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खांडसारी उद्योग पर मंडरा रहा खतरा
बांकेगंज।
Updated Sun, 08 Mar 2015 06:24 PM IST
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तराई के गन्ना किसान ही संकट में नहीं हैं, बल्कि गन्ने से जुड़े खांडसारी उद्योग पर भी खतरा मंडरा रहा है। ज्यादा मूल्य पर गन्ना खरीद कर कम रिकवरी होने से खांडसारी उद्योग घाटे में जा रहे हैं। चीनी के दामों में आई गिरावट के बाद यह संकट और बढ़ गया है। इस सीजन में कई खांडसारी इकाइयों ने इस साल तो किसी तरह काम चला लिया, लेकिन अगले साल से इकाइयों में ताला ठोकने का मन बना चुके हैं।
बता दें कि सरकारी गन्ना मूल्य करीब 275 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित हैं। चीनी मिलों के सामने इस मूल्य पर गन्ना खरीदने की मजबूरी है, लेकिन वह भुगतान सालों लटका कर काम चलाते हैं। खांडसारी इकाइयाें को नकद भुगतान करना पड़ता है। मिल निर्मित चीनी का मूल्य गिरने से खांडसारी शकर की मांग काफी कम हो गई है। इससे पूरी लागत लगाने के बाद भी चीनी बेचने के लाले पड़ रहे हैं। खांडसारी इकाइयों पर जरूरतमंद किसान ही गन्ना बिक्री करते हैं। इस साल दो सौ रुपया प्रति कुंटल से कम मूल्य पर गन्ना उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। वह भी नकद भुगतान की शर्त पर, जबकि खांडसारी शकर थोक में बेचने पर पैसा बाद में ही मिल पाता है। कस्बा के निकटवर्ती ग्राम नौवाखेड़ा स्थित खांडसारी इकाई के पार्टनर गोविंद गोयल ने बताया कि चीनी मिलों की रिकवरी प्रति क्विंटल 9.5 प्रतिशत है, जबकि खांडसारी इकाइयों में यह रिकवरी महज 7 प्रतिशत होती है। वह कहते हैं कि खांडसारी इकाइयों को वैक्यूम पैन सिस्टम का लाइसेंस नहीं मिलता, जिससे उन्हें ओपेन पैन सिस्टम से ही काम चलाना पड़ता है। इसके कारण खांडसारी इकाइयों की रिकवरी चीनी मिल की अपेक्षा कम है। उनका कहना है कि खांडसारी इकाइयों को वैक्यूम सिस्टम का लाइसेंस देकर तराई के इस प्रमुख उद्योग को मौत से बचाया जा सकता है। मालूम हो कि करीब बारह साल पहले जिले में करीब 125 खांडसारी इकाइयां थीं, जिनकी संख्या घटकर अब 16 रह गई है। इस पर भी घाटे का संकट मंडरा रहा है।
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बता दें कि सरकारी गन्ना मूल्य करीब 275 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित हैं। चीनी मिलों के सामने इस मूल्य पर गन्ना खरीदने की मजबूरी है, लेकिन वह भुगतान सालों लटका कर काम चलाते हैं। खांडसारी इकाइयाें को नकद भुगतान करना पड़ता है। मिल निर्मित चीनी का मूल्य गिरने से खांडसारी शकर की मांग काफी कम हो गई है। इससे पूरी लागत लगाने के बाद भी चीनी बेचने के लाले पड़ रहे हैं। खांडसारी इकाइयों पर जरूरतमंद किसान ही गन्ना बिक्री करते हैं। इस साल दो सौ रुपया प्रति कुंटल से कम मूल्य पर गन्ना उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। वह भी नकद भुगतान की शर्त पर, जबकि खांडसारी शकर थोक में बेचने पर पैसा बाद में ही मिल पाता है। कस्बा के निकटवर्ती ग्राम नौवाखेड़ा स्थित खांडसारी इकाई के पार्टनर गोविंद गोयल ने बताया कि चीनी मिलों की रिकवरी प्रति क्विंटल 9.5 प्रतिशत है, जबकि खांडसारी इकाइयों में यह रिकवरी महज 7 प्रतिशत होती है। वह कहते हैं कि खांडसारी इकाइयों को वैक्यूम पैन सिस्टम का लाइसेंस नहीं मिलता, जिससे उन्हें ओपेन पैन सिस्टम से ही काम चलाना पड़ता है। इसके कारण खांडसारी इकाइयों की रिकवरी चीनी मिल की अपेक्षा कम है। उनका कहना है कि खांडसारी इकाइयों को वैक्यूम सिस्टम का लाइसेंस देकर तराई के इस प्रमुख उद्योग को मौत से बचाया जा सकता है। मालूम हो कि करीब बारह साल पहले जिले में करीब 125 खांडसारी इकाइयां थीं, जिनकी संख्या घटकर अब 16 रह गई है। इस पर भी घाटे का संकट मंडरा रहा है।
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