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न घर है न ठिकाना, मुझे चलते जाना है.... बस चलते जाना

Sun, 01 May 2016 12:20 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखीमपुर खीरी
ब्यूरो/अमर उजाला, लखीमपुर खीरी Updated Sun, 01 May 2016 12:20 AM IST
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 Neither house nor home , I have to go .... just go marching
श्रम‌िक ‌द‌िवस - फोटो : अमर उजाला
मजदूर दिवस पर विशेष....
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न घर है न ठिकाना, मुझे चलते जाना है.... बस चलते जाना
- पति की मौत के बाद फुटपाथ पर परिवार
- आवास और खाद्य सुरक्षा कानून का नहीं मिला लाभ
- मासूम बच्चे भीख मांगकर बुझा रहे पेट की आग
- निघासन के गांव बनवारीपुर का रहने वाला है परिवार

आजादी के बाद से बेसहारा और गरीब परिवारों के लिए सरकारें काम करने का दावा करती हैं, क्योंकि उनके जीवन स्तर को उठाने के लिए आरक्षण, आवास योजना से लेकर खाद्य सुरक्षा अधिनियम तक लागू किया जा चुका है। इसके बावजूद जमीनी हकीकत में खास बदलाव नहीं आया है। सरकार के दावों को आइना दिखाने के लिए एक गरीब परिवार के हालात काफी हैं। पति की मौत के बाद से बेसहारा हुआ परिवार दर-दर की ठोकरें खा रहा है।
शहर के विलोबी मेमोरियल हाल के सामने अंबेडकर पार्क के बाहर फुटपाथ पर एक मां अपने तीन मासूम बच्चों के साथ खुले आसमान के नीचे रह रही है। बच्चे भीख मांगकर अपना और मां के पेट की आग शांत कर रहे हैं। 
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निघासन क्षेत्र के गांव बनवारीपुुर निवासी मुल्लू पासी की पत्नी कन्या कुमारी की कहानी कुछ ऐसी ही है, जिसे सुनकर सरकार की योजनाएं और दावे खोखले नजर आएंगे। दबे-कुचले निर्बल वर्ग के लिए काम के नाम पर सरकार से मोटी रकम ऐंठने वाले एनजीओ भी सवालों के कटघरे में हैं। करीब डेढ़ माह से शहर के फुटपाथ पर गुजर-बसर कर रही कन्या कुमारी और उसके तीन मासूम बच्चे गरीबी और भूख से पैदा हुई लाचारी का जीता-जागता सुबूत हैं। इन्हें सरकार की योजनाओं का लाभ नहीं मिला और न ही राशन कार्ड है, जिससे परिवार को दो वक्त की रोटी नसीब हो सके। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम लागू कर सरकार भले ही अपनी पीठ थपथपाती नहीं थकती, लेकिन यह परिवार भूख से बेहाल है। फुटपाथ पर गुजर बसर कर रहे परिवार के पास गृहस्थी के नाम पर एक कंबल, चादर, एक थाली और एक प्लास्टिक का डिब्बा है। कन्या कुमारी ने बताया कि पति की मौत के बाद तीन बच्चों की परवरिश का जिम्मा उस पर आ गया, लेकिन मजदूरी के दौरान वह चोटिल हो गई। इसके बाद से वह मजदूरी करने में लाचार हो गई। बच्चों की उम्र तीन साल से लेकर आठ साल तक है। संपत्ति के नाम पर गांव में जो झोपड़ी थी, वह भी दूसरे की जमीन पर थी। लिहाजा पति की मौत के बाद उसे वह भी छोड़नी पड़ गई। तब वह गांव छोड़कर शहर में आ गई। एक बेटी और एक बेटा शहर में घूमकर भीख मांगते हैं, जिससे चार सदस्यों के परिवार पेट की आग शांत करता है। बकौल कन्या कुमारी उसे कहीं से कोई मदद नहीं मिली और न ही सरकारी योजनाओं का लाभ मिल पाया।अमर उजाला ब्यूरो
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लखीमपुर खीरी। आजादी के बाद से बेसहारा और गरीब परिवारों के लिए सरकारें काम करने का दावा करती हैं, क्योंकि उनके जीवन स्तर को उठाने के लिए आरक्षण, आवास योजना से लेकर खाद्य सुरक्षा अधिनियम तक लागू किया जा चुका है। इसके बावजूद जमीनी हकीकत में खास बदलाव नहीं आया है। सरकार के दावों को आइना दिखाने के लिए एक गरीब परिवार के हालात काफी हैं। पति की मौत के बाद से बेसहारा हुआ परिवार दर-दर की ठोकरें खा रहा है।
शहर के विलोबी मेमोरियल हाल के सामने अंबेडकर पार्क के बाहर फुटपाथ पर एक मां अपने तीन मासूम बच्चों के साथ खुले आसमान के नीचे रह रही है। बच्चे भीख मांगकर अपना और मां के पेट की आग शांत कर रहे हैं। 

निघासन क्षेत्र के गांव बनवारीपुुर निवासी मुल्लू पासी की पत्नी कन्या कुमारी की कहानी कुछ ऐसी ही है, जिसे सुनकर सरकार की योजनाएं और दावे खोखले नजर आएंगे। दबे-कुचले निर्बल वर्ग के लिए काम के नाम पर सरकार से मोटी रकम ऐंठने वाले एनजीओ भी सवालों के कटघरे में हैं। करीब डेढ़ माह से शहर के फुटपाथ पर गुजर-बसर कर रही कन्या कुमारी और उसके तीन मासूम बच्चे गरीबी और भूख से पैदा हुई लाचारी का जीता-जागता सुबूत हैं। इन्हें सरकार की योजनाओं का लाभ नहीं मिला और न ही राशन कार्ड है, जिससे परिवार को दो वक्त की रोटी नसीब हो सके। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम लागू कर सरकार भले ही अपनी पीठ थपथपाती नहीं थकती, लेकिन यह परिवार भूख से बेहाल है। फुटपाथ पर गुजर बसर कर रहे परिवार के पास गृहस्थी के नाम पर एक कंबल, चादर, एक थाली और एक प्लास्टिक का डिब्बा है। कन्या कुमारी ने बताया कि पति की मौत के बाद तीन बच्चों की परवरिश का जिम्मा उस पर आ गया, लेकिन मजदूरी के दौरान वह चोटिल हो गई। इसके बाद से वह मजदूरी करने में लाचार हो गई। बच्चों की उम्र तीन साल से लेकर आठ साल तक है। संपत्ति के नाम पर गांव में जो झोपड़ी थी, वह भी दूसरे की जमीन पर थी। लिहाजा पति की मौत के बाद उसे वह भी छोड़नी पड़ गई। तब वह गांव छोड़कर शहर में आ गई। एक बेटी और एक बेटा शहर में घूमकर भीख मांगते हैं, जिससे चार सदस्यों के परिवार पेट की आग शांत करता है। बकौल कन्या कुमारी उसे कहीं से कोई मदद नहीं मिली और न ही सरकारी योजनाओं का लाभ मिल पाया।
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