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Lakhimpur Kheri News: ठंड में अव्यवस्था का दंड भुगत रहे बेसहारा

Mon, 29 Dec 2025 11:51 PM IST
बरेली ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी Updated Mon, 29 Dec 2025 11:51 PM IST
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The helpless are suffering the punishment of chaos in the cold
रेलवे स्टेशन परिसर में खुले में सोता वृद्व। संवाद
लखीमपुर खीरी। रैन बसेरे का सहारा नहीं मिलने से बेसहारा लोग कड़ाके की ठंड में अव्यवस्था का दंड भुगत रहे हैं। न्यूनतम 8 डिग्री पारे के बीच रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड परिसर में खुले आसमान के नीचे उन्हें सर्द रात काटनी पड़ रही है, जबकि रैन बसेरे में बिस्तर सूने पड़े हैं। पूछने पर लोगों ने बताया कि आधार कार्ड के बिना उन्हें एंट्री नहीं दी जाती है।
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सोमवार को जब पूरे जिले में रैन बसेरों और खुले में विश्राम कर रहे लोगों की पड़ताल की गई तो स्थिति चिंताजनक नजर आई। लखीमपुर रेलवे स्टेशन पर दो लोग खुले में सोते मिले, जबकि ठीक सामने बने अस्थायी रैन बसेरे में सन्नाटा पसरा रहा। वहां उपलब्ध सभी बिस्तर खाली पड़े थे। इसी तरह ठेला स्टैंड के पास कुछ मजदूर खाली स्थान पर कागज जलाकर आग तापते दिखाई दिए। ठंड से बचाव के लिए उनके पास यही एकमात्र सहारा था।
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रेलवे अधिकारियों व जीआरपी का कहना है कि रात के समय निरीक्षण के दौरान जो भी व्यक्ति खुले में सोता हुआ मिलता है, उसे रैन बसेरे में भेजा जाता है। हालांकि, उनका यह भी दावा है कि कई लोग कुछ देर रैन बसेरे में रुकने के बाद दोबारा बाहर आ जाते हैं। इसके पीछे एक बड़ा कारण सामने आया है कि रैन बसेरों में बिना पहचान पत्र (आईडी) के रुकने की अनुमति नहीं दी जा रही है। माना जा रहा है कि जिन बेघर लोगों के पास अपनी पहचान से जुड़ा कोई दस्तावेज नहीं है, वे मजबूरी में खुले में ही रात गुजार रहे हैं।
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यह स्थिति सिर्फ लखीमपुर शहर तक सीमित नहीं है। धौरहरा, निघासन, गोला, मोहम्मदी और बरबर जैसे कस्बों में बनाए गए अस्थायी रैन बसेरों में भी लगभग यही हालात देखने को मिले। अधिकांश जगहों पर रैन बसेरे खाली रहे, जबकि बाहर ठंड से ठिठुरते लोग नजर आए।


प्रशासन की ओर से रैन बसेरों में मुकम्मल इंतजाम होने का दावा किया जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों पर सवाल खड़े कर रही है। लोगों का कहना है कि कड़ाके की ठंड के इस दौर में यदि पहचान पत्र की शर्त में कुछ ढील न दी गई तो बेघर लोगों के लिए रात काटना और भी मुश्किल हो सकता है। जरूरत इस बात की है कि मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए रैन बसेरों का लाभ हर जरूरतमंद तक पहुंचाया जाए।

रेलवे स्टेशन परिसर में खुले में सोता वृद्व। संवाद

रेलवे स्टेशन परिसर में खुले में सोता वृद्व। संवाद

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