{"_id":"5f4aa0ec8ebc3e3cdc1685cc","slug":"migrant-labor-lakhimpur-news-bly4179482188","type":"story","status":"publish","title_hn":"60 हजार प्रवासी श्रमिकों में आधे से ज्यादा को काम नहीं मिला तो लौट गए","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
60 हजार प्रवासी श्रमिकों में आधे से ज्यादा को काम नहीं मिला तो लौट गए
विज्ञापन
मनरेगा के तहत काम करते मजदूर। संवाद
- फोटो : LAKHIMPUR
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
लखीमपुर खीरी। लॉकडाउन के दौरान दूसरे राज्यों से प्रवासी श्रमिकों के आने का सिलसिला सभी को याद है, लेकिन उनके जाने का पता ही नहीं चला। दूसरे राज्यों और शहरों में काम करने वाले करीब 60 हजार प्रवासी श्रमिक अपने घरों को लौटे थे, जिन्हें लाने और उनके घर तक पहुंचाने के भारी बंदोबस्त भी हुए थे। अनलॉक होने के बाद काम न मिलने से परेशान करीब 60 फीसदी प्रवासी श्रमिक वापस अपने पुराने काम पर जा चुके हैं। वापस जाने वाले प्रवासियों में ज्यादातर कुशल और अर्धकुशल श्रमिक थे, जिन्हें जनपद में रोजगार नहीं मिल पा रहा था।
प्रवासियों को रोजगार दिलाने के लिए तब प्रदेश सरकार ने जिला रोजगार समिति का गठन भी किया, लेकिन 11,469 प्रवासियों को ही अब तक रोजगार दिया जा सका है। इनमें ज्यादातर 10,369 प्रवासियों को मनरेगा से फावड़े से खुदाई और पटाई का कार्य मिला। शेष 1100 श्रमिकों को भी पीडब्ल्यूडी, जिला पंचायत राज के निर्माण कार्यों में मजदूरी का काम मिल पाया। गरीब तबके के प्रवासी श्रमिक लॉकडाउन के दौरान हुई परेशानियों का दर्द अभी नहीं भूले हैं, जिससे वे लोग अपने गांव में ही दिहाड़ी मजदूरी करके जीवन-यापन कर रहे हैं। बारिश सीजन के चलते मनरेगा में भी कभी-कभी काम बंद करना पड़ता है। हालांकि मनरेगा से गरीब तबके के प्रवासी श्रमिकों को सबसे ज्यादा रोजगार भी मिल पाया है। लॉकडाउन से (21 अप्रैल 2020 से) अब तक मनरेगा से 62.13 लाख मानव दिवस सृजित किए जा चुके हैं। उपायुक्त श्रम रोजगार राजनाथ प्रसाद भगत ने बताया कि 10, 369 प्रवासी श्रमिकों को मनरेगा से काम दिलाया जा चुका है। जबकि कुल 62.13 लाख श्रम दिवसों के सापेक्ष सभी श्रमिकों को एक अरब 24 करोड़ 53 लाख रुपये मजदूरी का भुगतान किया जा चुका है।
फैक्ट्रियों में काम करने वाले श्रमिकों को नहीं मिल पाया काम
जिला रोजगार समिति के माध्यम से प्रवासियों को काम दिलाने के प्रयास हुए, लेकिन दिल्ली, मुंबई आदि बड़े शहरों की फैक्ट्रियों में काम करने वाले कुशल और अर्धकुशल प्रवासी श्रमिकों के लिए काम उपलब्ध नहीं करा सकी। ज्यादातर रोजगार उन्हीं को मिला जो अकुशल श्रमिक थे, जिन्होंने मनरेगा आदि में काम किया।
विज्ञापन
प्रवासी मजदूरों ने बयां किया दर्द
संसारपुर निवासी प्रदीप कुमार लॉकडाउन के दौरान मई माह में महेंद्रगढ़ ( हरियाणा) से लौटकर घर आए थे। तब जिला प्रशासन की ओर से दो किलो चना, एक लीटर तेल, पांच किलो आलू, 10 किलो आटा, 10 किलो चावल, दाल और मसाले मिले थे। मनरेगा में कोई काम नहीं मिल पाया। बोले-दिहाड़ी मजदूरी करते हैं किसी दिन काम मिल जाता है तो किसी दिन खाली बैठना पड़ता है।
कारोबारियों का दर्द
संसारपुर निवासी छोटे भार्गव भी महेंद्रगढ़ ( हरियाणा) से मई माह में आए थे। तभी जिला प्रशासन से एक राशन किट मिली थी। राशन कार्ड नहीं बना है, लेकिन बताते हैं कि प्रधान की मदद से राशन मिल जाता है। दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। रोज काम नहीं मिल पाता है।
बांकेगंज से सटे महराजनगर गांव निवासी सर्वेश ने बताया कि होली के दौरान रोजगार के लिए हरियाणा के बहादुरगढ़ गए थे, जहां एक चप्पल की फैक्टरी में मजदूरी कर कमाई कर रहे थे। मार्च में कोरोना संक्रमण के चलते पूरे देश में लॉकडाउन के बाद वह जैसे तैसे गांव वापस पहुंचे। यहां काम मिलने के इंतजार में पांच माह बीत गए, लेकिन रोजगार न मिलने से परिवार के सामने रोजी-रोजी का संकट है।
महराजनगर गांव निवासी ऊषा देवी ने बताया कि होली से पहले वह अपने पति और दो बच्चों के साथ हरियाणा के बहादुरगढ़ की एक फैक्टरी में काम करने गईं थी। मार्च महीने में लॉकडाउन के बाद फैक्टरी बंद होने से बेरोजगार हो गए। इसके बाद सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर किसी तरह गांव पहुंचे। घर लौटने के बाद सुकून तो जरूर मिला, लेकिन रोजगार छिन गया। बेरोजगारी ने उनके परिवार की कमर तोड़ दी।
प्रवासी श्रमिकों को मनरेगा, पीडब्ल्यूडी आदि विभागों से रोजगार मिला है। कुशल और अर्धकुशल श्रमिकों को भी रोजगार दिलाने के लिए आवेदन मांगे गए थे, जिसमें करीब 500 लोगों ने आवेदन किए हैं। काफी श्रमिक फैक्ट्रियों में काम करने वापस चले गए हैं।
-रत्नेश चंद्र त्रिपाठी, समन्वयक सदस्य, जिला रोजगार समिति
विज्ञापन
प्रवासियों को रोजगार दिलाने के लिए तब प्रदेश सरकार ने जिला रोजगार समिति का गठन भी किया, लेकिन 11,469 प्रवासियों को ही अब तक रोजगार दिया जा सका है। इनमें ज्यादातर 10,369 प्रवासियों को मनरेगा से फावड़े से खुदाई और पटाई का कार्य मिला। शेष 1100 श्रमिकों को भी पीडब्ल्यूडी, जिला पंचायत राज के निर्माण कार्यों में मजदूरी का काम मिल पाया। गरीब तबके के प्रवासी श्रमिक लॉकडाउन के दौरान हुई परेशानियों का दर्द अभी नहीं भूले हैं, जिससे वे लोग अपने गांव में ही दिहाड़ी मजदूरी करके जीवन-यापन कर रहे हैं। बारिश सीजन के चलते मनरेगा में भी कभी-कभी काम बंद करना पड़ता है। हालांकि मनरेगा से गरीब तबके के प्रवासी श्रमिकों को सबसे ज्यादा रोजगार भी मिल पाया है। लॉकडाउन से (21 अप्रैल 2020 से) अब तक मनरेगा से 62.13 लाख मानव दिवस सृजित किए जा चुके हैं। उपायुक्त श्रम रोजगार राजनाथ प्रसाद भगत ने बताया कि 10, 369 प्रवासी श्रमिकों को मनरेगा से काम दिलाया जा चुका है। जबकि कुल 62.13 लाख श्रम दिवसों के सापेक्ष सभी श्रमिकों को एक अरब 24 करोड़ 53 लाख रुपये मजदूरी का भुगतान किया जा चुका है।
विज्ञापन
फैक्ट्रियों में काम करने वाले श्रमिकों को नहीं मिल पाया काम
जिला रोजगार समिति के माध्यम से प्रवासियों को काम दिलाने के प्रयास हुए, लेकिन दिल्ली, मुंबई आदि बड़े शहरों की फैक्ट्रियों में काम करने वाले कुशल और अर्धकुशल प्रवासी श्रमिकों के लिए काम उपलब्ध नहीं करा सकी। ज्यादातर रोजगार उन्हीं को मिला जो अकुशल श्रमिक थे, जिन्होंने मनरेगा आदि में काम किया।
विज्ञापन
प्रवासी मजदूरों ने बयां किया दर्द
संसारपुर निवासी प्रदीप कुमार लॉकडाउन के दौरान मई माह में महेंद्रगढ़ ( हरियाणा) से लौटकर घर आए थे। तब जिला प्रशासन की ओर से दो किलो चना, एक लीटर तेल, पांच किलो आलू, 10 किलो आटा, 10 किलो चावल, दाल और मसाले मिले थे। मनरेगा में कोई काम नहीं मिल पाया। बोले-दिहाड़ी मजदूरी करते हैं किसी दिन काम मिल जाता है तो किसी दिन खाली बैठना पड़ता है।
कारोबारियों का दर्द
संसारपुर निवासी छोटे भार्गव भी महेंद्रगढ़ ( हरियाणा) से मई माह में आए थे। तभी जिला प्रशासन से एक राशन किट मिली थी। राशन कार्ड नहीं बना है, लेकिन बताते हैं कि प्रधान की मदद से राशन मिल जाता है। दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। रोज काम नहीं मिल पाता है।
बांकेगंज से सटे महराजनगर गांव निवासी सर्वेश ने बताया कि होली के दौरान रोजगार के लिए हरियाणा के बहादुरगढ़ गए थे, जहां एक चप्पल की फैक्टरी में मजदूरी कर कमाई कर रहे थे। मार्च में कोरोना संक्रमण के चलते पूरे देश में लॉकडाउन के बाद वह जैसे तैसे गांव वापस पहुंचे। यहां काम मिलने के इंतजार में पांच माह बीत गए, लेकिन रोजगार न मिलने से परिवार के सामने रोजी-रोजी का संकट है।
महराजनगर गांव निवासी ऊषा देवी ने बताया कि होली से पहले वह अपने पति और दो बच्चों के साथ हरियाणा के बहादुरगढ़ की एक फैक्टरी में काम करने गईं थी। मार्च महीने में लॉकडाउन के बाद फैक्टरी बंद होने से बेरोजगार हो गए। इसके बाद सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर किसी तरह गांव पहुंचे। घर लौटने के बाद सुकून तो जरूर मिला, लेकिन रोजगार छिन गया। बेरोजगारी ने उनके परिवार की कमर तोड़ दी।
प्रवासी श्रमिकों को मनरेगा, पीडब्ल्यूडी आदि विभागों से रोजगार मिला है। कुशल और अर्धकुशल श्रमिकों को भी रोजगार दिलाने के लिए आवेदन मांगे गए थे, जिसमें करीब 500 लोगों ने आवेदन किए हैं। काफी श्रमिक फैक्ट्रियों में काम करने वापस चले गए हैं।
-रत्नेश चंद्र त्रिपाठी, समन्वयक सदस्य, जिला रोजगार समिति