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अमर्यादित टिप्पणियां आहत करती हैं बुजुर्ग मतदाताओं का मन
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हरिश्चंद्र
- फोटो : LAKHIMPUR
गोला गोकर्णनाथ। आजादी के 75 वर्षों में बहुत कुछ बदल गया है। राजनीतिक माहौल में बड़ा बदलाव आया है। बुजुर्ग मतदाताओं को अपना गुजरा जमाना याद आता है। उन्हें अपने समय का गुलामी का दौर भी याद है और आजादी के बाद मिले लोकतंत्र की अहमियत भी। आज के दौर की राजनीति के माहौल में छिड़ी जुबानी जंग को देखकर उनका मन कचोटता है। आज के समय से जब बुजुर्ग मतदाता अपने दौर की तुलना करते हैं तो कह उठते हैं कि उनके वक्त में लोग बात के धनी थे। गिने-चुने नेता थे। आपस में बैठकर मुद्दे तय होते थे। भोंपू और बैलगाड़ी पर ढोल-मजीरा बजाते गाते चुनाव प्रचार हुआ करता था।
अपनी लड़िकई में खूब सुना करते थे महात्मा गांधी का नाम
अलीगंज रोड इस्लाम नगर कॉलोनी में रहने वाले ब्लाक मितौली के उमरापुर करमानी निवासी 95 वर्षीय हरिश्चंद्र राठौर का कहना है कि उन्होंने गुलामी काल को भी देखा है। इतनी गरीबी और मोहताजी थी। जब सिंचाई कर तहसीलने के लिए कारिंदे आते थे तो लोग घर में घुस जाते थे। अपनी लड़िकई में महात्मा गांधी का नाम खूब सुना करते थे, लेकिन देखा कभी नहीं। गिने-चुने नेता होते थे। याद है कि बचपन में गांव निवासी छोटे लाल मिश्रा को गांव के लोगों ने जबरिया हाथ उठाकर मुखिया चुना था। लोग बात के धनी थे। संभ्रांत लोगों के यहां बैठकर तय होता था कि वोट कहां देना है। वोट की इतनी मारामारी नहीं थी। कुछ वोट डालने जाते थे कुछ नहीं भी जाते थे। आज का समय बहुत बदल गया है। लगता है कि चुनाव नहीं, बल्कि युद्ध लड़ा जा रहा हो। लंबी लड़ाई के बाद आजादी मिली और बदले में लोकतंत्र मिला है। मुझे तो गुलामी का वक्त याद है। भगवान न करे कभी किसी को ऐसे दिन देखने को मिले।
जिस गांव में हो जाती शाम, उसी गांव में करते रात्रि विश्राम
नगर के मोहल्ला लक्ष्मीनगर कॉलोनी में रहने वाले मितौली क्षेत्र के गांव राम खेड़ा के मूल निवासी एवं 1972 में गन्ना सोसायटी के डायरेक्टर रहे 81 वर्षीय रामराखन वाजपेयी का कहना है कि आज की राजनीति में पहले की अपेक्षा बड़ा अंतर आ गया है। न रिश्तों का लिहाज, न संबंधों में मिठास, राजनीति केवल वोट लेने की रह गई है। उन्होंने अपने युवा समय के संस्मरण को याद करते हुए कहा कि राज राजेश्वर शुक्ला जनसंघ और भीखमपुर निवासी माखनलाल मिश्र कांग्रेस से दो बार हैदराबाद के विधायक रहे। माखनलाल मिश्र का बड़े भाई श्रीधर वाजपेयी का काफी साथ रहा। शुरुआती दौर में सोशलिस्ट पार्टी से माखनलाल मिश्र ने अन्ना आंदोलन के साथ राजनीति की शुरुआत की थी। उनका राम खेड़ा स्थित घर पर काफी आना-जाना था। भाभी माखनलाल वाजपेयी की रिश्ते में भतीजी लगती थी। इस लिहाज से वह संबंधों को भी बड़े अच्छी तरीके से निभाते थे। उस समय आज की तरह तामझाम नहीं हुआ करते थे, जिस गांव में शाम हो जाती उसी गांव में रात गुजारते। गांव के संभ्रांत गणमान्य लोगों के साथ चौपाल लगाकर राजनीतिक मुद्दों पर बात होती थी और वही निर्णय होता था कि गांव का वोट किधर जाएगा। पहले के जनप्रतिनिधि बात के धनी होते थे। जो कहते थे उस पर खरा उतरने का प्रयास करते थे। आज की तरह बदले की राजनीति पहले नहीं थी।
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आजकल की राजनीति से कभी-कभी मन आहत हो जाता है
ममरी। बगचन निवासी 75 वर्षीय रिटायर्ड शिक्षक रामसिंह भार्गव बताते हैं कि उन्हें आज भी गुजरा जमाना याद है। पहले चुनाव प्रचार करने के लिए सवारी के साधन नहीं थे। लोकसभा, विधानसभा के चुनाव में प्रत्याशी टोली बनाकर गांव में जाते थे और वहां चौपाल लगाकर वोटरों से राय साझा कर घर-घर जाकर वोट मांगते थे। बच्चों को खुश करने के लिए पर्चे और टॉफियां बांटते थे। उस समय जेब पर लगाने वाले बिल्ले और छोटे-छोटे झंडे हुआ करते थे। समर्थक भोंपू लेकर प्रचार करते थे। वाहन और यातायात के साधन नहीं थे, सड़कें कच्ची हुआ करती थी। प्रचार करने वाली टोलियां बैलगाड़ी पर ढोलक, मजीरा लेकर गाते बजाते हुए प्रचार करते थे। पार्टियों की बजाए उम्मीदवार का व्यक्तित्व मायने रखता था। उम्मीदवार संभ्रांत लोगों के बीच बैठकर चुनावी मुद्दे तय किया करते थे। आज के दौर में पार्टी के बड़े नेताओं और उम्मीदवारों द्वारा एक दसरे पर बदले की नीति के तहत अमर्यादित टिप्पणी से कभी-कभी मन आहत हो जाता है।
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अपनी लड़िकई में खूब सुना करते थे महात्मा गांधी का नाम
अलीगंज रोड इस्लाम नगर कॉलोनी में रहने वाले ब्लाक मितौली के उमरापुर करमानी निवासी 95 वर्षीय हरिश्चंद्र राठौर का कहना है कि उन्होंने गुलामी काल को भी देखा है। इतनी गरीबी और मोहताजी थी। जब सिंचाई कर तहसीलने के लिए कारिंदे आते थे तो लोग घर में घुस जाते थे। अपनी लड़िकई में महात्मा गांधी का नाम खूब सुना करते थे, लेकिन देखा कभी नहीं। गिने-चुने नेता होते थे। याद है कि बचपन में गांव निवासी छोटे लाल मिश्रा को गांव के लोगों ने जबरिया हाथ उठाकर मुखिया चुना था। लोग बात के धनी थे। संभ्रांत लोगों के यहां बैठकर तय होता था कि वोट कहां देना है। वोट की इतनी मारामारी नहीं थी। कुछ वोट डालने जाते थे कुछ नहीं भी जाते थे। आज का समय बहुत बदल गया है। लगता है कि चुनाव नहीं, बल्कि युद्ध लड़ा जा रहा हो। लंबी लड़ाई के बाद आजादी मिली और बदले में लोकतंत्र मिला है। मुझे तो गुलामी का वक्त याद है। भगवान न करे कभी किसी को ऐसे दिन देखने को मिले।
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जिस गांव में हो जाती शाम, उसी गांव में करते रात्रि विश्राम
नगर के मोहल्ला लक्ष्मीनगर कॉलोनी में रहने वाले मितौली क्षेत्र के गांव राम खेड़ा के मूल निवासी एवं 1972 में गन्ना सोसायटी के डायरेक्टर रहे 81 वर्षीय रामराखन वाजपेयी का कहना है कि आज की राजनीति में पहले की अपेक्षा बड़ा अंतर आ गया है। न रिश्तों का लिहाज, न संबंधों में मिठास, राजनीति केवल वोट लेने की रह गई है। उन्होंने अपने युवा समय के संस्मरण को याद करते हुए कहा कि राज राजेश्वर शुक्ला जनसंघ और भीखमपुर निवासी माखनलाल मिश्र कांग्रेस से दो बार हैदराबाद के विधायक रहे। माखनलाल मिश्र का बड़े भाई श्रीधर वाजपेयी का काफी साथ रहा। शुरुआती दौर में सोशलिस्ट पार्टी से माखनलाल मिश्र ने अन्ना आंदोलन के साथ राजनीति की शुरुआत की थी। उनका राम खेड़ा स्थित घर पर काफी आना-जाना था। भाभी माखनलाल वाजपेयी की रिश्ते में भतीजी लगती थी। इस लिहाज से वह संबंधों को भी बड़े अच्छी तरीके से निभाते थे। उस समय आज की तरह तामझाम नहीं हुआ करते थे, जिस गांव में शाम हो जाती उसी गांव में रात गुजारते। गांव के संभ्रांत गणमान्य लोगों के साथ चौपाल लगाकर राजनीतिक मुद्दों पर बात होती थी और वही निर्णय होता था कि गांव का वोट किधर जाएगा। पहले के जनप्रतिनिधि बात के धनी होते थे। जो कहते थे उस पर खरा उतरने का प्रयास करते थे। आज की तरह बदले की राजनीति पहले नहीं थी।
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आजकल की राजनीति से कभी-कभी मन आहत हो जाता है
ममरी। बगचन निवासी 75 वर्षीय रिटायर्ड शिक्षक रामसिंह भार्गव बताते हैं कि उन्हें आज भी गुजरा जमाना याद है। पहले चुनाव प्रचार करने के लिए सवारी के साधन नहीं थे। लोकसभा, विधानसभा के चुनाव में प्रत्याशी टोली बनाकर गांव में जाते थे और वहां चौपाल लगाकर वोटरों से राय साझा कर घर-घर जाकर वोट मांगते थे। बच्चों को खुश करने के लिए पर्चे और टॉफियां बांटते थे। उस समय जेब पर लगाने वाले बिल्ले और छोटे-छोटे झंडे हुआ करते थे। समर्थक भोंपू लेकर प्रचार करते थे। वाहन और यातायात के साधन नहीं थे, सड़कें कच्ची हुआ करती थी। प्रचार करने वाली टोलियां बैलगाड़ी पर ढोलक, मजीरा लेकर गाते बजाते हुए प्रचार करते थे। पार्टियों की बजाए उम्मीदवार का व्यक्तित्व मायने रखता था। उम्मीदवार संभ्रांत लोगों के बीच बैठकर चुनावी मुद्दे तय किया करते थे। आज के दौर में पार्टी के बड़े नेताओं और उम्मीदवारों द्वारा एक दसरे पर बदले की नीति के तहत अमर्यादित टिप्पणी से कभी-कभी मन आहत हो जाता है।

राम सिंह भार्गव- फोटो : LAKHIMPUR

राम राखन बाजपेई- फोटो : LAKHIMPUR