{"_id":"9ffffa2ee51c9d4d32cea997d5d7da94","slug":"rules-and-regulations-on-consumer-upset-all-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"नियम और कानून तमाम पर उपभोक्ता परेशान","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
नियम और कानून तमाम पर उपभोक्ता परेशान
लखीमपुर खीरी
Updated Sun, 15 Mar 2015 12:06 AM IST
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उपभोक्ताओं को सहूलियतें देने के लिए उपभोक्ता फोरम के अंतर्गत तमाम कानून हैं, लेकिन जानकारी के अभाव और लंबी कानूनी प्रक्रिया के चलते व्यापारियों की मनमानी सहने को ग्राहक मजबूर हैं। उपभोक्ता कानून में 90 दिन के भीतर शिकायत के निस्तारण की समय सीमा तय की गई थी, लेकिन सुनवाई न हो पाने से ग्राहकों की दिलचस्पी अब उपभोक्ता फोरम से घट रही है। नतीजतन संरक्षण फोरम जागो ग्राहक नाम से प्रचार अभियान चलाना पड़ रहा है।
तोल में शामिल करते हैं पैकिंग का वजन
उपभोक्ताओं का शोषण जगह जगह किया जाता है। यदि आप मिठाई की दुकान पर जाते हैं तो मिठाई की कीमत पर ही आपको गत्ते का डिब्बा भी तोल दिया जाता है। यहां तक कि नकली देशी घी, नकली पनीर, मिलावटी कडुवा तेल, मट्ठा, खोवे के नाम पर मशाले की बनी बर्फी, लौंज, मिल्क केक धड़ल्ले से बिक रहा है और उपभोक्ता ठगा जा रहा है। इसी प्रकार मेवा भी पैकिंग के साथ ही तोली जा रही है। सोना, चांदी इस समय बाजार में 65 से 60 और 40 प्रतिशत तक का बिक्री किया जा रहा है, जबकि सरकार द्वारा सोने के आभूषणों की हालमार्क बिक्री किए जाने के निर्देश दिए गए हैं, किंतु मार्केट में हालमार्क सोने की बिक्री के बजाय मिलावटी सोने और चांदी के जेवरों की बिक्री की जा रही है।
कानूनी दांव पेंच में उलझा उपभोक्ता संरक्षण
उपभोक्ताओं के साथ मनमानी रोकने के लिए दशकों पूर्व बना उपभोक्ता संरक्षण कानून वक्त के साथ ही कानूनी दांव पेंच में फंसता चला गया। शुरुआत में रेडियो और दूरदर्शन के साथ ही मीडिया ने भी इस कानून की जानकारी देते हुए दुकानदार और सेवा प्रदाताओं को सचेत किया कि ग्राहकों के साथ अब मनमानी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। ग्राहक ने अगर सादे कागज पर जिला उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज करा दी तो पेशी और सुनवाई में ही ग्राहकों के साथ मनमानी करने वाले को दिक्कतें शुरू हो जाएंगी। बाद में शिकायतों को दर्ज कराने और सुनवाई की कड़ी प्रक्रिया के बीच शिकायत का निपटारा लंबी कानूनी जंग बन गई सो बिना वकील के फरियाद दाखिल कर सुनवाई करा पाना बिल्कुल असंभव सा हो चुका है।
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जागो ग्राहक: जोर का झटका धीरे से
कोलगेट सिबाका टूथपेस्ट का फैमिली पैक 200 ग्राम की पैंकिग थी, कंपनी ने बड़ी होशियारी से इसे पहले 190, फिर 180, फिर 175 ग्राम कर दिया, ग्राहक घटती हुई छोटी मात्रा को समझ नहीं पाता है यह तो बानगी भर है इसी तरह वाशिंग पाउडर की हल्दी, गरम मसालों की पैंकिग से लेकर ट्रेंड चल पड़ा है जिससे ग्राहको को कंपनी के झटके का पता ही नही लगता।
उपभोक्ता फोरम में एक साल से नहीं है पेशकार
उपभोक्ता फोरम से हिमांशु स्वरूप पांडेय और रेखा दीक्षित के सेवानिवृत्त होने के बाद से लंबे समय तक न्यायिक सदस्य की नियुक्ति नहीं हो सकी थी। इसके बाद अब रिटायर्ड जज विंध्याचल प्रसाद श्रीवास्तव, अध्यक्ष और न्यायिक सदस्य सुकाली प्रसाद और विमला रस्तोगी ने कमान संभाली, लेकिन पिछले डेढ़ साल से पेशकार का पद रिक्त है।
खर्चीली और लंबी प्रक्रिया से घटी दिलचस्पी
पूर्व संयुक्त मंत्री और सिविल कोर्ट के अधिवक्ता हिमांशु तिवारी बताते हैं कि पहले सादे प्रार्थना पत्र पर सुनवाई हो जाती थी, अब 100 रुपये से कम की कोर्ट फीस नहीं है, जबकि सिविल कोर्ट में 22.50 रुपये और 37.50 रुपये की कोर्ट फीस पर मुकदमा दाखिल किया जा सकता है। पांच रुपये के तलबाना में तीन पक्षकारों को तलब किया जा सकता है, वहीं उपभोक्ता फोरम में प्रत्येक पक्षकार को तलब करने के लिए रजिस्ट्री वह भी एक्नालेजमेंट वाली लगानी पड़ती है। इस तरह खर्च के हिसाब से उपभोक्ता फोरम महंगा पड़ रहा है।
बहुतायत में लंबित हैं बीमा विवाद के मुकदमे
जिला उपभोक्ता फ ोरम में सबसे ज्यादा मामले बीमा विवाद से जुडे़ हैं, जिनमें सामान्य बीमा करने वाली सरकारी कंपनियों और निजी बीमा कंपनियों के मामले हैं, जहां पालिसी धारक की मृत्यु, एक्सीडेंट अथवा चोरी आगजनी के तयशुदा करार के बावजूद क्लेम देने में लापरवाही बरते जाने के विवाद प्रमुख है।
केस-1
कोर्ट कचेहरी के बिना नहीं मिलती क्षतिपूर्ति
गोला गोकर्णनाथ। मोहल्ला कुम्हारनटोला निवासी व्यापारी अशोक गट्टानी का पंजीकरण व्यापार कर विभाग में था। 17 सितंबर 2013 में सड़क दुर्घटना में उनकी मौत हो गई, लेकिन विभागीय बीमे की राशि चार लाख रुपये नहीं दी गई। उनकी पत्नी मधु गट्टानी बताती है कि घटना के दो माह में ही व्यापार कर विभाग में आवश्यक प्रपत्रों के साथ बीमा राशि का दावा पेश किया, किंतु उन्हें अब तक बीमा की राशि प्रदान नहीं की गई। तब उन्होंने उपभोक्ता संरक्षण फोरम लखीमपुर में बीमा राशि, ब्याज और क्षतिपूर्ति का परिवाद प्रस्तुत किया।
केस-2
मुआवजे के चक्कर में खर्च हुए 16 साल
धौरहरा तहसील के ग्राम बम्हौरी निवासी सुभाष चंद्र ने स्थानीय वाईडी कॉलेज से बीएड उत्तीर्ण किया था, मगर मार्कशीट में गलत सब्जेक्ट अंकित हो गए उसे दुरुस्त कराने के लिए जब उसकी शिकायतें अनसुनी कर दी गई तो उसने जिला उपभोक्ता संरक्षण फोरम की मदद ली 1998 में दावा दाखिल करने के बाद 2001 में विश्वविद्यालय की त्रुटि पाते हुए मुआवजा के आदेश दिए गए इसके बाद विश्वविद्यालय ने राज्य फोरम में अपील दाखिल कर दी गई वहां से विश्वविद्यालय की अपील खारिज होने के बाद फोरम के मुआवजा आदेश को क्रियान्वित करने के लिए अर्जी फिर जिला फोरम पहुंची है जो कई सालों बाद अभी तक निस्तारित नहीं की जा सकी है।
क्या कहते हैं व्यापार मंडल अध्यक्ष
व्यापार मंडल व्यापारी हितों के साथ-साथ उपभोक्ता हितों का ध्यान रखता है। व्यापार मंडल की सभी बैठकों और सम्मेलनों में व्यापारियों को मुनाफे के लिए जमाखोरी और मिलावटखोरी से बचने के लिए जागरूक किया जाता है। उपभोक्ताओं की संतुष्टि व्यापारी के लिए सबसे महत्वपूर्व होती है।
संजय अग्रवाल, जिलाध्यक्ष व्यापार मंडल (कंछल गुट)
व्यापार मंडल हमेशा चाहता है कि उपभोक्ताओं को उचित दर पर सही सामान मिले। व्यापारी भी एक उपभोक्ता होता है इसलिए उपभोक्ता हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती। व्यापार मंडल मिलावट खोरी या जमाखोरी करने वाले व्यापारी का सामाजिक बहिष्कार भी करता है।
- राकेश मिश्र, जिलाध्यक्ष, व्यापार मंडल(श्याम बिहारी गुट)
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उपभोक्ताओं का शोषण जगह जगह किया जाता है। यदि आप मिठाई की दुकान पर जाते हैं तो मिठाई की कीमत पर ही आपको गत्ते का डिब्बा भी तोल दिया जाता है। यहां तक कि नकली देशी घी, नकली पनीर, मिलावटी कडुवा तेल, मट्ठा, खोवे के नाम पर मशाले की बनी बर्फी, लौंज, मिल्क केक धड़ल्ले से बिक रहा है और उपभोक्ता ठगा जा रहा है। इसी प्रकार मेवा भी पैकिंग के साथ ही तोली जा रही है। सोना, चांदी इस समय बाजार में 65 से 60 और 40 प्रतिशत तक का बिक्री किया जा रहा है, जबकि सरकार द्वारा सोने के आभूषणों की हालमार्क बिक्री किए जाने के निर्देश दिए गए हैं, किंतु मार्केट में हालमार्क सोने की बिक्री के बजाय मिलावटी सोने और चांदी के जेवरों की बिक्री की जा रही है।
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कानूनी दांव पेंच में उलझा उपभोक्ता संरक्षण
उपभोक्ताओं के साथ मनमानी रोकने के लिए दशकों पूर्व बना उपभोक्ता संरक्षण कानून वक्त के साथ ही कानूनी दांव पेंच में फंसता चला गया। शुरुआत में रेडियो और दूरदर्शन के साथ ही मीडिया ने भी इस कानून की जानकारी देते हुए दुकानदार और सेवा प्रदाताओं को सचेत किया कि ग्राहकों के साथ अब मनमानी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। ग्राहक ने अगर सादे कागज पर जिला उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज करा दी तो पेशी और सुनवाई में ही ग्राहकों के साथ मनमानी करने वाले को दिक्कतें शुरू हो जाएंगी। बाद में शिकायतों को दर्ज कराने और सुनवाई की कड़ी प्रक्रिया के बीच शिकायत का निपटारा लंबी कानूनी जंग बन गई सो बिना वकील के फरियाद दाखिल कर सुनवाई करा पाना बिल्कुल असंभव सा हो चुका है।
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कोलगेट सिबाका टूथपेस्ट का फैमिली पैक 200 ग्राम की पैंकिग थी, कंपनी ने बड़ी होशियारी से इसे पहले 190, फिर 180, फिर 175 ग्राम कर दिया, ग्राहक घटती हुई छोटी मात्रा को समझ नहीं पाता है यह तो बानगी भर है इसी तरह वाशिंग पाउडर की हल्दी, गरम मसालों की पैंकिग से लेकर ट्रेंड चल पड़ा है जिससे ग्राहको को कंपनी के झटके का पता ही नही लगता।
उपभोक्ता फोरम में एक साल से नहीं है पेशकार
उपभोक्ता फोरम से हिमांशु स्वरूप पांडेय और रेखा दीक्षित के सेवानिवृत्त होने के बाद से लंबे समय तक न्यायिक सदस्य की नियुक्ति नहीं हो सकी थी। इसके बाद अब रिटायर्ड जज विंध्याचल प्रसाद श्रीवास्तव, अध्यक्ष और न्यायिक सदस्य सुकाली प्रसाद और विमला रस्तोगी ने कमान संभाली, लेकिन पिछले डेढ़ साल से पेशकार का पद रिक्त है।
खर्चीली और लंबी प्रक्रिया से घटी दिलचस्पी
पूर्व संयुक्त मंत्री और सिविल कोर्ट के अधिवक्ता हिमांशु तिवारी बताते हैं कि पहले सादे प्रार्थना पत्र पर सुनवाई हो जाती थी, अब 100 रुपये से कम की कोर्ट फीस नहीं है, जबकि सिविल कोर्ट में 22.50 रुपये और 37.50 रुपये की कोर्ट फीस पर मुकदमा दाखिल किया जा सकता है। पांच रुपये के तलबाना में तीन पक्षकारों को तलब किया जा सकता है, वहीं उपभोक्ता फोरम में प्रत्येक पक्षकार को तलब करने के लिए रजिस्ट्री वह भी एक्नालेजमेंट वाली लगानी पड़ती है। इस तरह खर्च के हिसाब से उपभोक्ता फोरम महंगा पड़ रहा है।
बहुतायत में लंबित हैं बीमा विवाद के मुकदमे
जिला उपभोक्ता फ ोरम में सबसे ज्यादा मामले बीमा विवाद से जुडे़ हैं, जिनमें सामान्य बीमा करने वाली सरकारी कंपनियों और निजी बीमा कंपनियों के मामले हैं, जहां पालिसी धारक की मृत्यु, एक्सीडेंट अथवा चोरी आगजनी के तयशुदा करार के बावजूद क्लेम देने में लापरवाही बरते जाने के विवाद प्रमुख है।
केस-1
कोर्ट कचेहरी के बिना नहीं मिलती क्षतिपूर्ति
गोला गोकर्णनाथ। मोहल्ला कुम्हारनटोला निवासी व्यापारी अशोक गट्टानी का पंजीकरण व्यापार कर विभाग में था। 17 सितंबर 2013 में सड़क दुर्घटना में उनकी मौत हो गई, लेकिन विभागीय बीमे की राशि चार लाख रुपये नहीं दी गई। उनकी पत्नी मधु गट्टानी बताती है कि घटना के दो माह में ही व्यापार कर विभाग में आवश्यक प्रपत्रों के साथ बीमा राशि का दावा पेश किया, किंतु उन्हें अब तक बीमा की राशि प्रदान नहीं की गई। तब उन्होंने उपभोक्ता संरक्षण फोरम लखीमपुर में बीमा राशि, ब्याज और क्षतिपूर्ति का परिवाद प्रस्तुत किया।
केस-2
मुआवजे के चक्कर में खर्च हुए 16 साल
धौरहरा तहसील के ग्राम बम्हौरी निवासी सुभाष चंद्र ने स्थानीय वाईडी कॉलेज से बीएड उत्तीर्ण किया था, मगर मार्कशीट में गलत सब्जेक्ट अंकित हो गए उसे दुरुस्त कराने के लिए जब उसकी शिकायतें अनसुनी कर दी गई तो उसने जिला उपभोक्ता संरक्षण फोरम की मदद ली 1998 में दावा दाखिल करने के बाद 2001 में विश्वविद्यालय की त्रुटि पाते हुए मुआवजा के आदेश दिए गए इसके बाद विश्वविद्यालय ने राज्य फोरम में अपील दाखिल कर दी गई वहां से विश्वविद्यालय की अपील खारिज होने के बाद फोरम के मुआवजा आदेश को क्रियान्वित करने के लिए अर्जी फिर जिला फोरम पहुंची है जो कई सालों बाद अभी तक निस्तारित नहीं की जा सकी है।
क्या कहते हैं व्यापार मंडल अध्यक्ष
व्यापार मंडल व्यापारी हितों के साथ-साथ उपभोक्ता हितों का ध्यान रखता है। व्यापार मंडल की सभी बैठकों और सम्मेलनों में व्यापारियों को मुनाफे के लिए जमाखोरी और मिलावटखोरी से बचने के लिए जागरूक किया जाता है। उपभोक्ताओं की संतुष्टि व्यापारी के लिए सबसे महत्वपूर्व होती है।
संजय अग्रवाल, जिलाध्यक्ष व्यापार मंडल (कंछल गुट)
व्यापार मंडल हमेशा चाहता है कि उपभोक्ताओं को उचित दर पर सही सामान मिले। व्यापारी भी एक उपभोक्ता होता है इसलिए उपभोक्ता हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती। व्यापार मंडल मिलावट खोरी या जमाखोरी करने वाले व्यापारी का सामाजिक बहिष्कार भी करता है।
- राकेश मिश्र, जिलाध्यक्ष, व्यापार मंडल(श्याम बिहारी गुट)