मुश्किल में मासूम की जान: बार-बार पुकारती है मां, जवाब नहीं दे रही माही; तांत्रिक की बर्बरता की हुई है शिकार
लखीमपुर जिले में तांत्रिक महिला की करतूत से एक मासूम बच्ची मरणासन्न अवस्था में पहुंच गई है।पुलिसकर्मियों ने चंदा जुटाकर पीड़ित परिवार की मदद की थी, लेकिन वो सारी रकम उसके इलाज में खर्च हो गए। अब उसका इलाज कराने के लिए परिजनों के पास रुपये नहीं बचे हैं।
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लखीमपुर में महिला तांत्रिक की पिटाई से मरणासन्न हुई रमियाबेहड़ क्षेत्र के ग्राम मिझरिया निवासी संदीप राज की तीन साल की बेटी माही जिंदगी और मौत के बीच झूल रही है। इलाज कराने के लिए परिजनों के पास रुपये नहीं हैं। मां बार-बार बच्ची को पुकारती है, लेकिन माही जवाब नहीं दे रही है।
जिला अस्पताल से रेफर होने के बाद कुछ सिपाहियों ने परिजनों की मदद की, लेकिन वह राशि दो दिनों में ही समाप्त हो गई। चिकित्सकों के अनुसार, बच्ची के दिमाग में पानी भर गया है, जिसके ऑपरेशन में लाखों रुपये लगेंगे। खर्चा सुन माही के पिता उसे घर वापस ले आए हैं।
कुछ दिन पहले बुखार के इलाज के नाम पर एक महिला तांत्रिक ने परिजनों से 1500 रुपये वसूलकर माही को प्रताड़ित किया था। माही के सिर पर तीन शैतानों का साया बताकर तांत्रिक ने उसे बेतहाशा थप्पड़ मारे। सुलगते कंडे से उसकी दोनों हथेलियां जला दीं। उसे कई बार तख्त पर उठाकर पटका। परिजनों ने गंभीर हालत में उसे जिला अस्पताल में भर्ती कराया, चिकित्सकों ने लखनऊ रेफर कर दिया था।
पुलिसकर्मियों ने चंदा कर की थी मदद
माही का हाल देख रमियाबेहड़ के एसआई वीरेंद्र सिंह ने साथी पुलिसकर्मियों से चंदा एकत्र किया और खुद के वाहन से दीवान रामू सिंह के साथ बीमार बच्ची को लखनऊ में भर्ती कराकर इलाज शुरू कराया। चंदे की धनराशि महज जांच और जरूरी दवाओं में खर्च हो गई। जांच के बाद माही के दिमाग में पानी भरा होने की बात सामने आई।
ऑपरेशन के लिए मोटी रकम खर्च की बात सुनकर पिता के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह उसे बीमारी की हालत में वापस घर ले आए। पिता संदीप ने बताया कि जितनी जमापूंजी थी, बेटी के इलाज में लगा दी है। ऑपरेशन का खर्च उठा पाना संभव नहीं है।
सामाजिक संगठन बढ़ाएं हाथ तो बच जाए जान
जिले में तमाम सामाजिक संगठन हैं जो मदद करने का दावा करते हैं, लेकिन माही की मदद के लिए एक भी सामाजिक संगठन ने पहल नहीं की है। सामाजिक संगठन पहल करें, तो शायद दर्द से तड़प रही माही का ऑपरेशन हो जाए। सामाजिक संगठनों की अनभिज्ञता लोगों में चर्चा का विषय बनी हुई है।