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यहां जच्चा-बच्चा को नसीब होते हैं गंदे बिस्तर
लखीमपुर खीरी
Updated Thu, 06 Aug 2015 07:10 PM IST
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जिला महिला अस्पताल में अव्यवस्थाएं हावी हैं। यहां तीमारदारों के बैठने के लिए न तो पर्याप्त व्यवस्था है और न ही अस्पताल के पंखे इस भीषण गर्मी में मरीजों और तीमारदारों को राहत दे पा रहे हैं। व्यवस्थाओं पर नजर डालें तो यहां कदम-कदम पर दिक्कतें हैं। यहां तक कि डॉक्टर और स्टाफ गंदे चादरों वाले बिस्तर पर मरीजों को लिटाने से भी परहेज नहीं करते। हैरानी की बात है कि उन्हें इस बात की चिंता नहीं होती कि मरीज को संक्रमण भी हो सकता है और इससे उसकी जान भी जा सकती है। यहां प्रसव के 11 घंटे बाद आधे-अधूरे इलाज के बाद जच्चा-बच्चा को डिस्चार्ज कर दिया जाता है। दूसरी ओर गर्भवती महिलाएं बाहर से अल्ट्रासाउंड कराने को मजबूर हैं। डीएम किंजल सिंह ने जब जिले का चार्ज संभाला था तो उन्होंने महिला अस्पताल में ताबड़तोड़ निरीक्षण कर व्यवस्था सुधारने के प्रयास किए, लेकिन पिछले काफी दिनों से प्रशासन की नजर यहां की अव्यवस्थाओं की ओर नहीं जा रही है। गुरुवार को अमर उजाला टीम ने जिला महिला अस्पताल का जायजा लिया, जिसमें तमाम अव्यवस्थाएं सामने आईं।
धौरहरा के गांव बेलवा निवासी छोटाली की पत्नी मीना को बुधवार की शाम जिला महिला अस्पताल में प्रसव पीड़ा के कारण भर्ती कराया गया था। रात करीब 11 बजे मीना ने एक नवजात को जन्म दिया। वार्ड में जगह न होने के कारण उसे बरामदे में ही एक बेड दे दिया गया, जिस पर गंदी चादर देखकर मीना ने वार्ड दिलाने की गुहार लगाई, लेकिन नर्स और स्टाफ ने ध्यान नहीं दिया। इस पर उसने साफ चादर ही देने को कहा, लेकिन किसी ने नहीं सुना। चादर देखने से साफ लग रहा था कि इससे संक्रमण हो सकता है। गुरुवार को दिन में पौने 11 बजे रहे थे। लगभग 12 घंटे पहले दुनिया में आया नवजात टकटकी लगाए था। उसे क्या पता कि जिस अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है, वहां उसकी जान जोखिम में है। यही नजारा वार्ड के हर बेड का था। अधिकतर पर जच्चा और बच्चा गंदे बिस्तर पर लेटे थे।
11 घंटे के भीतर प्रसूता डिस्चार्ज
जिला महिला अस्पताल में शाम को आने वाली महिलाओं को प्रसव पीड़ा के चलते भर्ती किया गया। डिलीवरी के बाद उन्हें वार्ड में ले जाया गया और अगले दिन सुबह 11 बजे ही उन्हें डिस्चार्ज स्लिप थमा दी, जबकि नियम ये है कि सामान्य प्रसव होने पर जच्चा-बच्चा को दो दिन तक डॉक्टरों की देखरेख में रखा जाता है।
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गर्मी में मैदान में बैठते हैं मरीज
जिला महिला अस्पताल के वार्डों और तीमारदारों के बैठने के स्थान पर भीषण गर्मी और पंखों से हवा न मिलने से परेशान होकर तीमारदार मैदान में आकर बैठ जाते हैं। यहां बैठे ईसानगर के जुबेर, मोहम्मदी की सुनीता बताती हैं कि जिला महिला अस्पताल में आना है तो पंखा और बिस्तर साथ लाना पड़ेगा।
अल्ट्रासाउंड जांच बाहर से
अस्पताल में अव्यवस्थाओं और डॉक्टरों की मनमानी से मरीजों की जान हर समय मुश्किल में रहती है। नीमगांव के रोशननगर से आई गीता देवी को अल्ट्रासाउंड कराना था, लेकिन उसने देखा कि कक्ष पर ताला लगा है। कई लोगों से पूछा। कुछ पता नहीं चला तो बाहर से अल्ट्रासाउंड कराने चली गईं। इस तरह मरीजों को बाहर से ही अल्ट्रासाउंड कराना पड़ता है।
लापरवाही मिली तो होगी कार्रवाई
अस्पताल में जच्चा-बच्चा के इलाज में लापरवाही या गंदे बिस्तर की जानकारी नहीं है। फिलहाल वह खुद निरीक्षण कर सफाई व्यवस्था का पूरा ध्यान देती हैं, फिर भी ऐसा है तो लापरवाही करने वाले पर कार्रवाई की जाएगी।
-डॉ. मीरा वर्मा, सीएमएस
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धौरहरा के गांव बेलवा निवासी छोटाली की पत्नी मीना को बुधवार की शाम जिला महिला अस्पताल में प्रसव पीड़ा के कारण भर्ती कराया गया था। रात करीब 11 बजे मीना ने एक नवजात को जन्म दिया। वार्ड में जगह न होने के कारण उसे बरामदे में ही एक बेड दे दिया गया, जिस पर गंदी चादर देखकर मीना ने वार्ड दिलाने की गुहार लगाई, लेकिन नर्स और स्टाफ ने ध्यान नहीं दिया। इस पर उसने साफ चादर ही देने को कहा, लेकिन किसी ने नहीं सुना। चादर देखने से साफ लग रहा था कि इससे संक्रमण हो सकता है। गुरुवार को दिन में पौने 11 बजे रहे थे। लगभग 12 घंटे पहले दुनिया में आया नवजात टकटकी लगाए था। उसे क्या पता कि जिस अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है, वहां उसकी जान जोखिम में है। यही नजारा वार्ड के हर बेड का था। अधिकतर पर जच्चा और बच्चा गंदे बिस्तर पर लेटे थे।
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11 घंटे के भीतर प्रसूता डिस्चार्ज
जिला महिला अस्पताल में शाम को आने वाली महिलाओं को प्रसव पीड़ा के चलते भर्ती किया गया। डिलीवरी के बाद उन्हें वार्ड में ले जाया गया और अगले दिन सुबह 11 बजे ही उन्हें डिस्चार्ज स्लिप थमा दी, जबकि नियम ये है कि सामान्य प्रसव होने पर जच्चा-बच्चा को दो दिन तक डॉक्टरों की देखरेख में रखा जाता है।
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गर्मी में मैदान में बैठते हैं मरीज
जिला महिला अस्पताल के वार्डों और तीमारदारों के बैठने के स्थान पर भीषण गर्मी और पंखों से हवा न मिलने से परेशान होकर तीमारदार मैदान में आकर बैठ जाते हैं। यहां बैठे ईसानगर के जुबेर, मोहम्मदी की सुनीता बताती हैं कि जिला महिला अस्पताल में आना है तो पंखा और बिस्तर साथ लाना पड़ेगा।
अल्ट्रासाउंड जांच बाहर से
अस्पताल में अव्यवस्थाओं और डॉक्टरों की मनमानी से मरीजों की जान हर समय मुश्किल में रहती है। नीमगांव के रोशननगर से आई गीता देवी को अल्ट्रासाउंड कराना था, लेकिन उसने देखा कि कक्ष पर ताला लगा है। कई लोगों से पूछा। कुछ पता नहीं चला तो बाहर से अल्ट्रासाउंड कराने चली गईं। इस तरह मरीजों को बाहर से ही अल्ट्रासाउंड कराना पड़ता है।
लापरवाही मिली तो होगी कार्रवाई
अस्पताल में जच्चा-बच्चा के इलाज में लापरवाही या गंदे बिस्तर की जानकारी नहीं है। फिलहाल वह खुद निरीक्षण कर सफाई व्यवस्था का पूरा ध्यान देती हैं, फिर भी ऐसा है तो लापरवाही करने वाले पर कार्रवाई की जाएगी।
-डॉ. मीरा वर्मा, सीएमएस