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‘आलू के अच्छे उत्पादन को रोगों पर नियंत्रण जरूरी’
लखीमपुर खीरी
Updated Tue, 12 Jan 2016 05:23 PM IST
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जिला उद्यान अधिकारी दिग्विजय सिंह ने कहा है कि किसान आलू की पैदावार बढ़ाने के लिए रक्षात्मक दृष्टिकोण अपनाएं। प्रदेश में आलू के अच्छे उत्पादन के लिए कीटों और रोगों पर नियंत्रण जरूरी है।
उन्होंने बताया कि आलू की फसल पिछेती झुलसा रोग के प्रति बेहद संवेदनशील होती है। प्रतिकूल मौसम विशेषकर बदलीयुक्त बूंदा-बांदी और नम वातावरण में झुलसा रोग का प्रकोप बहुत तेजी से फैलता है। यह रोग फसल को भारी नुकसान पहुंचाता है। पिछेती झुलसा रोग के प्रकोप से पत्तियां सिरे से झुलसना शुरू होती हैं जो तेजी से फैलती हैं। पत्तियों पर भूरे काले रंग के जलीय धब्बे बनते है तथा पत्तियों के निचली सतह पर रूई की तरह फफूंद दिखाई देती है। बदलीयुक्त 80 फीसदी से अधिक आद्र वातावरण और 10-20 डिग्री सेंटीग्रेड तापक्रम पर इस रोग का प्रकोप बहुत तेजी से होता है। दो से चार दिनों के अंदर ही संपूर्ण फसल नष्ट हो जाती हैं।
जिला उद्यान अधिकारी ने कहा कि आलू की फसल को पिछेती झुलसा रोग से बचाने के लिए जिंक मैगनीज कार्बामेट दो से 2.5 किग्रा को 800-1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव किया जाए तथा आवश्यकतानुसार 10 से 15 दिन के अंतराल पर दूसरे छिड़काव में फफूंदीनाशक के साथ कीट नाशक जैसे डायमेथाएट एक लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।
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उन्होंने कहा कि जिन खेतों में पिछेती झुलसा रोग का प्रकोप हो गया हो तो ऐसी स्थिति में रोकथाम के लिए अंत:ग्राही, सिस्टेमिक, फफूंद नाशक मेटालेक्जिल युक्त रसायन 2.5 किलोग्राम अथवा साईमोक्जेनिल युक्त फफूंद नाशक 3.0 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 800-1000 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने को कहा।
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उन्होंने बताया कि आलू की फसल पिछेती झुलसा रोग के प्रति बेहद संवेदनशील होती है। प्रतिकूल मौसम विशेषकर बदलीयुक्त बूंदा-बांदी और नम वातावरण में झुलसा रोग का प्रकोप बहुत तेजी से फैलता है। यह रोग फसल को भारी नुकसान पहुंचाता है। पिछेती झुलसा रोग के प्रकोप से पत्तियां सिरे से झुलसना शुरू होती हैं जो तेजी से फैलती हैं। पत्तियों पर भूरे काले रंग के जलीय धब्बे बनते है तथा पत्तियों के निचली सतह पर रूई की तरह फफूंद दिखाई देती है। बदलीयुक्त 80 फीसदी से अधिक आद्र वातावरण और 10-20 डिग्री सेंटीग्रेड तापक्रम पर इस रोग का प्रकोप बहुत तेजी से होता है। दो से चार दिनों के अंदर ही संपूर्ण फसल नष्ट हो जाती हैं।
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जिला उद्यान अधिकारी ने कहा कि आलू की फसल को पिछेती झुलसा रोग से बचाने के लिए जिंक मैगनीज कार्बामेट दो से 2.5 किग्रा को 800-1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव किया जाए तथा आवश्यकतानुसार 10 से 15 दिन के अंतराल पर दूसरे छिड़काव में फफूंदीनाशक के साथ कीट नाशक जैसे डायमेथाएट एक लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।
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उन्होंने कहा कि जिन खेतों में पिछेती झुलसा रोग का प्रकोप हो गया हो तो ऐसी स्थिति में रोकथाम के लिए अंत:ग्राही, सिस्टेमिक, फफूंद नाशक मेटालेक्जिल युक्त रसायन 2.5 किलोग्राम अथवा साईमोक्जेनिल युक्त फफूंद नाशक 3.0 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 800-1000 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने को कहा।