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मतदाताओं ने नहीं देखा अपनी प्रधान का चेहरा
निघासन
Updated Fri, 07 Aug 2015 07:06 PM IST
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झा गांव के लोगों ने पांच साल में एक बार भी अपनी मुखिया की शक्ल नहीं देखी। चुनाव के पहले न तो वह वोट मांगने निकलीं न चुनाव के बाद गांव का हाल देखने। महिला के लिए आरक्षित सीट पर चुनी गईं गांव की मुखिया चौका-चूल्हा तक ही सीमित रहीं। गांव पंचायत का काम उनके पति रामबिलास और उनके चहेते देखते हैं। किसी कागज पर हस्ताक्षर करना हो तो अपने पति के आने के बाद ही उस कागज से हाथ लगाती हैं।
मांझा गांव में इच्छानगर, भगौड़िया, चौगुर्जी और तारनकोठी आदि मजरे शामिल हैं। यहां पर अनुसूचित जाति महिला सीट होने के कारण पिछले पंचायत चुनाव में रामगुनी को प्रधान चुना गया था। प्रधान चुने जाने के बाद यहां के लोगों को एक नई उम्मीद मिली थी कि गांव का विकास होगा। चुनाव के बाद प्रधानी की कमान रामगुनी की बजाय उनके पति रामबिलास ने अपने हाथों में ले ली। अब प्रधान के नाम पर सारा काम उनके पति करते हैं।
बीडीओ तेजवंत सिंह ने बताया कि मेरी पोस्टिंग को तीन साल हो रहे हैं। यह सच है कि मैंने मांझा की महिला प्रधान का चेहरा नहीं देखा हैं। बैठक में महिला प्रधानों की अनिवार्यता की जाएगी। साथ ही महिला प्रधान न आने पर कार्रवाई की जाएगी।
प्रधान के पति रामबिलास ने बताया कि मेरी पत्नी प्रधान हैं। वह एक घरेलू महिला हैं इसलिए उनका सारा काम हम खुद देखते हैं उनको कहीं जाने की जरूरत ही नहीं हैं। अधिक जानकारी न होने के कारण पंचायत सेक्रेटरी मार्गदर्शन करते हैं।
यह हुए विकास कार्य
-पांच साल मात्र 28 इंदिरा आवास ही बने
-आधा दर्जन नालियां बनीं और खड़ंजे लगाए गए
- एक दर्जन से अधिक हैं सरकारी हैंडपंप
- करीब एक दर्जन सोलर लाइटों से रोशन है गांव
घूंघट की ओट से चल रही प्रधानी
महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए चुनाव आयोग ने मांझा ग्राम पंचायत की सीट तो महिला के लिए आरक्षित कर दी, लेकिन यहां तो महिला के अधिकारों पर ही उनके पति ने कुंडली मार ली। ऐसे में महिला प्रधान न तो अपनी क्षमता दिखा सकीं और न ही गांव का विकास हुआ।
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-मंजीत सिंह
दहलीज के बाहर नहीं मिली प्रधान
-पांच साल में प्रधान घर की दहलीज नहीं पार कर सकीं। ब्लाक कार्यालय पर होने वाली बैठकों में भी प्रधान के दर्शन नहीं हुए। गांव में विकास कार्य पंचायत सेक्रेटरी और ग्राम रोजगार सेवक ही देखते हैं। प्रधान के पति भी यदा-कदा ही आते हैं।
-परमजीत सिंह पम्मी, पूर्व प्रधान
कीचड़-जलभराव से परेशानी
गांव में खड़ंजा और नाली मरम्मत के नाम पर महज खानापूर्ति कर लाखों रुपये निकाले गए। गांव के प्रत्येक मजरे में कीचड़ और जलभराव के चलते यहां के लोग बेहद परेशान हैं। गांव की प्रधानी तो पंचायत सेक्रेटरी और रोजगार सेवकों के सहारे चल रही है।
-बूटा सिंह
बुनियादी सुविधाएं भी नहीं
चौगुर्जी गांव में आने के लिए सड़क तो है, लेकिन यहां बिजली और शुद्ध पानी के लिए पूरा गांव तरस रहा है। प्रधान के पास यदि को कोई शिकायत लेकर जाए तो वह कुछ भी बताने में असमर्थता जताती हैं।
-रमेश कुमार
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मांझा गांव में इच्छानगर, भगौड़िया, चौगुर्जी और तारनकोठी आदि मजरे शामिल हैं। यहां पर अनुसूचित जाति महिला सीट होने के कारण पिछले पंचायत चुनाव में रामगुनी को प्रधान चुना गया था। प्रधान चुने जाने के बाद यहां के लोगों को एक नई उम्मीद मिली थी कि गांव का विकास होगा। चुनाव के बाद प्रधानी की कमान रामगुनी की बजाय उनके पति रामबिलास ने अपने हाथों में ले ली। अब प्रधान के नाम पर सारा काम उनके पति करते हैं।
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बीडीओ तेजवंत सिंह ने बताया कि मेरी पोस्टिंग को तीन साल हो रहे हैं। यह सच है कि मैंने मांझा की महिला प्रधान का चेहरा नहीं देखा हैं। बैठक में महिला प्रधानों की अनिवार्यता की जाएगी। साथ ही महिला प्रधान न आने पर कार्रवाई की जाएगी।
प्रधान के पति रामबिलास ने बताया कि मेरी पत्नी प्रधान हैं। वह एक घरेलू महिला हैं इसलिए उनका सारा काम हम खुद देखते हैं उनको कहीं जाने की जरूरत ही नहीं हैं। अधिक जानकारी न होने के कारण पंचायत सेक्रेटरी मार्गदर्शन करते हैं।
यह हुए विकास कार्य
-पांच साल मात्र 28 इंदिरा आवास ही बने
-आधा दर्जन नालियां बनीं और खड़ंजे लगाए गए
- एक दर्जन से अधिक हैं सरकारी हैंडपंप
- करीब एक दर्जन सोलर लाइटों से रोशन है गांव
घूंघट की ओट से चल रही प्रधानी
महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए चुनाव आयोग ने मांझा ग्राम पंचायत की सीट तो महिला के लिए आरक्षित कर दी, लेकिन यहां तो महिला के अधिकारों पर ही उनके पति ने कुंडली मार ली। ऐसे में महिला प्रधान न तो अपनी क्षमता दिखा सकीं और न ही गांव का विकास हुआ।
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-मंजीत सिंह
दहलीज के बाहर नहीं मिली प्रधान
-पांच साल में प्रधान घर की दहलीज नहीं पार कर सकीं। ब्लाक कार्यालय पर होने वाली बैठकों में भी प्रधान के दर्शन नहीं हुए। गांव में विकास कार्य पंचायत सेक्रेटरी और ग्राम रोजगार सेवक ही देखते हैं। प्रधान के पति भी यदा-कदा ही आते हैं।
-परमजीत सिंह पम्मी, पूर्व प्रधान
कीचड़-जलभराव से परेशानी
गांव में खड़ंजा और नाली मरम्मत के नाम पर महज खानापूर्ति कर लाखों रुपये निकाले गए। गांव के प्रत्येक मजरे में कीचड़ और जलभराव के चलते यहां के लोग बेहद परेशान हैं। गांव की प्रधानी तो पंचायत सेक्रेटरी और रोजगार सेवकों के सहारे चल रही है।
-बूटा सिंह
बुनियादी सुविधाएं भी नहीं
चौगुर्जी गांव में आने के लिए सड़क तो है, लेकिन यहां बिजली और शुद्ध पानी के लिए पूरा गांव तरस रहा है। प्रधान के पास यदि को कोई शिकायत लेकर जाए तो वह कुछ भी बताने में असमर्थता जताती हैं।
-रमेश कुमार