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‘नवरात्र व्रत से मिलता है धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष’
अमर उजाला ब्यूरो गोला गोकर्णनाथ।
Updated Wed, 21 Sep 2016 11:22 PM IST
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दुर्गा
- फोटो : अमर उजाला
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कंजा देवस्थान पर श्रीमद् देवीभागवत कथा का चौथा दिन
कंजा देवस्थान ब्रह्मदेव आश्रम में मप्र के भानपुरा मठ के दंडी स्वामी ज्ञानानंद तीर्थ ने श्रीमद्देवी भागवत पुराण कथा पारायण के चौथे दिन कहा कि प्रत्येक मनुष्य को नवरात्र व्रत रखकर देवी माता का पूजन अर्चन अवश्य करना चाहिए। इस व्रत के रखने से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
स्वामी विश्वात्मानंद सरस्वती सत्संग भवन में उन्होंने बताया कि परीक्षित पुत्र महाराजा जनमेजय ने नवरात्र व्रत रखा था। जिससे उन्हें सर्व फल की प्राप्ति हुई थी। नवरात्र वर्ष में चार बार चैत्र, आषाढ, अश्वनि और माघ मास में होते हैं। इस व्रत में शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए हुए अट्ठारह भुजाओं वाली माता की मूर्ति की प्रतिष्ठा करनी चाहिए। प्रतिमा के अभाव में यंत्र, पूजा कर नर्वाण मंत्र से जप करना चाहिए। आचार्य से पूजन की गुप्त विधि जानकर आसन बिछाकर पार्श्व भाग में कलश स्थापना की जाती है। पीपल, बरगद, गूलर, आम, पाकड़ पांच पत्रों के साथ रोग शमन के लिए नीमपत्र भी पूजन में रखा जाता है। वेदमंत्रों के विधान से माता का आवाहन कर नित्य पूजन करना चाहिए।
कथा व्यास ने बताया कि कलश में रखा जल सूखना नहीं चाहिए, हमेशा जल भरते रहना चाहिए। कलश का जल सूखने से साधक की मनोकामना पूर्ण नहीं होती है। मंगल की प्राप्ति के लिए शंख ध्वनि कर मंगल गीत गाकर नृत्य करना चाहिए, महिलाओं को शंख बजाने के लिए निषेधित किया गया है क्योंकि मां दुर्गा को शंखध्वनि करने के बाद युद्ध करना पड़ा था। व्रत के नियम में अन्न त्यागकर ही वेदपाठ करना चाहिए। व्रती को फल और दुग्ध का सेवन करना चाहिए। यदि व्रती उपवास न कर सके तो पाठ करने के उपरान्त एक प्रकार का अन्न ग्रहण करना चाहिए। यदि पाठ अकेले न कर कर सके तो किसी सहायक से करवाकर स्वयं सुनना चाहिए।
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स्वामी जी ने कहा कि पूजन में चंदन, अगर, कपूर, फूल और इत्र के साथ सभी प्रकार के फल माता को अर्पित करना चाहिए। पूजन के समय घी का दीपक जलाएं, अभाव में तिल के तेल का दीपक जलाना चाहिए। गुग्गुल की धूप से माता अत्यंत प्रसन्न होती हैं। कहा कि व्रती को नौ कन्याओं का पूजन करना चाहिए। पूजन में दो वर्ष से लेकर 10 वर्ष तक की कन्याओं का पूजन करें। एक वर्ष की कन्या का पूजन और भोग निषेधित किया गया है। दो वर्ष की कन्या को कुमारी, तीन वर्ष की कन्या को त्रिमूर्ति, पांच वर्ष की रोहिणी, छह वर्ष की कालिका, सात वर्ष की चंडिका, आठ वर्ष की शांभवी, नौ वर्ष की दुर्गा और 10 वर्ष की कन्या को सुभद्रा कहा गया है।
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कंजा देवस्थान ब्रह्मदेव आश्रम में मप्र के भानपुरा मठ के दंडी स्वामी ज्ञानानंद तीर्थ ने श्रीमद्देवी भागवत पुराण कथा पारायण के चौथे दिन कहा कि प्रत्येक मनुष्य को नवरात्र व्रत रखकर देवी माता का पूजन अर्चन अवश्य करना चाहिए। इस व्रत के रखने से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
स्वामी विश्वात्मानंद सरस्वती सत्संग भवन में उन्होंने बताया कि परीक्षित पुत्र महाराजा जनमेजय ने नवरात्र व्रत रखा था। जिससे उन्हें सर्व फल की प्राप्ति हुई थी। नवरात्र वर्ष में चार बार चैत्र, आषाढ, अश्वनि और माघ मास में होते हैं। इस व्रत में शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए हुए अट्ठारह भुजाओं वाली माता की मूर्ति की प्रतिष्ठा करनी चाहिए। प्रतिमा के अभाव में यंत्र, पूजा कर नर्वाण मंत्र से जप करना चाहिए। आचार्य से पूजन की गुप्त विधि जानकर आसन बिछाकर पार्श्व भाग में कलश स्थापना की जाती है। पीपल, बरगद, गूलर, आम, पाकड़ पांच पत्रों के साथ रोग शमन के लिए नीमपत्र भी पूजन में रखा जाता है। वेदमंत्रों के विधान से माता का आवाहन कर नित्य पूजन करना चाहिए।
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कथा व्यास ने बताया कि कलश में रखा जल सूखना नहीं चाहिए, हमेशा जल भरते रहना चाहिए। कलश का जल सूखने से साधक की मनोकामना पूर्ण नहीं होती है। मंगल की प्राप्ति के लिए शंख ध्वनि कर मंगल गीत गाकर नृत्य करना चाहिए, महिलाओं को शंख बजाने के लिए निषेधित किया गया है क्योंकि मां दुर्गा को शंखध्वनि करने के बाद युद्ध करना पड़ा था। व्रत के नियम में अन्न त्यागकर ही वेदपाठ करना चाहिए। व्रती को फल और दुग्ध का सेवन करना चाहिए। यदि व्रती उपवास न कर सके तो पाठ करने के उपरान्त एक प्रकार का अन्न ग्रहण करना चाहिए। यदि पाठ अकेले न कर कर सके तो किसी सहायक से करवाकर स्वयं सुनना चाहिए।
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स्वामी जी ने कहा कि पूजन में चंदन, अगर, कपूर, फूल और इत्र के साथ सभी प्रकार के फल माता को अर्पित करना चाहिए। पूजन के समय घी का दीपक जलाएं, अभाव में तिल के तेल का दीपक जलाना चाहिए। गुग्गुल की धूप से माता अत्यंत प्रसन्न होती हैं। कहा कि व्रती को नौ कन्याओं का पूजन करना चाहिए। पूजन में दो वर्ष से लेकर 10 वर्ष तक की कन्याओं का पूजन करें। एक वर्ष की कन्या का पूजन और भोग निषेधित किया गया है। दो वर्ष की कन्या को कुमारी, तीन वर्ष की कन्या को त्रिमूर्ति, पांच वर्ष की रोहिणी, छह वर्ष की कालिका, सात वर्ष की चंडिका, आठ वर्ष की शांभवी, नौ वर्ष की दुर्गा और 10 वर्ष की कन्या को सुभद्रा कहा गया है।