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Lakhimpur Kheri News: दशहरा मेले की रौनक पर ‘अधिकारों’ की लड़ाई
Mon, 19 Oct 2026 11:41 PM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
Updated Mon, 19 Oct 2026 11:41 PM IST
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जिस स्थान पर लगाया जाता है मेला, खाली पड़ी जगह एक भी नहीं लग सकी दुकान।संवाद
लखीमपुर खीरी। शहर के ऐतिहासिक दशहरा मेले की रौनक पर इस बार अधिकारों की खींचतान भारी पड़ती दिख रही है। दशहरा आ गया है, लेकिन मेला मैदान में अब तक दुकानें नहीं सजी हैं।
मेले में हर साल दशहरा से धनतेरस तक करीब 230 दुकानें लगती हैं। इस बार झूले लगाने की तैयारी शुरू हो गई है, लेकिन दुकानों को लेकर असमंजस बना हुआ है। विवाद के केंद्र में वर्ष 1938 का वह लिखित समझौता है, जिसके आधार पर नगर पालिका और सेठ गया प्रसाद ट्रस्ट के अधिकारों और जिम्मेदारियों को लेकर अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं।
मेले में दुकानें न लगने से दुकानदारों को कारोबार प्रभावित होने की चिंता सता रही है। उनका कहना है कि दशहरा से धनतेरस तक का समय कारोबार के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होता है। दुकानें लगाने में देरी का असर बिक्री पर पड़ेगा। वहीं, शहरवासियों को भी मेले की रौनक फीकी पड़ने की आशंका है। दुकानदारों के सामने सवाल है कि यदि दुकानें देर से लगीं तो कम समय में किराया और अन्य खर्च कैसे निकलेंगे।
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1938 के समझौते में क्या है व्यवस्था
नगर पालिका अध्यक्ष डॉ. इरा श्रीवास्तव के मुताबिक, वर्ष 1938 के लिखित एग्रीमेंट में जमीन की जिम्मेदारी और किराया वसूली की व्यवस्था तय है। इसके अनुसार, 11 महीने जमीन की जिम्मेदारी और किराया वसूली सेठ गया प्रसाद ट्रस्ट के पास रहती है, जबकि एक माह नगर पालिका के पास रहता है। इसी एक माह में मेला लगवाने और किराया वसूलने की जिम्मेदारी नगर पालिका की है। समझौते के अनुसार, मेले से होने वाली आय में 75 प्रतिशत हिस्सा नगर पालिका और 25 प्रतिशत ट्रस्ट को मिलना है।
डॉ. इरा श्रीवास्तव ने कहा कि नगर पालिका हर साल की तरह इस बार भी मेला लगवाएगी। उन्होंने आरोप लगाया कि ट्रस्ट के तथाकथित सरबराहकार विपुल सेठ की ओर से पारंपरिक मेले में अड़ंगा लगाया जा रहा है। उन्होंने दुकानदारों से दुकानें लगाने की अपील करते हुए कहा कि किसी का नुकसान नहीं होने दिया जाएगा। दुकानदार चाहेंगे तो उन्हें एक सप्ताह से 10 दिन तक का अतिरिक्त समय लिखित रूप में दिया जाएगा।
रामलीला कमेटी ने विवाद से किया इन्कार
रामलीला कमेटी के संयोजक विपुल सेठ ने कहा कि उनकी ओर से कोई विवाद नहीं है। उनके मुताबिक, दुकानदार नुकसान की आशंका के चलते दुकानें नहीं लगा रहे हैं। वे चाहते हैं कि नगर पालिका उन्हें अतिरिक्त समय देने का आदेश जारी करे। इसी कारण दुकानें लगाने में देरी हो रही है।
तीन साल से खींचतान का दावा
श्रमिक मेला दुकानदार समिति के अध्यक्ष संतोष पटवा ने कहा कि नगर पालिका और रामलीला कमेटी के बीच पिछले करीब तीन साल से चल रहे विवाद के कारण दुकानदारों को परेशानी हो रही है। उन्हें समय से जगह नहीं मिल पा रही है। इस बार भी स्थिति स्पष्ट नहीं है, जबकि धनतेरस तक ही दुकानें लगाने का समय रहता है। कम समय मिलने पर न तो किराया निकल पाएगा और न ही दूसरे खर्च पूरे होंगे। ऐसे में दुकानदारों के नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा, यह बड़ा सवाल है। उनके मुताबिक, नगर पालिका यदि 10 दिन का अतिरिक्त समय दे दे तो दुकानदार नुकसान की भरपाई कर सकते हैं।
विवाद के बीच परंपरा पर असर
शहरवासियों का कहना है कि नगर पालिका और रामलीला कमेटी के बीच खींचतान का असर ऐतिहासिक मेले पर नहीं पड़ना चाहिए। उनका मानना है कि दोनों पक्षों को आपसी मतभेद दूर कर दुकानदारों को समय से जगह उपलब्ध कराने की व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि मेले की परंपरा और रौनक बनी रहे।
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मेले में हर साल दशहरा से धनतेरस तक करीब 230 दुकानें लगती हैं। इस बार झूले लगाने की तैयारी शुरू हो गई है, लेकिन दुकानों को लेकर असमंजस बना हुआ है। विवाद के केंद्र में वर्ष 1938 का वह लिखित समझौता है, जिसके आधार पर नगर पालिका और सेठ गया प्रसाद ट्रस्ट के अधिकारों और जिम्मेदारियों को लेकर अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं।
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मेले में दुकानें न लगने से दुकानदारों को कारोबार प्रभावित होने की चिंता सता रही है। उनका कहना है कि दशहरा से धनतेरस तक का समय कारोबार के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होता है। दुकानें लगाने में देरी का असर बिक्री पर पड़ेगा। वहीं, शहरवासियों को भी मेले की रौनक फीकी पड़ने की आशंका है। दुकानदारों के सामने सवाल है कि यदि दुकानें देर से लगीं तो कम समय में किराया और अन्य खर्च कैसे निकलेंगे।
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1938 के समझौते में क्या है व्यवस्था
नगर पालिका अध्यक्ष डॉ. इरा श्रीवास्तव के मुताबिक, वर्ष 1938 के लिखित एग्रीमेंट में जमीन की जिम्मेदारी और किराया वसूली की व्यवस्था तय है। इसके अनुसार, 11 महीने जमीन की जिम्मेदारी और किराया वसूली सेठ गया प्रसाद ट्रस्ट के पास रहती है, जबकि एक माह नगर पालिका के पास रहता है। इसी एक माह में मेला लगवाने और किराया वसूलने की जिम्मेदारी नगर पालिका की है। समझौते के अनुसार, मेले से होने वाली आय में 75 प्रतिशत हिस्सा नगर पालिका और 25 प्रतिशत ट्रस्ट को मिलना है।
डॉ. इरा श्रीवास्तव ने कहा कि नगर पालिका हर साल की तरह इस बार भी मेला लगवाएगी। उन्होंने आरोप लगाया कि ट्रस्ट के तथाकथित सरबराहकार विपुल सेठ की ओर से पारंपरिक मेले में अड़ंगा लगाया जा रहा है। उन्होंने दुकानदारों से दुकानें लगाने की अपील करते हुए कहा कि किसी का नुकसान नहीं होने दिया जाएगा। दुकानदार चाहेंगे तो उन्हें एक सप्ताह से 10 दिन तक का अतिरिक्त समय लिखित रूप में दिया जाएगा।
रामलीला कमेटी ने विवाद से किया इन्कार
रामलीला कमेटी के संयोजक विपुल सेठ ने कहा कि उनकी ओर से कोई विवाद नहीं है। उनके मुताबिक, दुकानदार नुकसान की आशंका के चलते दुकानें नहीं लगा रहे हैं। वे चाहते हैं कि नगर पालिका उन्हें अतिरिक्त समय देने का आदेश जारी करे। इसी कारण दुकानें लगाने में देरी हो रही है।
तीन साल से खींचतान का दावा
श्रमिक मेला दुकानदार समिति के अध्यक्ष संतोष पटवा ने कहा कि नगर पालिका और रामलीला कमेटी के बीच पिछले करीब तीन साल से चल रहे विवाद के कारण दुकानदारों को परेशानी हो रही है। उन्हें समय से जगह नहीं मिल पा रही है। इस बार भी स्थिति स्पष्ट नहीं है, जबकि धनतेरस तक ही दुकानें लगाने का समय रहता है। कम समय मिलने पर न तो किराया निकल पाएगा और न ही दूसरे खर्च पूरे होंगे। ऐसे में दुकानदारों के नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा, यह बड़ा सवाल है। उनके मुताबिक, नगर पालिका यदि 10 दिन का अतिरिक्त समय दे दे तो दुकानदार नुकसान की भरपाई कर सकते हैं।
विवाद के बीच परंपरा पर असर
शहरवासियों का कहना है कि नगर पालिका और रामलीला कमेटी के बीच खींचतान का असर ऐतिहासिक मेले पर नहीं पड़ना चाहिए। उनका मानना है कि दोनों पक्षों को आपसी मतभेद दूर कर दुकानदारों को समय से जगह उपलब्ध कराने की व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि मेले की परंपरा और रौनक बनी रहे।