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Lakhimpur Kheri News: मुंडेर पर नहीं काग, कौन पहुंचाए पितरों को भाग

Fri, 20 Sep 2024 03:20 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Fri, 20 Sep 2024 03:20 AM IST
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There is no cork on the parapet, who will send the ancestors away
मुंडेर पर अब नहीं दिखते काग।
बांकेगंज। मान्यता है कि पितृपक्ष में नदी, तीर्थ पर तर्पण करने और कौवों को अन्नदान करने से पूर्वजों को भोजन की प्राप्ति होती है, लेकिन अब कौवे भी विलुप्त होने के कगार पर हैं। पहले तो लोग घरों की मुंडेर पर अन्न रखकर छोड़ देते थे और कौवों के झुंड आकर उन्हें खा लेते थे, मगर आज के दौर में कीटनाशक दवाओं के बढ़ते प्रभाव और मोबाइल टॉवर रेडिएशन की वजह से कौवे ढूंंढे नहीं मिल रहे हैं।
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बुधवार से पितृपक्ष आरंभ हो गया है। नदी, तालाब, घाट और तीर्थों के किनारे लोग पुरखों का तर्पण करते दिख रहे हैं। छोटी काशी गोला के ज्योतिषाचार्य रामदेव मिश्र शास्त्री, कुसुम कुमार वाजपेयी, संजय शर्मा और श्रीकांत शर्मा ने बताया कि पितृपक्ष में पूर्वजों के लिए तर्पण और अन्नदान किया जाता है। मान्यता है कि कौवों को अन्नदान करने से पुरखों को भोजन की प्राप्ति होती है, लेकिन कौवे अब बहुत ही कम नजर आते हैं।
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ऐसे में अगर कौवे नहीं मिलते हैं, तो अन्न को पीपल के पेड़ के नीचे रख सकते हैं।
उधर वन्यजीव विशेषज्ञ और डब्ल्यूटीआई के पूर्व प्रोजेक्ट हेड पीसी पांडेय ने बताया कि फसलों पर कीटनाशक रसायन के छिड़काव से संक्रमण बढ़ रहा है। कौवे, चील, गिद्ध मांस और सड़ी-गली चीजों को खाते हैं। इससे संक्रमित होकर पक्षी बीमारियाें से ग्रसित हो रही हैं। इससे उनके गुर्दे खराब होने के साथ ही उनकी प्रजनन क्षमता कमजोर हो रही है, जिससे उनकी जनसंख्या में कमी आ रही है। इसका दूसरा कारण शहरीकरण भी है।
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