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Lakhimpur Kheri News: सांसत में नवजातों की सांस... एसएनसीयू यूनिट में सीपेप मशीन ही नहीं
Fri, 26 Sep 2025 12:39 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
Updated Fri, 26 Sep 2025 12:39 AM IST
सार
लखीमपुर खीरी के जिला महिला अस्पताल में समय से पहले जन्मे शिशुओं की देखभाल के लिए जरूरी सीपेप मशीन नहीं है। इस कारण नवजातों को लखनऊ रेफर करना पड़ता है, जिससे उनकी जान जोखिम में रहती है।
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जिला महिला अस्पताल में बनी एसएनसीयू यूनिट। संवाद
विस्तार
लखीमपुर खीरी। जिला महिला अस्पताल में समय से पहले जन्मे और कम वजन वाले नवजातों की जान सांसत में है। यहां बनीं स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू) में शिशुओं को जीवनदान देने वाली इस यूनिट में सीपेप (कंटिन्युअस पॉजिटिव एयरवे प्रेशर) मशीन ही नहीं है।
स्थिति यह है कि कई नवजातों को जरूरी समय पर इलाज नहीं मिल पाता। उन्हें लखनऊ रेफर कर दिया जाता है। ऐसे में उनकी जान सांसत में पड़ जाती है। 50 बेड की क्षमता वाले जिला महिला अस्पताल में प्रतिदिन करीब 25-30 प्रसव होते हैं। हर माह की बात करें तो इनमें से तकरीबन 15-20 नवजातों को सांस लेने में मदद के लिए एसएनसीयू वार्ड में सीपेप की जरूरत पड़ती है।
12 बेड का बना एसएनसीयू वार्ड पर पहले से ही क्षमता से अधिक भार है। वहीं, सीपेप मशीन नहीं होने से डॉक्टरों को बच्चों को लखनऊ रेफर करना पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सीपेप की कमी से नवजात को अस्पताल से बाहर निकालने में भी खतरा बना रहता है। पहले से ही कमजोर बच्चों को लखनऊ या अन्य अस्पताल भेजने पर संक्रमण व मौसम सहित दूरी जैसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इससे न केवल इलाज जटिल हो जाता है, बल्कि शिशु की मृत्यु दर भी बढ़ने की आशंका बनी रहती है।
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एसएनसीयू में सीपेप की कमी को लेकर उच्चाधिकारियों को अवगत कराया जा चुका है। मशीनें मिलते ही लोगों का राहत मिलेगी।
डॉ. अमित कुमार गुप्ता, सीएमएस
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स्थिति यह है कि कई नवजातों को जरूरी समय पर इलाज नहीं मिल पाता। उन्हें लखनऊ रेफर कर दिया जाता है। ऐसे में उनकी जान सांसत में पड़ जाती है। 50 बेड की क्षमता वाले जिला महिला अस्पताल में प्रतिदिन करीब 25-30 प्रसव होते हैं। हर माह की बात करें तो इनमें से तकरीबन 15-20 नवजातों को सांस लेने में मदद के लिए एसएनसीयू वार्ड में सीपेप की जरूरत पड़ती है।
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12 बेड का बना एसएनसीयू वार्ड पर पहले से ही क्षमता से अधिक भार है। वहीं, सीपेप मशीन नहीं होने से डॉक्टरों को बच्चों को लखनऊ रेफर करना पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सीपेप की कमी से नवजात को अस्पताल से बाहर निकालने में भी खतरा बना रहता है। पहले से ही कमजोर बच्चों को लखनऊ या अन्य अस्पताल भेजने पर संक्रमण व मौसम सहित दूरी जैसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इससे न केवल इलाज जटिल हो जाता है, बल्कि शिशु की मृत्यु दर भी बढ़ने की आशंका बनी रहती है।
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एसएनसीयू में सीपेप की कमी को लेकर उच्चाधिकारियों को अवगत कराया जा चुका है। मशीनें मिलते ही लोगों का राहत मिलेगी।
डॉ. अमित कुमार गुप्ता, सीएमएस