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लखीमपुर की ऐतिहासिक रामलीला पर इस बार भी कोराना का ग्रहण
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लखीमपुर की श्रीरामलीला में निकली श्रीराम की सवारी।
बिना दर्शकों के मथुरा भवन में होगा रामलीला का मंचन, फेसबुक पर होगा सीधा प्रसारण
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अंग्रेजी मेम ने शुरू कराई थी लखीमपुर की रामलीला
लखीमपुर खीरी। शहर की रामलीला जिले की अनमोल सांस्कृतिक विरासत है, लेकिन इस पर भी पिछले दो साल से कोरोना का ग्रहण लगा हुआ है। पिछले साल की तरह इस बार भी रामलीला का मंचन सिर्फ धार्मिक परंपरा की तरह मथुरा भवन में होगा। बृहस्पतिवार को गणेश पूजन के साथ रामलीला का शुभारंभ तो हो गया, लेकिन दर्शक इसका आनंद नहीं उठा पाएंगे। फेसबुक पर इसका लाइव प्रसारण होगा।
लखीमपुर की रामलीला एक गौरवशाली परंपरा और रोचक इतिहास संजोए है। 157 साल पुरानी इस ऐतिहासिक रामलीला का आयोजन करने वाली संस्था सेठ गया प्रसाद ट्रस्ट के मुख्य सरवराकार विपुल सेठ का कहना है कि रामलीला की शुरुआत 157 साल पहले तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर की पत्नी ने कराया था। तब से अनवरत रूप से इस रामलीला का आयोजन रामलीला मैदान में होता आ रहा है।
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मोहम्मदी से लखीमपुर खीरी जिला बनने के कुछ साल बाद वर्ष 1863 में अंग्रेज कलक्टर मि. बाटले बनारस से यहां तबादला होकर आए थे। उनकी पत्नी हेरिस बाटले भारतीय संस्कृति और परंपराओं से बहुत प्रभावित थीं। उन्होंने बनारस के रामनगर की रामलीला देखी थी जो उन्हें बहुत पसंद आई। जब उन्हें यह पता चला कि लखीमपुर में रामलीला नहीं होती है तो उन्होंने अपने पति से यहां रामलीला शुरू कराने की इच्छा जताई। इस पर कलक्टर बाटले ने शहर के संभ्रांत लोगों को बुलाकर उन्हें अपनी पत्नी की इच्छा से अवगत कराया और यहां भी रामलीला की शुरुआत करने का आग्रह किया।
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सेठ मथुरा प्रसाद ने शहर में रामलीला आयोजन की जिम्मेदारी ली। लखीमपुर में पहली रामलीला 1864 में हुई। मिसेज बाटले चाहती थीं कि उनके पति के तबादले के बाद भी यहां रामलीला का आयोजन जारी रहे। इसके लिए उन्होंने रामलीला में सहयोग करने वाले लोगों को बुलाकर एक कमेटी बना दी। इस कमेटी के संचालन की मुख्य जिम्मेदारी सेठ मथुरा प्रसाद के पास ही रही।
रामलीला के सफल संचालन के लिए 1933 में सेठ गया प्रसाद ट्रस्ट की स्थापना की गई। ट्रस्ट की आय के लिए संसाधनों की व्यवस्था की गई। सेठ गया प्रसाद के बाद बराती लाल, श्रीराम मेहरोत्रा, फिर ओमकार नाथ मेहरोत्रा, अजय मेहरोत्रा और अब विपुल सेठ मुख्य सरवराकार के रूप में रामलीला का सफल संचालन कर रहे हैं।
लाल किताब है यहां की रामलीला का संविधान
रामलीला का आयोजन कैसे हो, पात्रों का विवरण, पात्रों की अर्हता, पात्रों का चयन, उनके वस्त्र आभूषण और शृंगार, सवारी निकलने और राम बारात निकलने के रास्ते से लेकर मंचन का तरीका और व्यवस्था आदि सारा विवरण इस लाल किताब में दर्ज है। यह हस्तलिखित किताब कमेटी गठन के समय ही तैयार की गई थी। इस लाल किताब को यहां की रामलीला का संविधान माना जाता है। रामलीला में होने वाली रामलीला गंगा जमुनी संस्कृति की प्रतीक है। यहां पात्रों के कपड़े सिलने का काम मुस्लिम दर्जी करते आ रहे हैं।
यह है रामलीला 2021 का कार्यक्रम
- 08 अक्टूबर........राम जन्म
- 09 अक्टूबर........पुष्प वाटिका
- 10 अक्टूबर........धनुष यज्ञ
- 11 अक्टूबर....... बारात प्ररिभ्रमण एवं विवाह
- 12 अक्टूबर........राम वनगमन
- 13 अक्टूबर........नौका लीला
- 14 अक्टूबर...... सीता हरण, खरदूषण वध
- 15 अक्टूबर.......बालि सुग्रीव युद्घ, समुद्रोल्लंघन
- 16 अक्टूबर.......रावणवध, विजयादशमी
- 17 अक्टूबर.......भरत मिलाप
- 18 अक्टूबर.......राज तिलक
- 19 अक्टूबर.......ब्रह्म भोज
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अंग्रेजी मेम ने शुरू कराई थी लखीमपुर की रामलीला लखीमपुर खीरी। शहर की रामलीला जिले की अनमोल सांस्कृतिक विरासत है, लेकिन इस पर भी पिछले दो साल से कोरोना का ग्रहण लगा हुआ है। पिछले साल की तरह इस बार भी रामलीला का मंचन सिर्फ धार्मिक परंपरा की तरह मथुरा भवन में होगा। बृहस्पतिवार को गणेश पूजन के साथ रामलीला का शुभारंभ तो हो गया, लेकिन दर्शक इसका आनंद नहीं उठा पाएंगे। फेसबुक पर इसका लाइव प्रसारण होगा।
लखीमपुर की रामलीला एक गौरवशाली परंपरा और रोचक इतिहास संजोए है। 157 साल पुरानी इस ऐतिहासिक रामलीला का आयोजन करने वाली संस्था सेठ गया प्रसाद ट्रस्ट के मुख्य सरवराकार विपुल सेठ का कहना है कि रामलीला की शुरुआत 157 साल पहले तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर की पत्नी ने कराया था। तब से अनवरत रूप से इस रामलीला का आयोजन रामलीला मैदान में होता आ रहा है।
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मोहम्मदी से लखीमपुर खीरी जिला बनने के कुछ साल बाद वर्ष 1863 में अंग्रेज कलक्टर मि. बाटले बनारस से यहां तबादला होकर आए थे। उनकी पत्नी हेरिस बाटले भारतीय संस्कृति और परंपराओं से बहुत प्रभावित थीं। उन्होंने बनारस के रामनगर की रामलीला देखी थी जो उन्हें बहुत पसंद आई। जब उन्हें यह पता चला कि लखीमपुर में रामलीला नहीं होती है तो उन्होंने अपने पति से यहां रामलीला शुरू कराने की इच्छा जताई। इस पर कलक्टर बाटले ने शहर के संभ्रांत लोगों को बुलाकर उन्हें अपनी पत्नी की इच्छा से अवगत कराया और यहां भी रामलीला की शुरुआत करने का आग्रह किया।
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सेठ मथुरा प्रसाद ने शहर में रामलीला आयोजन की जिम्मेदारी ली। लखीमपुर में पहली रामलीला 1864 में हुई। मिसेज बाटले चाहती थीं कि उनके पति के तबादले के बाद भी यहां रामलीला का आयोजन जारी रहे। इसके लिए उन्होंने रामलीला में सहयोग करने वाले लोगों को बुलाकर एक कमेटी बना दी। इस कमेटी के संचालन की मुख्य जिम्मेदारी सेठ मथुरा प्रसाद के पास ही रही।
रामलीला के सफल संचालन के लिए 1933 में सेठ गया प्रसाद ट्रस्ट की स्थापना की गई। ट्रस्ट की आय के लिए संसाधनों की व्यवस्था की गई। सेठ गया प्रसाद के बाद बराती लाल, श्रीराम मेहरोत्रा, फिर ओमकार नाथ मेहरोत्रा, अजय मेहरोत्रा और अब विपुल सेठ मुख्य सरवराकार के रूप में रामलीला का सफल संचालन कर रहे हैं।
लाल किताब है यहां की रामलीला का संविधान
रामलीला का आयोजन कैसे हो, पात्रों का विवरण, पात्रों की अर्हता, पात्रों का चयन, उनके वस्त्र आभूषण और शृंगार, सवारी निकलने और राम बारात निकलने के रास्ते से लेकर मंचन का तरीका और व्यवस्था आदि सारा विवरण इस लाल किताब में दर्ज है। यह हस्तलिखित किताब कमेटी गठन के समय ही तैयार की गई थी। इस लाल किताब को यहां की रामलीला का संविधान माना जाता है। रामलीला में होने वाली रामलीला गंगा जमुनी संस्कृति की प्रतीक है। यहां पात्रों के कपड़े सिलने का काम मुस्लिम दर्जी करते आ रहे हैं।यह है रामलीला 2021 का कार्यक्रम
- 08 अक्टूबर........राम जन्म
- 09 अक्टूबर........पुष्प वाटिका
- 10 अक्टूबर........धनुष यज्ञ
- 11 अक्टूबर....... बारात प्ररिभ्रमण एवं विवाह
- 12 अक्टूबर........राम वनगमन
- 13 अक्टूबर........नौका लीला
- 14 अक्टूबर...... सीता हरण, खरदूषण वध
- 15 अक्टूबर.......बालि सुग्रीव युद्घ, समुद्रोल्लंघन
- 16 अक्टूबर.......रावणवध, विजयादशमी
- 17 अक्टूबर.......भरत मिलाप
- 18 अक्टूबर.......राज तिलक
- 19 अक्टूबर.......ब्रह्म भोज