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मदर्स डेः मुश्किलों को मात देकर मां ने संवार दिया जीवन

Sun, 08 May 2022 11:23 PM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sun, 08 May 2022 11:23 PM IST
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Mother's Day: Mother gave life to life by defeating difficulties
बांकेगंज। प्रदेश के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संजय गोयल को बुलंदियों तक पहुंचाने में उनकी मां का योगदान सबसे ज्यादा है। कस्बा निवासी उद्यमी गोविंद राम गोयल चाहते थे कि उनके दोनों बेटे भी उनके व्यापार और उद्योग को आगे बढ़ाएं लेकिन संजय की मां सुशीला देवी चाहती थीं कम से कम उनका एक बेटा प्रशासनिक अधिकारी बने। संजय बताते हैं कि वह आज जो कुछ भी हैं, अपनी मां की बदौलत हैं।
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गोला के सेंटजांस स्कूल से हाई स्कूल तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद संजय गोयल को पढ़ने के लिए उनकी मां ने पिलानी के बिड़ला विद्या मंदिर भेजा। इसके बाद दिल्ली यूनीवर्सिटी के करोड़ीमल कॉलेज से स्नातक की डिग्री हासिल की और साथ में पीसीएस परीक्षा की तैयारी करते रहे। उन्होंने वर्ष 2002 में पीसीएस की परीक्षा पास की और संपूर्णानगर के अलावा पलिया चीनी मिल में एक्साइज इंस्पेक्टर (आसवनी) बने।
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लेकिन उनकी मां सुशीला देवी को इससे संतोष नहीं हुआ और लगातार संजय को आईएएस की परीक्षा पास करने के लिए प्रेरित करती रहीं। इस दौरान संजय के अध्ययन में कोई व्यवधान न पैदा हो, इसलिए सुशीला देवी संजय के साथ ही दिल्ली में रहीं। मां की प्रेरणा, सहयोग और आशीर्वाद के साथ-साथ संजय की मेहनत रंग लाई और उन्होंने वर्ष 2004 में आईएएस की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली।
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कई साल तक असम के कई जिलों में डीएम और विभिन्न प्रशासनिक पदों पर रहने के बाद प्रतिनियुक्ति पर उत्तरप्रदेश आ गए। मौजूदा समय में वह प्रयागराज मंडल के कमिश्नर पद पर कार्यरत हैं। संजय गोयल अपनी सफलता का पूरा श्रेय अपनी मां को देते हैं। उनका कहना है कि यदि मां इस तरह हौसला न बढ़ातीं और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित न करतीं तो वह शायद इन बुलंदियों को नहीं छू पाते।
मां की प्रेरणा ने दी नई उड़ान... छू लिया नया आसमान
लखीमपुर खीरी। संघर्षों में पले बढ़े जिले के खमरिया कस्बा निवासी दिलीप गुप्ता ने मां की प्रेरणा से अपने दम पर अपना बड़ा मुकाम बनाया है। आज वह नोएडा में मल्टीनेशनल आईटी कंपनी चला रहे हैं, जिसका मोबाइल एप बनाने का कई देशों में कारोबार है और कंपनी को कई अवार्ड समेत प्रतिष्ठित बिजनेस अखबारों की भी कवरेज मिली है।
अपनी इस सफलता का श्रेय मां को देते हुए दिलीप गुप्ता बताते हैं कि आज स्थिति ठीक है लेकिन 2002 में जब हाईस्कूल के बाद इंजीनियर बनने का सपना लिए वह लखनऊ गए थे तो वह बड़े संघर्षों का दौर था। इंजीनियरिंग की कोचिंग से लेकर बीटेक की फीस तक के लिये मां और भाई ने पाई पाई जोड़कर फीस भरी थी।
दिलीप बताते हैं कि जब वह सात महीने के थे तभी सड़क हादसे में उनके पिता बलभद्र किशोर की मौत हो गई थी और मां कुंती देवी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। तीन भाइयों और दो बहनों में वह सबसे छोटे थे। जैसे जैसे वह बड़े होते गए मां के संघर्षों को देख मजबूत होते गए और कुछ बड़ा करने का इरादा लिए पढ़ाई में जुट गए। वह बताते हैं कि पांच भाई बहनों को मां ने भीषण संघर्ष झेलते हुए पाला पोसा।
आज से 10 साल पहले 10 हजार रुपया मासिक की नौकरी करने वाले दिलीप गुप्ता ने शुरुआती दो साल नौकरी के बाद दोस्तों के साथ मिलकर मोबाइल एप बनाने की कंपनी बनाई थी। कंपनी ने प्रगति की और अब वह इस क्षेत्र में कामयाब हैं। उन्होंने बताया कि मां की प्रेरणा से ही उन्होंने अपने पिता के नाम पर एक फाउंडेशन भी बनाया है, जो समय समय पर जरूरतमंद लोगों की मदद करता है।

उन्होंने बताया कि मां ने सिर्फ एक ही संस्कार दिया है कि किसी की मजबूरी का फायदा न उठाओ और मुश्किल में पड़े व्यक्ति की मदद करो। इसी संस्कार को लेकर वह जिंदगी में आगे बढ़ रहे हैं और सफल हो रहे हैं। आज वह जो कुछ भी हैं, सब मां का दिया हुआ है। उन्होंने कहा कि तीन दशकों तक दुख और संघर्ष झेलकर आज सभी लोग सेटल हैं। मां कुंती देवी भी मौजूदा ग्राम प्रधान हैं।
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