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Lakhimpur Kheri News: 13वीं डायलिसिस मशीन को जगह नहीं मिली, 12 पर चल रही मरीजों की सांसों की जंग
Mon, 26 Oct 2026 11:15 PM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
Updated Mon, 26 Oct 2026 11:15 PM IST
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सेंटर में डायलिसिस करा रहे भर्ती मरीज। संवाद
लखीमपुर खीरी। टीबी अस्पताल में संचालित डायलिसिस सेंटर में जगह की कमी मरीजों के इलाज में बाधा बन रही है। यूनिट में 13 मशीनें उपलब्ध हैं, लेकिन जगह न मिलने से एक मशीन का इस्तेमाल नहीं हो सका और धीरे-धीरे कंडम हो गई। अब 12 मशीनों से ही मरीजों की डायलिसिस की जा रही है। रोजाना 30 से 32 मरीज पहुंचते हैं और अधिकांश समय उन्हें अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है।
डायलिसिस यूनिट की शुरुआत 11 अप्रैल, 2022 को छह बेड के साथ हुई थी। मरीजों की संख्या बढ़ने पर समय-समय पर इसकी क्षमता बढ़ाई गई, लेकिन जगह की कमी अब भी बनी हुई है। एक मरीज की डायलिसिस में करीब चार घंटे लगते हैं। अधिकांश मरीजों को सप्ताह में दो से तीन बार डायलिसिस करानी पड़ती है। ऐसे में उपलब्ध मशीनों पर काम का दबाव रहता है।
यूनिट में पहली शिफ्ट सुबह सात से 11 बजे, दूसरी दोपहर 12 से शाम चार बजे और तीसरी शाम पांच से रात नौ बजे तक चलती है। इसके बावजूद नए मरीजों को बेड मिलने के लिए इंतजार करना पड़ता है। यूनिट प्रभारी ओम शर्मा ने बताया कि नए मरीज को जगह तभी मिल पाती है, जब कोई मौजूदा मरीज दूसरे शहर चला जाए, किडनी ट्रांसप्लांट करा ले या उसकी मृत्यु हो जाए।
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यूनिट में ऑक्सीजन पाइपलाइन और ऑक्सीजन कंसंट्रेटर उपलब्ध नहीं हैं। जरूरत पड़ने पर सिलिंडर से काम चलाया जाता है। वहीं, ठंड के मौसम में मरीजों की संख्या घटने की बात भी सामने आई है।
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हेपेटाइटिस के मरीजों के लिए अलग व्यवस्था
यूनिट में हेपेटाइटिस-बी से पीड़ित मरीजों के लिए अलग मशीन और हेपेटाइटिस-सी के मरीजों के लिए अलग बेड आरक्षित है। इसका उद्देश्य संक्रमण को अन्य मरीजों तक फैलने से रोकना है।
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डायलिसिस यूनिट की शुरुआत 11 अप्रैल, 2022 को छह बेड के साथ हुई थी। मरीजों की संख्या बढ़ने पर समय-समय पर इसकी क्षमता बढ़ाई गई, लेकिन जगह की कमी अब भी बनी हुई है। एक मरीज की डायलिसिस में करीब चार घंटे लगते हैं। अधिकांश मरीजों को सप्ताह में दो से तीन बार डायलिसिस करानी पड़ती है। ऐसे में उपलब्ध मशीनों पर काम का दबाव रहता है।
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यूनिट में पहली शिफ्ट सुबह सात से 11 बजे, दूसरी दोपहर 12 से शाम चार बजे और तीसरी शाम पांच से रात नौ बजे तक चलती है। इसके बावजूद नए मरीजों को बेड मिलने के लिए इंतजार करना पड़ता है। यूनिट प्रभारी ओम शर्मा ने बताया कि नए मरीज को जगह तभी मिल पाती है, जब कोई मौजूदा मरीज दूसरे शहर चला जाए, किडनी ट्रांसप्लांट करा ले या उसकी मृत्यु हो जाए।
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यूनिट में ऑक्सीजन पाइपलाइन और ऑक्सीजन कंसंट्रेटर उपलब्ध नहीं हैं। जरूरत पड़ने पर सिलिंडर से काम चलाया जाता है। वहीं, ठंड के मौसम में मरीजों की संख्या घटने की बात भी सामने आई है।
हेपेटाइटिस के मरीजों के लिए अलग व्यवस्था
यूनिट में हेपेटाइटिस-बी से पीड़ित मरीजों के लिए अलग मशीन और हेपेटाइटिस-सी के मरीजों के लिए अलग बेड आरक्षित है। इसका उद्देश्य संक्रमण को अन्य मरीजों तक फैलने से रोकना है।