में तेंदुओं का आतंक काफी बढ़ चुका है। जंगल और घाघरा नदी के किनारे बसे बेलागढ़ी, ओझापुरवा, कैरातीपुरवा, चकदहा गांव में तेंदुओं की बढ़ती चहलकदमी से ग्रामीण भयभीत हैं। रेंजर अनिल शाह बताते हैं कि क्षेत्र में फिर कोई हिंसक वन्यजीव सक्रिय हुआ है, जिसे जंगल में खदेड़ने के लिए वन विभाग का पूरा अमला जुटा हुआ है। उन्होंने ग्रामीणों को सतर्क रहने और जंगल में न जाने की हिदायत दी है।
इस संबंध में दुधवा टाइगर रिजर्व बफरजोन के उपनिदेशक डॉ अनिल कुमार पटेल भी स्वीकार करते हैं कि धौरहरा रेंज तेंदुओं के हमलों से प्रभावित रहती है लेकिन बाघ हमले की घटनाओं को अपवाद मानते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि जंगल से सटे इलाके और वन्यजीव प्रभावित क्षेत्रों में वन विभाग नियमित जागरूकता अभियान चलाता है। साथ ही वहां विशेष गश्त भी की जाती है, ताकि ग्रामीणों को जंगली जानवरों के हमलों से महफूज रखा जा सके।
ग्रामीण बोले-खेतों की ओर जाने से लगता है डर
गांव के आसपास जंगल है। पहले भी तेंदुए की कई दिनों तक दहशत रही थी। अब बाघ ने दस्तक देदी है। जिससे खेतों की ओर जाने में भी डर लगता है। सबसे ज्यादा खतरा बच्चों के लिए है। वन विभाग जल्द ही बाघ को पकड़ कर इस समस्या से छुटकारा दिलाए।
-संजय यादव, निवासी चकदहा
लावारिस पशुओं से फसलों को बचाने के लिए रात में खेतों में मौजूद रहना पड़ता है। बाघ की मौजूदगी के चलते खतरा बढ़ गया है। गन्ने के खेत में बाघ कभी भी खतरा बन सकता है। कई बच्चों व पशुओं को मौत के घाट उतार चुके बाघ व तेंदुए के डर से अब घर से निकलना मुश्किल हो गया है।
-राजकिशोर यादव, निवासी चकदहा
एक साल के अंदर बाघ व तेंदुआ दो बच्चों सहित कई मवेशियों को निवाला बना चुका है। वन विभाग ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। अब तो डर के मारे खेत खलिहान तक जाने की हिम्मत नहीं होती।
-रघुवर गौतम, निवासी चकदहा
वन विभाग से गुहार लगाने के बावजूद गनापुर बीट में कोई सुरक्षा के प्रबंध नहीं किए गए। अगर पहले से सही सुरक्षा के इंतजाम होते तो एक साल में गांव के दो बच्चों की जान न जाती। अगर जल्द वन विभाग कोई ठोस कदम नहीं उठाता है तो हम ग्रामीणों को मजबूर होकर वन विभाग के खिलाफ धरना प्रदर्शन करना पड़ेगा।
-जानू यादव, निवासी चकदहा
अब बाघ, पहले तेंदुए का था आतंक
चकदहा गांव में बाघ के हमले में बालक की मौत का मामला पहला नहीं है। चकदहा प्रधान पेशकार यादव ने बताया कि इससे पहले भी कई बार तेंदुए को क्षेत्र में देखा गया है। कई बार वह पशुओं और लोगों को अपना शिकार बना चुका है।
हाल ही की घटनाओं पर एक नजर
-30 दिसंबर 2019: बाघ के हमले में गांव गिरदा निवासी बालकराम (15) और दूबर (60) घायल
-7 जनवरी 2020: तेंदुए के हमले में गांव अख्तियारपुर निवासी जीतू भार्गव (35) घायल हुआ।
-26 मार्च 2020 को तेंदुए ने हमला कर डुडकी निवासी मोहनी (10) को मार डाला।
-30 अप्रैल 2020: गांव बंशीबेली निवासी सोनू (12) को तेंदुए ने हमला कर घायल किया।
दादी बोलीं-मुझे बाघ खा जाता, लेकिन मेरे लाल को छोड़ जाता’
पोस्टमार्टम के बाद घर पहुंचा शव, मचा कोहराम, गांव में पसरा मातमी सन्नाटा, ग्रामीणों में रोष
धौरहरा (लखीमपुर खीरी)। बाघ के हमले में मारे गए किशोर का शव पोस्टमार्टम के बाद जब शाम को गांव पहुंचा तो परिवार वालों में कोहराम मच गया। मां और बूढ़ी दादी शव देखकर फफक पड़ीं। गांव में मातमी सन्नाटा पसर गया। ग्रामीणों में घटना के बाद वन विभाग के प्रति रोष है।
गांव चकदहा निवासी पुतान के दो बेटों में बृजेश छोटा था। परिवार में सबका दुलारा था। मंगलवार की शाम जब बृजेश का शव पोस्टमार्टम के बाद शाम को घर पहुंचा तो पूरा गांव उमड़ पड़ा। अपने पोते के शव को देखकर बूढ़ी दादी जगराना और मां बिलख उठीं। किसी तरह ग्रामीणों ने उन्हें संभाला तो वह बोलीं ‘मुझे बाघ खा जाता, लेकिन मेरे लाल को छोड़ दिया होता’। यह सुनकर ग्रामीणों की आंखें भी भर आईं। दादा भल्लर अपने पोते के शव को देखते ही रह गए। बालक की मां कभी बेटे के शव को निहारती तो कभी इधर-उधर देखकर चीख पड़ती। बृजेश के पिता पुतान बताते हैं कि वह काफी गरीब हैं मजदूरी करके बच्चों का पेट पालते हैं, लेकिन कभी भी परिवार में किसी चीज की कमी नहीं होने दी। अब बेटा चला गया तो पूरा परिवार टूट गया है।
बाघों के बढ़ रहे हमले.. वन विभाग लापरवाह
बांकेगंज (लखीमपुर खीरी)। सर्दियां आते ही भोजन की तलाश में जंगली सुअर, हिरन आदि शाकाहारी पशु गन्ने के खेतों में आ जाते हैं। ऐसे में बाघ भी शिकार की तलाश में जंगल से निकलकर इन खेतों में अपना डेरा जमा लेते हैं। ऐसे में खेतों की ओर गए बच्चों और ग्रामीणों पर हमला कर बाघ उन्हें गंभीर घायल कर देते हैं। हाल ही में ऐसी कुछ घटनाएं होने के बाद भी वन विभाग लापरवाह बना हुआ है।
उत्तर प्रदेश राज्य वन्यजीव सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य एवं वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ वीपी सिंह का कहना है कि पिछले दो-तीन वर्षों के दौरान दक्षिण खीरी वन प्रभाग के मोहम्मदी रेंज के अलावा डीटीआर बफरजोन के मैलानी, भीरा, गोला, किशनपुर सेंक्चुरी, धौरहरा आदि रेंज में इंसानों पर बाघों के हमले की कई घटनाएं हो चुकी हैं। बावजूद इसके वन विभाग इन हमलों के प्रति लापरवाह बना हुआ है। वन विभाग के जिम्मेदार न तो जंगल से सटे इलाकों में बाघों की निगरानी करवा रहे हैं और न ही ग्रामीणों को इनके हमलों से बचाव के लिए गांव में कोई जागरूकता कार्यक्रम करा रहे हैं। सर्दियों का सीजन शुरू होते ही हिरन, पाढ़ा, चीतल जंगली सुअर सहित तमाम अन्य शाकाहारी और मांसाहारी वन्यजीव जंगल से सटे खेतों में किसानों की गन्ने की फसल में पहुंच जाते हैं। इसी दौरान बाघ इन जानवरों और खेतों में काम कर रहे लोगों को निवाला बना लेता है।
चार वर्ष पहले बाघ ने दो महीने में सात लोगों को मारा था
जुलाई 2016 को मैलानी रेंज की महुरेना बीट से सटे खरेहटा और आसपास के गांवों में एक बाघ ने दो महीने के अंदर सात लोगों पर हमला कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया था। इन हमलों से दहले ग्रामीणों के गुस्से को देखते हुए वन विभाग की टीम ने बाघ को बेहोश करने के बाद पकड़कर लखनऊ चिड़ियाघर भेजा था। जहां सलाखों में कैद हमलावर बाघ चिड़ियाघर में छेदीलाल के नाम से अपने गुनाहों की सजा काट रहा है।
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सोमवार रात के घटनाक्रम का जिक्र करते हुए ग्रामीणों कमला प्रसाद, बैजनाथ, बाबूराम, संतोष, भोले, प्यारेलाल, सर्वेश आदि ने बताया कि पुतान का 12 वर्षीय पुत्र ब्रजेश कुमार घर के सामने खेल रहा था। इसी बीच खेत से निकले बाघ ने उस पर हमला कर दिया और बाद में उसे खींचता हुआ गन्ने के खेत में ले गया। बालक और उसके साथ खेल रहे बच्चों के चीखने की आवाज सुनकर वे मौके पर पहुंचे। जिस पर बाघ बालक का शव खेत में छोड़कर भाग गया, जिसे उन्होंने बाद में बरामद किया।
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गांव जाने का नहीं है कोई रास्ता, नाव से नदी पार कर पहुंची वन विभाग की टीम
धौरहरा रेंज की गनापुरा बीट का चमरन पुरवा गौढ़ी चकदहा गांव घाघरा नदी के दूसरे छोर पर बसा है। जहां जाने का कोई रास्ता न होने से ग्रामीणों और वन कर्मियों को नाव पर बैठकर गांव पहुंचना पड़ता है। ऐसे में कोई बड़ी घटना होने के बाद वन या पुलिस विभाग की टीम ऐन मौके पर मदद को नहीं पहुंच पाती। यही वजह रही कि वन विभाग की टीम मंगलवार को नाव से गांव पहुंची।
वन कर्मियों की टीम घटनास्थल पर रवाना की गई है। मौके पर मिले पगचिह्न स्पष्ट न होने से यह कहना मुश्किल है कि बालक की मौत किस वन्यजीव के हमले मेें हुई है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
- डॉ अनिल कुमार पटेल, डीडी, डीटीआर, बफरजोन
बाढ़ के बाद अब हिंसक वन्य जीवों की दहशत में जी रहे ग्रामीण
धौरहरा (लखीमपुर खीरी)। ईसानगर वनरेंज गनापुर के लोगों को जब बाढ़ से निजात मिली है तो हिंसक पशुओं का डर सताने लगा है, सोमवार की रात बाघ के हमले में बच्चे की मौत के बाद बाघ की दहशत में लोगों ने खेत खलिहान पर जाना बंद कर दिया है। डर के मारे लोग अपने बच्चों को घर से बाहर नहीं जाने दे रहे हैं। लोग समूहों में घर के बाहर निकल रहे है।
इस संबंध में वन क्षेत्राधिकारी अनिल शाह का कहना है कि हमला बाघ ने नहीं किया है। पदचिह्नों से तेंदुआ प्रतीत होता है। मूवमेंट एरिया में कैमरे लगाए जा रहे हैं। ग्रामीणों को सतर्क रहने और समूह में खेतों में जाने के लिए कहा गया है।
यहां बता दें गनापुर बीट से सटे गांव घाघरा नदी के पास जंगल किनारे हैं। यहां हमेशा हिंसक पशुओं का खतरा बना रहता है। एक साल से इस क्षेत्र में तेंदुओं का आतंक काफी बढ़ चुका है। जंगल और घाघरा नदी के किनारे बसे बेलागढ़ी, ओझापुरवा, कैरातीपुरवा, चकदहा गांव में तेंदुओं की बढ़ती चहलकदमी से ग्रामीण भयभीत हैं। रेंजर अनिल शाह बताते हैं कि क्षेत्र में फिर कोई हिंसक वन्यजीव सक्रिय हुआ है, जिसे जंगल में खदेड़ने के लिए वन विभाग का पूरा अमला जुटा हुआ है। उन्होंने ग्रामीणों को सतर्क रहने और जंगल में न जाने की हिदायत दी है।
इस संबंध में दुधवा टाइगर रिजर्व बफरजोन के उपनिदेशक डॉ अनिल कुमार पटेल भी स्वीकार करते हैं कि धौरहरा रेंज तेंदुओं के हमलों से प्रभावित रहती है लेकिन बाघ हमले की घटनाओं को अपवाद मानते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि जंगल से सटे इलाके और वन्यजीव प्रभावित क्षेत्रों में वन विभाग नियमित जागरूकता अभियान चलाता है। साथ ही वहां विशेष गश्त भी की जाती है, ताकि ग्रामीणों को जंगली जानवरों के हमलों से महफूज रखा जा सके।
ग्रामीण बोले-खेतों की ओर जाने से लगता है डर
गांव के आसपास जंगल है। पहले भी तेंदुए की कई दिनों तक दहशत रही थी। अब बाघ ने दस्तक देदी है। जिससे खेतों की ओर जाने में भी डर लगता है। सबसे ज्यादा खतरा बच्चों के लिए है। वन विभाग जल्द ही बाघ को पकड़ कर इस समस्या से छुटकारा दिलाए।
-संजय यादव, निवासी चकदहा
लावारिस पशुओं से फसलों को बचाने के लिए रात में खेतों में मौजूद रहना पड़ता है। बाघ की मौजूदगी के चलते खतरा बढ़ गया है। गन्ने के खेत में बाघ कभी भी खतरा बन सकता है। कई बच्चों व पशुओं को मौत के घाट उतार चुके बाघ व तेंदुए के डर से अब घर से निकलना मुश्किल हो गया है।
-राजकिशोर यादव, निवासी चकदहा
एक साल के अंदर बाघ व तेंदुआ दो बच्चों सहित कई मवेशियों को निवाला बना चुका है। वन विभाग ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। अब तो डर के मारे खेत खलिहान तक जाने की हिम्मत नहीं होती।
-रघुवर गौतम, निवासी चकदहा
वन विभाग से गुहार लगाने के बावजूद गनापुर बीट में कोई सुरक्षा के प्रबंध नहीं किए गए। अगर पहले से सही सुरक्षा के इंतजाम होते तो एक साल में गांव के दो बच्चों की जान न जाती। अगर जल्द वन विभाग कोई ठोस कदम नहीं उठाता है तो हम ग्रामीणों को मजबूर होकर वन विभाग के खिलाफ धरना प्रदर्शन करना पड़ेगा।
-जानू यादव, निवासी चकदहा
अब बाघ, पहले तेंदुए का था आतंक
चकदहा गांव में बाघ के हमले में बालक की मौत का मामला पहला नहीं है। चकदहा प्रधान पेशकार यादव ने बताया कि इससे पहले भी कई बार तेंदुए को क्षेत्र में देखा गया है। कई बार वह पशुओं और लोगों को अपना शिकार बना चुका है।
हाल ही की घटनाओं पर एक नजर
-30 दिसंबर 2019: बाघ के हमले में गांव गिरदा निवासी बालकराम (15) और दूबर (60) घायल
-7 जनवरी 2020: तेंदुए के हमले में गांव अख्तियारपुर निवासी जीतू भार्गव (35) घायल हुआ।
-26 मार्च 2020 को तेंदुए ने हमला कर डुडकी निवासी मोहनी (10) को मार डाला।
-30 अप्रैल 2020: गांव बंशीबेली निवासी सोनू (12) को तेंदुए ने हमला कर घायल किया।
दादी बोलीं-मुझे बाघ खा जाता, लेकिन मेरे लाल को छोड़ जाता’
पोस्टमार्टम के बाद घर पहुंचा शव, मचा कोहराम, गांव में पसरा मातमी सन्नाटा, ग्रामीणों में रोष
धौरहरा (लखीमपुर खीरी)। बाघ के हमले में मारे गए किशोर का शव पोस्टमार्टम के बाद जब शाम को गांव पहुंचा तो परिवार वालों में कोहराम मच गया। मां और बूढ़ी दादी शव देखकर फफक पड़ीं। गांव में मातमी सन्नाटा पसर गया। ग्रामीणों में घटना के बाद वन विभाग के प्रति रोष है।
गांव चकदहा निवासी पुतान के दो बेटों में बृजेश छोटा था। परिवार में सबका दुलारा था। मंगलवार की शाम जब बृजेश का शव पोस्टमार्टम के बाद शाम को घर पहुंचा तो पूरा गांव उमड़ पड़ा। अपने पोते के शव को देखकर बूढ़ी दादी जगराना और मां बिलख उठीं। किसी तरह ग्रामीणों ने उन्हें संभाला तो वह बोलीं ‘मुझे बाघ खा जाता, लेकिन मेरे लाल को छोड़ दिया होता’। यह सुनकर ग्रामीणों की आंखें भी भर आईं। दादा भल्लर अपने पोते के शव को देखते ही रह गए। बालक की मां कभी बेटे के शव को निहारती तो कभी इधर-उधर देखकर चीख पड़ती। बृजेश के पिता पुतान बताते हैं कि वह काफी गरीब हैं मजदूरी करके बच्चों का पेट पालते हैं, लेकिन कभी भी परिवार में किसी चीज की कमी नहीं होने दी। अब बेटा चला गया तो पूरा परिवार टूट गया है।
बाघों के बढ़ रहे हमले.. वन विभाग लापरवाह
बांकेगंज (लखीमपुर खीरी)। सर्दियां आते ही भोजन की तलाश में जंगली सुअर, हिरन आदि शाकाहारी पशु गन्ने के खेतों में आ जाते हैं। ऐसे में बाघ भी शिकार की तलाश में जंगल से निकलकर इन खेतों में अपना डेरा जमा लेते हैं। ऐसे में खेतों की ओर गए बच्चों और ग्रामीणों पर हमला कर बाघ उन्हें गंभीर घायल कर देते हैं। हाल ही में ऐसी कुछ घटनाएं होने के बाद भी वन विभाग लापरवाह बना हुआ है।
उत्तर प्रदेश राज्य वन्यजीव सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य एवं वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ वीपी सिंह का कहना है कि पिछले दो-तीन वर्षों के दौरान दक्षिण खीरी वन प्रभाग के मोहम्मदी रेंज के अलावा डीटीआर बफरजोन के मैलानी, भीरा, गोला, किशनपुर सेंक्चुरी, धौरहरा आदि रेंज में इंसानों पर बाघों के हमले की कई घटनाएं हो चुकी हैं। बावजूद इसके वन विभाग इन हमलों के प्रति लापरवाह बना हुआ है। वन विभाग के जिम्मेदार न तो जंगल से सटे इलाकों में बाघों की निगरानी करवा रहे हैं और न ही ग्रामीणों को इनके हमलों से बचाव के लिए गांव में कोई जागरूकता कार्यक्रम करा रहे हैं। सर्दियों का सीजन शुरू होते ही हिरन, पाढ़ा, चीतल जंगली सुअर सहित तमाम अन्य शाकाहारी और मांसाहारी वन्यजीव जंगल से सटे खेतों में किसानों की गन्ने की फसल में पहुंच जाते हैं। इसी दौरान बाघ इन जानवरों और खेतों में काम कर रहे लोगों को निवाला बना लेता है।
चार वर्ष पहले बाघ ने दो महीने में सात लोगों को मारा था
जुलाई 2016 को मैलानी रेंज की महुरेना बीट से सटे खरेहटा और आसपास के गांवों में एक बाघ ने दो महीने के अंदर सात लोगों पर हमला कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया था। इन हमलों से दहले ग्रामीणों के गुस्से को देखते हुए वन विभाग की टीम ने बाघ को बेहोश करने के बाद पकड़कर लखनऊ चिड़ियाघर भेजा था। जहां सलाखों में कैद हमलावर बाघ चिड़ियाघर में छेदीलाल के नाम से अपने गुनाहों की सजा काट रहा है।