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महाशिवरात्रि आज, शिवमय हुआ जिला
लखीमपुर खीरी
Updated Mon, 16 Feb 2015 06:54 PM IST
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जिले में महाशिवरात्रि को लेकर खासा उत्साह है। तराई का यह क्षेत्र आदिकाल से ही शिव उपासना का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां प्राचीन शिव मंदिर बड़ी संख्या में हैं। महाशिवरात्रि के लिए इन मंदिरों को भव्यता के साथ सजाया गया है। महाशिवरात्रि पर यहां रुद्र महायज्ञ, रुद्र महाभिषेक और विशेष पूजा की तैयारी की गई है। इन मंदिरों में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के जुटने की संभावना है। दूर-दूर से आए कांवड़ियों के गोला आने का सिलसिला कई दिनों से जारी है।
जिले में कई ऐसे प्राचीन मंदिर हैं जिनका ताल्लुक रामायण और महाभारत काल से है। गोलागोकर्णनाथ का शिव मंदिर रामायण काल का माना जाता है तो लिलौटीनाथ मंदिर और मोहम्मदी के निकट स्थित टेढ़ेनाथ मंदिर के अलावा देवकली का शिव मंदिर महाभारत काल का माना जाता है। ओयल का मेंढक मंदिर और सिंगाही का भूलभुलैया मंदिर अपनी अद्भुत स्थापत्य कला के लिए जाना जाता है।
गोला का प्राचीन शिव मंदिर
छोटी काशी के नाम से विख्यात गोला गोकर्णनाथ के मंदिर में स्थापित प्राचीन शिवलिंग लंका के राजा रावण द्वारा स्थापित बताया जाता है। गाय के आकार का शिवलिंग होने के कारण इसका नाम गोकर्णनाथ पड़ा। यहां दूर-दूर से कांवड़िये पवित्र नदियों का जल लेकर प्राचीन और दिव्य शिवलिंग पर अर्पित करने के लिए आते हैं।
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ओयल का मेंढक मंदिर
जिले के ओयल कस्बा स्थित मंडूक तंत्र और श्रीयंत्र पर बना शिव मंदिर मेंढक मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र है। मंदिर का निर्माण करीब डेढ़ सौ साल पहले तत्कालीन ओयल के राजा बख्त सिंह और उनके उत्तराधिकारी अनिरुद्ध सिंह ने कराया था। यह मंदिर अपनी अनोखी स्थापत्य कला के लिए पूरे भारत में जाना जाता है।
लिलौटीनाथ मंदिर
जिला मुख्यालय से करीब नौ किलोमीटर दूर निघासन रोड पर स्थित प्राचीन लिलौटीनाथ मंदिर है। किवदंती है कि मंदिर में स्थापित शिवलिंग की स्थापना द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वथामा ने की थी। सुबह मंदिर का कपाट खुलने पर यह पूजित मिलता है। लोगों का कहना है कि शिवलिंग दिन में पांच बार अपना रंग बदलता है। यह मंदिर कई जिले के लोगों के लिए गहन आस्था का केंद्र है।
भूमि फोड़कर प्रकट हुए थे भुइफोरवानाथ
शहर के मेला मैदान स्थित प्राचीन शिव मंदिर में स्थापित शिवलिंग के बारे में कहा जाता है कि यह शिवलिंग भूमि फोड़ कर प्रकट हुआ था इसीलिए इस प्राचीन शिवलिंग का नाम भुइफोरवानाथ पड़ा। इसी के नाम से मोहल्ले का नाम भी भुइफोरवानाथ पड़ा है। मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए महाशिवरात्रि और सावन के महीने में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। यहां महारुद्राभिषेक भी होगा।
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जिले में कई ऐसे प्राचीन मंदिर हैं जिनका ताल्लुक रामायण और महाभारत काल से है। गोलागोकर्णनाथ का शिव मंदिर रामायण काल का माना जाता है तो लिलौटीनाथ मंदिर और मोहम्मदी के निकट स्थित टेढ़ेनाथ मंदिर के अलावा देवकली का शिव मंदिर महाभारत काल का माना जाता है। ओयल का मेंढक मंदिर और सिंगाही का भूलभुलैया मंदिर अपनी अद्भुत स्थापत्य कला के लिए जाना जाता है।
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गोला का प्राचीन शिव मंदिर
छोटी काशी के नाम से विख्यात गोला गोकर्णनाथ के मंदिर में स्थापित प्राचीन शिवलिंग लंका के राजा रावण द्वारा स्थापित बताया जाता है। गाय के आकार का शिवलिंग होने के कारण इसका नाम गोकर्णनाथ पड़ा। यहां दूर-दूर से कांवड़िये पवित्र नदियों का जल लेकर प्राचीन और दिव्य शिवलिंग पर अर्पित करने के लिए आते हैं।
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ओयल का मेंढक मंदिर
जिले के ओयल कस्बा स्थित मंडूक तंत्र और श्रीयंत्र पर बना शिव मंदिर मेंढक मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र है। मंदिर का निर्माण करीब डेढ़ सौ साल पहले तत्कालीन ओयल के राजा बख्त सिंह और उनके उत्तराधिकारी अनिरुद्ध सिंह ने कराया था। यह मंदिर अपनी अनोखी स्थापत्य कला के लिए पूरे भारत में जाना जाता है।
लिलौटीनाथ मंदिर
जिला मुख्यालय से करीब नौ किलोमीटर दूर निघासन रोड पर स्थित प्राचीन लिलौटीनाथ मंदिर है। किवदंती है कि मंदिर में स्थापित शिवलिंग की स्थापना द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वथामा ने की थी। सुबह मंदिर का कपाट खुलने पर यह पूजित मिलता है। लोगों का कहना है कि शिवलिंग दिन में पांच बार अपना रंग बदलता है। यह मंदिर कई जिले के लोगों के लिए गहन आस्था का केंद्र है।
भूमि फोड़कर प्रकट हुए थे भुइफोरवानाथ
शहर के मेला मैदान स्थित प्राचीन शिव मंदिर में स्थापित शिवलिंग के बारे में कहा जाता है कि यह शिवलिंग भूमि फोड़ कर प्रकट हुआ था इसीलिए इस प्राचीन शिवलिंग का नाम भुइफोरवानाथ पड़ा। इसी के नाम से मोहल्ले का नाम भी भुइफोरवानाथ पड़ा है। मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए महाशिवरात्रि और सावन के महीने में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। यहां महारुद्राभिषेक भी होगा।