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सज गए शिवालय, शिवमय हुआ लखीमपुर
लखीमपुर खीरी।
Updated Thu, 30 Jul 2015 08:59 PM IST
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जिले में कई ऐसे प्राचीन मंदिर हैं जिनका संबंध रामायण और महाभारत काल से है। गोला गोकर्णनाथ का शिव मंदिर रामायण काल का माना जाता है तो लिलौटीनाथ मंदिर और मोहम्मदी के निकट स्थित टेढ़ेनाथ मंदिर के अलावा देवकली का शिवमंदिर महाभारत काल का माना जाता है। ओयल का मेढक मंदिर और सिंगाही का भूलभुलैया मंदिर अपनी अद्भुत स्थापत्य कला के लिए पूरे देश में जाना जाता है।
प्राचीन गोलागोकर्णनाथ का प्राचीन शिव मंदिर
छोटी काशी के नाम से विख्यात गोला गोकर्णनाथ के मंदिर में स्थापित प्राचीन शिवलिंग लंका के राजा रावण द्वारा स्थापित बताया जाता है। गाय के आकार का शिवलिंग होने के कारण इसका नाम गोकर्णनाथ पड़ा। मंदिर के निकट एक पक्का सरोवर है जिसे गोकर्ण तीर्थ कहते हैं। दूर-दूर से कांवड़िए पवित्र नदियों का जल लाकर प्राचीन और दिव्य शिवलिंग का अभिषेक करते हैं। यहां सावन में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है।
मंडूक तंत्र, श्रीयंत्र पर बना है ओयल का मेढक मंदिर
जिले के ओयल कस्बा स्थित मंडूक तंत्र और श्रीयंत्र पर बना शिव मंदिर मेढक मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र है। मंदिर का निर्माण करीब डेढ़ सौ साल पहले ओयल के तत्कालीन राजा बख्त सिंह और उनके उत्तराधिकारी अनिरुद्ध सिंह ने कराया था। मंदिर का निर्माण कपिला के महान तांत्रिकों की देखरेख में हुआ था। यह मंदिर अपनी अनोखी स्थापत्य कला के लिए पूरे भारत में जाना जाता है।
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अश्वत्थामा ने स्थापित किया था लिलौटीनाथ मंदिर
जिला मुख्यालय से करीब नौ किलोमीटर दूर निघासन रोड पर स्थित प्राचीन लिलौटीनाथ मंदिर है। किवदंती है कि मंदिर में स्थापित शिवलिंग की स्थापना द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने की थी। सुबह मंदिर का कपाट खुलने पर यह पूजित मिलता है। लोगों का कहना है कि शिवलिंग दिन में पांच बार अपना रंग बदलता है। यह मंदिर कई जिले के लोगों के लिए गहन आस्था का केंद्र है। यहां बड़ी संख्या में कांवड़िए आते हैं।
भूमि फोड़कर प्रकट हुए थे भुइफोरवानाथ
शहर के मेला मैदान स्थित प्राचीन शिव मंदिर में स्थापित शिवलिंग के बारे में कहा जाता है कि यह शिवलिंग भूमि फोड़ कर प्रकट हुआ था। इसीलिए इस प्राचीन शिवलिंग का नाम भुइफोरवानाथ पड़ा। इसी के नाम से मोहल्ले का नाम भी भुइफोरवानाथ पड़ा है। मंदिर के ठीक सामने दो वट वृक्ष प्राकृतिक रूप से जुड़कर तोरणद्वार का रूप देते हैं। पूजा अर्चना के लिए यहां सावन में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। यहां महारुद्राभिषेक भी होता है।
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प्राचीन गोलागोकर्णनाथ का प्राचीन शिव मंदिर
छोटी काशी के नाम से विख्यात गोला गोकर्णनाथ के मंदिर में स्थापित प्राचीन शिवलिंग लंका के राजा रावण द्वारा स्थापित बताया जाता है। गाय के आकार का शिवलिंग होने के कारण इसका नाम गोकर्णनाथ पड़ा। मंदिर के निकट एक पक्का सरोवर है जिसे गोकर्ण तीर्थ कहते हैं। दूर-दूर से कांवड़िए पवित्र नदियों का जल लाकर प्राचीन और दिव्य शिवलिंग का अभिषेक करते हैं। यहां सावन में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है।
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मंडूक तंत्र, श्रीयंत्र पर बना है ओयल का मेढक मंदिर
जिले के ओयल कस्बा स्थित मंडूक तंत्र और श्रीयंत्र पर बना शिव मंदिर मेढक मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र है। मंदिर का निर्माण करीब डेढ़ सौ साल पहले ओयल के तत्कालीन राजा बख्त सिंह और उनके उत्तराधिकारी अनिरुद्ध सिंह ने कराया था। मंदिर का निर्माण कपिला के महान तांत्रिकों की देखरेख में हुआ था। यह मंदिर अपनी अनोखी स्थापत्य कला के लिए पूरे भारत में जाना जाता है।
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अश्वत्थामा ने स्थापित किया था लिलौटीनाथ मंदिर
जिला मुख्यालय से करीब नौ किलोमीटर दूर निघासन रोड पर स्थित प्राचीन लिलौटीनाथ मंदिर है। किवदंती है कि मंदिर में स्थापित शिवलिंग की स्थापना द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने की थी। सुबह मंदिर का कपाट खुलने पर यह पूजित मिलता है। लोगों का कहना है कि शिवलिंग दिन में पांच बार अपना रंग बदलता है। यह मंदिर कई जिले के लोगों के लिए गहन आस्था का केंद्र है। यहां बड़ी संख्या में कांवड़िए आते हैं।
भूमि फोड़कर प्रकट हुए थे भुइफोरवानाथ
शहर के मेला मैदान स्थित प्राचीन शिव मंदिर में स्थापित शिवलिंग के बारे में कहा जाता है कि यह शिवलिंग भूमि फोड़ कर प्रकट हुआ था। इसीलिए इस प्राचीन शिवलिंग का नाम भुइफोरवानाथ पड़ा। इसी के नाम से मोहल्ले का नाम भी भुइफोरवानाथ पड़ा है। मंदिर के ठीक सामने दो वट वृक्ष प्राकृतिक रूप से जुड़कर तोरणद्वार का रूप देते हैं। पूजा अर्चना के लिए यहां सावन में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। यहां महारुद्राभिषेक भी होता है।