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Lakhimpur Kheri News: नेपाल में जानवरों की पूजा कर मनाते हैं दीपावली का पर्व
Sat, 18 Oct 2025 01:17 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
Updated Sat, 18 Oct 2025 01:17 AM IST
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धनगढ़ी-नेपाल में कुत्ते की पूजा करते लोग। फाइल फोटो
धनगढ़ी (नेपाल)। नेपाल में दीपावली पर्व कुछ अलग ढंग से परंपरानुसार मनाया जाता है। त्योहार पर भगवान की पूजा के साथ ही कौआ, कुत्ता, गाय और बैल की पूजा-अर्चना की जाती है। यह सुख समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
पड़ोसी देश नेपाल में दशहरा (दशई) के बाद दीपावली पर्व सबसे बड़े दूसरे पर्व के रूप में पांच दिनों तक उत्सव के साथ मनाया जाता है। यहां दीपावली को तिहार कहते हैं। तिहार पर घरों को रंग रोगन कर फूल-माला और रंगोली से सजाई जाती है। लोग नए वस्त्र खरीदकर लक्ष्मी पूजा के दिन धारण कर लक्ष्मी की पूजा कर जीवन में धन धान्य की कमी न हो और सुख समृद्धि की कामना करते हैं।
पांच दिनों के पर्व पर पहले दिन कौआ को यमदूत माना गया है इसीलिए छत, आंगन में चावल परिकार डाल कर इसकी पूजा की जाती है। दूसरे दिन कुत्ता की पूजा की जाती है, कुत्ता को स्वर्ग द्वार का संरक्षक माना गया है। फिर गाय को व्यक्ति की समृद्धि का प्रतीक माना गया है जिसे स्नान करा कर फूलों का हार पहना कर पूजा की जाती है साथ ही बैल की भी पूजा की जाती है। चौथे दिन गोवर्धन पर्वत पूजा की जाती है, गोबर से एक प्रकार का पहाड़ बनाते हैं। यह इंद्र के ऊपर भगवान श्रीकृष्ण की जीत का प्रतीक है।
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पड़ोसी देश नेपाल में दशहरा (दशई) के बाद दीपावली पर्व सबसे बड़े दूसरे पर्व के रूप में पांच दिनों तक उत्सव के साथ मनाया जाता है। यहां दीपावली को तिहार कहते हैं। तिहार पर घरों को रंग रोगन कर फूल-माला और रंगोली से सजाई जाती है। लोग नए वस्त्र खरीदकर लक्ष्मी पूजा के दिन धारण कर लक्ष्मी की पूजा कर जीवन में धन धान्य की कमी न हो और सुख समृद्धि की कामना करते हैं।
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पांच दिनों के पर्व पर पहले दिन कौआ को यमदूत माना गया है इसीलिए छत, आंगन में चावल परिकार डाल कर इसकी पूजा की जाती है। दूसरे दिन कुत्ता की पूजा की जाती है, कुत्ता को स्वर्ग द्वार का संरक्षक माना गया है। फिर गाय को व्यक्ति की समृद्धि का प्रतीक माना गया है जिसे स्नान करा कर फूलों का हार पहना कर पूजा की जाती है साथ ही बैल की भी पूजा की जाती है। चौथे दिन गोवर्धन पर्वत पूजा की जाती है, गोबर से एक प्रकार का पहाड़ बनाते हैं। यह इंद्र के ऊपर भगवान श्रीकृष्ण की जीत का प्रतीक है।
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