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खीरी जिले में विरासत की सियासत भी खूब चमकी
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लखीमपुर खीरी। खीरी जिले में विरासत की सियासत भी खूब चमकी है। किसी ने विरासत में अपने माता पिता से मिली सियासत को आगे बढ़ाया तो किसी ने अपने बाबा की सियासती विरासत संभाली। खीरी लोकसभा सीट पर माता, पिता और बेटे ने 35 साल तक लोकसभा का प्रतिनिधित्व किया। यहां एक पूर्व विधायक अपने बाबा की तो एक विधायक अपने पिता की राजनीतिक विरासत को संभाल रहे हैं।
वर्ष 1962 में कांग्रेस नेता बालगोविंद वर्मा लोकसभा चुनाव जीतकर पहली बार सांसद बने। वह कांग्रेस के टिकट पर लगातार तीन बार 1962, 1967 और 1972 में चुनाव जीते। 1977 में वह जनता पार्टी के उम्मीदवार सुरथ बहादुर शाह से चुनाव हार गए। 1980 का चुनाव वह फिर जीते लेकिन परिणाम आने के तीन चार दिन बाद ही उनका निधन हो गया। बालगोविंद वर्मा का निधन होने पर कांग्रेस ने उनकी पत्नी ऊषा वर्मा को अपना उम्मीदवार बनाया। राजनीति में यह उनका पहला कदम था। बावजूद इसके वह भारी अंतर से चुनाव जीतीं। यहीं नहीं वह भी अपने पति की तरह लगातार तीन बार सांसद रहीं।
रवि प्रकाश वर्मा ने संभाली माता पिता की राजनीतिक विरासत
वर्ष 1998 में बाल गोविंद वर्मा और ऊषा वर्मा के पुत्र रवि प्रकाश वर्मा सपा के टिकट पर चुनाव जीत कर सांसद बने। वह भी लगातार तीन बार सांसद रहे। उन्होंने भाजपा के नेता राजेंद्र गुप्ता और फायर ब्रांड नेता विनय कटियार को हराकर अपना वर्चस्व कायम रखा। 2009 के चुनाव में उन्हें कांग्रेस के जफर अली नकवी और 2014 के चुनाव में भाजपा के अजय मिश्र टेनी से पराजय का सामना करना पड़ा। 2014 में ही वह राज्यसभा के सदस्य बने। अब रवि प्रकाश वर्मा की बेटी डॉ. पूर्वी वर्मा भी राजनीति में सक्रिय हैं।
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डॉ. कौशल के राजनीतिक उत्तराधिकारी बने उनके पौत्र उत्कर्ष वर्मा
लखीमपुर विधानसभा क्षेत्र से समाजवादी पार्टी के तीन बार विधायक रहे डॉ. कौशल किशोर वर्मा की राजनीतिक विरासत को उनके पौत्र उत्कर्ष वर्मा संभाल रहे हैं। डॉ. कौशल किशोर वर्मा 1996, 2002, 2007 में चुनाव जीत कर विधायक बने। 2010 में विधायक रहते हुए डॉ. कौशल किशोर का बीमारी से निधन हो गया। 2010 में ही विधानसभा का उपचुनाव हुआ, जिसमें समाजवादी पार्टी ने डॉ. कौशल किशोर वर्मा के पौत्र उत्कर्ष वर्मा को अपना उम्मीदवार बनाया। उत्कर्ष वर्मा यह चुनाव जीत कर पहली बार विधायक बने। इसके बाद 2012 के चुनाव में भी सपा के टिकट पर ही उन्होंने जीत हासिल की, लेकिन 2017 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
विधायक शशांक वर्मा संभाल रहे अपने पिता की राजनीतिक विरासत
निघासन विधानसभा क्षेत्र से दो बार भाजपा के टिकट पर विधायक रहे पूर्वमंत्री रामकुमार वर्मा की राजनीतिक विरासत को उनके बेटे शशांक वर्मा आगे बढ़ा रहे हैं। रामकुमार वर्मा तीन बार 1989, 1991 और 1993 में हैदराबाद विधानसभा क्षेत्र से और दो बार 1996 और 2017 में निघासन विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीते। 2017 का चुनाव जीतने के बाद 30 सितंबर 2018 को उनका निधन हो गया। यहां 2019 में विधानसभा का उपचुनाव हुआ जिसमें भाजपा ने उनके पुत्र शशांक वर्मा को अपना उम्मीदवार बनाया। शशांक वर्मा यह चुनाव जीतकर पहली बार विधायक बने।
जितिन प्रसाद और रामसरन भी सहेज रहे अपने पिता की विरासत
शाहजहांपुर से सांसद रहे कांग्रेस के दिग्गज नेता जितेंद्र प्रसाद की राजनीतिक विरासत उनके बेटे जितिन प्रसाद ने संभाली। उन्होंने अपना कार्यक्षेत्र धौरहरा लोकसभा क्षेत्र को बनाया और 2009 में चुनाव जीतकर यहां से सांसद और केंद्र सरकार में मंत्री बने। पैला विधानसभा क्षेत्र से दो बार विधायक रहे नंगा राम के पुत्र रामसरन ने अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया है। रामसरन एक बार पैला (सु) सीट से और एक बार श्रीनगर (सु) सीट से विधायक बने। इस तरह जिले में विरासत की सियासत खूब चमकी है।
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वर्ष 1962 में कांग्रेस नेता बालगोविंद वर्मा लोकसभा चुनाव जीतकर पहली बार सांसद बने। वह कांग्रेस के टिकट पर लगातार तीन बार 1962, 1967 और 1972 में चुनाव जीते। 1977 में वह जनता पार्टी के उम्मीदवार सुरथ बहादुर शाह से चुनाव हार गए। 1980 का चुनाव वह फिर जीते लेकिन परिणाम आने के तीन चार दिन बाद ही उनका निधन हो गया। बालगोविंद वर्मा का निधन होने पर कांग्रेस ने उनकी पत्नी ऊषा वर्मा को अपना उम्मीदवार बनाया। राजनीति में यह उनका पहला कदम था। बावजूद इसके वह भारी अंतर से चुनाव जीतीं। यहीं नहीं वह भी अपने पति की तरह लगातार तीन बार सांसद रहीं।
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रवि प्रकाश वर्मा ने संभाली माता पिता की राजनीतिक विरासत
वर्ष 1998 में बाल गोविंद वर्मा और ऊषा वर्मा के पुत्र रवि प्रकाश वर्मा सपा के टिकट पर चुनाव जीत कर सांसद बने। वह भी लगातार तीन बार सांसद रहे। उन्होंने भाजपा के नेता राजेंद्र गुप्ता और फायर ब्रांड नेता विनय कटियार को हराकर अपना वर्चस्व कायम रखा। 2009 के चुनाव में उन्हें कांग्रेस के जफर अली नकवी और 2014 के चुनाव में भाजपा के अजय मिश्र टेनी से पराजय का सामना करना पड़ा। 2014 में ही वह राज्यसभा के सदस्य बने। अब रवि प्रकाश वर्मा की बेटी डॉ. पूर्वी वर्मा भी राजनीति में सक्रिय हैं।
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डॉ. कौशल के राजनीतिक उत्तराधिकारी बने उनके पौत्र उत्कर्ष वर्मा
लखीमपुर विधानसभा क्षेत्र से समाजवादी पार्टी के तीन बार विधायक रहे डॉ. कौशल किशोर वर्मा की राजनीतिक विरासत को उनके पौत्र उत्कर्ष वर्मा संभाल रहे हैं। डॉ. कौशल किशोर वर्मा 1996, 2002, 2007 में चुनाव जीत कर विधायक बने। 2010 में विधायक रहते हुए डॉ. कौशल किशोर का बीमारी से निधन हो गया। 2010 में ही विधानसभा का उपचुनाव हुआ, जिसमें समाजवादी पार्टी ने डॉ. कौशल किशोर वर्मा के पौत्र उत्कर्ष वर्मा को अपना उम्मीदवार बनाया। उत्कर्ष वर्मा यह चुनाव जीत कर पहली बार विधायक बने। इसके बाद 2012 के चुनाव में भी सपा के टिकट पर ही उन्होंने जीत हासिल की, लेकिन 2017 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
विधायक शशांक वर्मा संभाल रहे अपने पिता की राजनीतिक विरासत
निघासन विधानसभा क्षेत्र से दो बार भाजपा के टिकट पर विधायक रहे पूर्वमंत्री रामकुमार वर्मा की राजनीतिक विरासत को उनके बेटे शशांक वर्मा आगे बढ़ा रहे हैं। रामकुमार वर्मा तीन बार 1989, 1991 और 1993 में हैदराबाद विधानसभा क्षेत्र से और दो बार 1996 और 2017 में निघासन विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीते। 2017 का चुनाव जीतने के बाद 30 सितंबर 2018 को उनका निधन हो गया। यहां 2019 में विधानसभा का उपचुनाव हुआ जिसमें भाजपा ने उनके पुत्र शशांक वर्मा को अपना उम्मीदवार बनाया। शशांक वर्मा यह चुनाव जीतकर पहली बार विधायक बने।
जितिन प्रसाद और रामसरन भी सहेज रहे अपने पिता की विरासत
शाहजहांपुर से सांसद रहे कांग्रेस के दिग्गज नेता जितेंद्र प्रसाद की राजनीतिक विरासत उनके बेटे जितिन प्रसाद ने संभाली। उन्होंने अपना कार्यक्षेत्र धौरहरा लोकसभा क्षेत्र को बनाया और 2009 में चुनाव जीतकर यहां से सांसद और केंद्र सरकार में मंत्री बने। पैला विधानसभा क्षेत्र से दो बार विधायक रहे नंगा राम के पुत्र रामसरन ने अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया है। रामसरन एक बार पैला (सु) सीट से और एक बार श्रीनगर (सु) सीट से विधायक बने। इस तरह जिले में विरासत की सियासत खूब चमकी है।