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महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन का खादी आज भी कर रही प्रतिनिधित्व

Sat, 02 Oct 2021 12:56 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sat, 02 Oct 2021 12:56 AM IST
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Khadi is still representing the Swadeshi movement of Mahatma Gandhi
लखीमपुर का खादी आश्रम।

फैशन के अनुरूप ढालकर खादी ने बढ़ाई अपनी स्वीकार्यता
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महिलाओं में भी खादी की साड़ियों का क्रेज बढ़ा

लखीमपुर खीरी। महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन का खादी आज भी प्रतिनिधित्व कर रही है। समय के साथ तेजी से बदलते फैशन में खादी ने खुद को ढाल कर अपनी स्वीकार्यता बढ़ाई है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में खादी का क्रेज बढ़ा है, इसकी मांग बढ़ी है। सबसे बड़ी बात यह है कि खादी ग्राम स्वराज के सपने को आज भी साकार कर रही है।
लखीमपुर में खादी भंडार के इंचार्ज सीआर वर्मा बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में खादी की मांग बढ़ी है। इसका कारण यह है कि खादी के कपड़े हर मौसम में आरामदेय रहते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि बदलते फैशन के साथ खादी ने अपने को बदला है। फैशन की मांग के अनुसार खादी कपड़ों का निर्माण हो रहा है। महिलाओं में भी खादी की साड़ियों का क्रेज बढ़ा है। आज खादी की पार्टी बियर साड़ियां महंगी होने के बावजूद हाथों-हाथ बिक रही हैं। पुरुषों के लिए कुर्ता, पायजामा से लेकर शर्टिंग की हर रेंज खादी भंडारों में उपलब्ध हैं।
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आज भी कई गांवों में चल रहे चरखे, बन रही खादी

खादी का सस्ते से सस्ता और महंगे से महंगा कपड़ा हाथों से ही बन रहा है। खादी का निर्माण मशीनों से नहीं होता। इससे गांव के लोगों को रोजगार मिल रहा है। खीरी जिले के ओयल कस्बे में एनएमसी चरखा लगा था, लेकिन कुछ दिन पहले वह बंद हो गया। खीरी में खादी का निर्माण नहीं हो रहा है, लेकिन सीतापुर और हरदोई के गांवों में न केवल सूत कातने के चरखे चल रहे हैं, बल्कि कपड़ा बुनाई भी हो रही है। इससे गांव के लोगों को रोजगार मिल रहा है। सीतापुर के जिला कारागार में भी एनएमसी चरखा लगाया गया था, हालांकि अब वह बंद हो चुका है लेकिन महमूदाबाद और पंचमपुर गांव में चरखे अब भी चालू हैं।
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ग्राम स्वराज के सपने को साकार कर रहा गांधी आश्रम

खादी निर्माण और ग्रामीण कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने में खादी और ग्रामोद्योग विभाग मदद कर रहा है। इसी विभाग के सहयोग से कई गांवों में जड़ी बूटियों से आयुर्वेदिक दवाओं का भी निर्माण हो रहा है। जिनकी बिक्री गांधी आश्रम के जरिए खादी भंडारों में हो रही है। अचार मुरब्बा, आयुर्वेदिक दवाएं, पाचक मेथी गैस वांण, शहद, शैंपू, डाई आदि कई गांवों में बनाकर पैकिंग की जा रही है। इससे गांव के लोगों को रोजगार मिल रहा है और वे आत्मनिर्भर हो रहे हैं। गांव के लोगों के पास रोजगार हो और वे आत्मनिर्भर बनें यही गांधीजी का सपना था।
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