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हिंदी ही राष्ट्र की आत्मा, इसे हृदय से स्वीकार करें
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गोला गोकर्णनाथ। आजादी की 75वीं वर्षगांठ पर सरकार अमृत महोत्सव मना रही है। इन 75 वर्षों में हमने कई रूढ़िवादी परंपराओं को तोड़ा है। अनावश्यक कानूनों को खत्म किया है। ऐसे में अब एक राष्ट्र और एक भाषा की परंपरा विकसित होनी चाहिए। कहा जाता है कि मातृभाषा किसी भी राष्ट्र की आत्मा होती है। भाषा नागरिकों की पहचान होती है। देश का स्वतंत्रता संग्राम हिंदी की वाणी के साथ लड़ा गया। राष्ट्र का अकूत साहित्यिक और काव्यगत खजाना हिंदी से भरा पड़ा है। सरकार को इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा देना चाहिए है। हिंदी हैं अभियान के तहत की गई बातचीत में यह उद्गार हिंदी प्रेमियों ने व्यक्त किए।
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हिंदी के संवर्धन के लिए हम हिंदी में बोलें एवं लिखें। अपने बच्चों को हिंदी की समृद्धि के लिए पत्र पत्रिकाएं पठन-पाठन को दें। अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी को प्राथमिकता दी जाए। हिंदी कहानियां, नाटक, लेख कविताओं पर समय-समय पर गोष्ठियां आयोजित हों। इसे औपचारिक भाषा न बनाकर राष्ट्रभाषा की तरह गौरव प्रदान करें। ग्रामीण अंचलों एवं शहरों में इसे बोलचाल की आम भाषा के रूप में प्रयोग करें। एक दिन के हिंदी दिवस मनाने से कुछ नहीं होगा। दृढ़ इच्छाशक्ति से ही हम इसे पुन: प्रतिस्थापित करने में सफल होंगे।
-द्वारिका प्रसाद रस्तोगी, कवि एवं प्रांतीय मंत्री, अखिल भारतीय साहित्य परिषद अवध प्रांत (लखनऊ)
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आज संपूर्ण विश्व में हिंदी भाषा को सम्मान प्राप्त हो रहा है लेकिन हमारे देश में हिंदी बोलने वाले को अविकसित माने जाते हैं। यहां हिंदी कि उपेक्षा होती है, जबकि मातृभाषा ही प्रत्येक राष्ट्र की आत्मा होती है। हम भारत वासी यह संकल्प लें कि हम सब हिंदी को राष्ट्र भाषा के रूप में स्वीकार करेंगे और हिंदी में ही कार्य करने के लिए प्रचार प्रसार करेंगे।
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-डॉ वीरेश चंद्र बाजपेई, जिला महामंत्री राजकीय शिक्षक संघ लखीमपुर खीरी
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हिंदी हमारी मातृ भाषा है। यह मात्र एक भाषा ही नहीं है हमारी संस्कृति है। हिंदी को राष्ट्र भाषा घोषित करना चाहिए। जाने कितने क्रांतिकारियों ने कुर्बानी देकर अपने देश को गुलामी की जंजीरों से आजाद कराया। जहां तक शिक्षा की बात है तो यह बहुत बड़ी बिडंबना है कि लोग अपने पाल्य को हिन्दी भाषा से दूर रख रहे हैं। नई पीढ़ी में नैतिक मूल्यों में गिरावट देखी जा रही है और उनके संस्कारों में कमी आ रही है। एक राष्ट्र और एक भाषा की परंपरा देश में विकसित होनी चाहिए।
-आलोक तिवारी कवि एवं अध्यक्ष न्यू चिल्ड्रेंस वेलफेयर सोसायटी
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प्रत्येक राष्ट्र की अपनी राष्ट्रभाषा होती है। परन्तु हमारी बिडंबना यह है कि हिंदुस्तान में ही राष्ट्र भाषा हिंदी नहीं है। अब तो हम गुलाम नहीं हैं, तो हमें हिंदी को राष्ट्र भाषा घोषित कर स्वतंत्रता का परिचय देना चाहिए, जिस प्रकार 325 या 370 को समाप्त कर स्वतंत्रता का परिचय दिया गया। ऐसे में समस्त साहित्यकारों का आह्वान करता हूं कि वे हिंदी को उसका यथोचित सम्मान दिलाने के लिए कार्य करें। हिंदी के विकास से ही देश का विकास संभव है।
-शशिकांत मिश्र ‘शशि’, जिला अध्यक्ष, राष्ट्रीय साहित्यिक संस्था शब्दाक्षर
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हिंदी के संवर्धन के लिए हम हिंदी में बोलें एवं लिखें। अपने बच्चों को हिंदी की समृद्धि के लिए पत्र पत्रिकाएं पठन-पाठन को दें। अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी को प्राथमिकता दी जाए। हिंदी कहानियां, नाटक, लेख कविताओं पर समय-समय पर गोष्ठियां आयोजित हों। इसे औपचारिक भाषा न बनाकर राष्ट्रभाषा की तरह गौरव प्रदान करें। ग्रामीण अंचलों एवं शहरों में इसे बोलचाल की आम भाषा के रूप में प्रयोग करें। एक दिन के हिंदी दिवस मनाने से कुछ नहीं होगा। दृढ़ इच्छाशक्ति से ही हम इसे पुन: प्रतिस्थापित करने में सफल होंगे।
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-द्वारिका प्रसाद रस्तोगी, कवि एवं प्रांतीय मंत्री, अखिल भारतीय साहित्य परिषद अवध प्रांत (लखनऊ)
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आज संपूर्ण विश्व में हिंदी भाषा को सम्मान प्राप्त हो रहा है लेकिन हमारे देश में हिंदी बोलने वाले को अविकसित माने जाते हैं। यहां हिंदी कि उपेक्षा होती है, जबकि मातृभाषा ही प्रत्येक राष्ट्र की आत्मा होती है। हम भारत वासी यह संकल्प लें कि हम सब हिंदी को राष्ट्र भाषा के रूप में स्वीकार करेंगे और हिंदी में ही कार्य करने के लिए प्रचार प्रसार करेंगे।
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-डॉ वीरेश चंद्र बाजपेई, जिला महामंत्री राजकीय शिक्षक संघ लखीमपुर खीरी
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हिंदी हमारी मातृ भाषा है। यह मात्र एक भाषा ही नहीं है हमारी संस्कृति है। हिंदी को राष्ट्र भाषा घोषित करना चाहिए। जाने कितने क्रांतिकारियों ने कुर्बानी देकर अपने देश को गुलामी की जंजीरों से आजाद कराया। जहां तक शिक्षा की बात है तो यह बहुत बड़ी बिडंबना है कि लोग अपने पाल्य को हिन्दी भाषा से दूर रख रहे हैं। नई पीढ़ी में नैतिक मूल्यों में गिरावट देखी जा रही है और उनके संस्कारों में कमी आ रही है। एक राष्ट्र और एक भाषा की परंपरा देश में विकसित होनी चाहिए।
-आलोक तिवारी कवि एवं अध्यक्ष न्यू चिल्ड्रेंस वेलफेयर सोसायटी
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प्रत्येक राष्ट्र की अपनी राष्ट्रभाषा होती है। परन्तु हमारी बिडंबना यह है कि हिंदुस्तान में ही राष्ट्र भाषा हिंदी नहीं है। अब तो हम गुलाम नहीं हैं, तो हमें हिंदी को राष्ट्र भाषा घोषित कर स्वतंत्रता का परिचय देना चाहिए, जिस प्रकार 325 या 370 को समाप्त कर स्वतंत्रता का परिचय दिया गया। ऐसे में समस्त साहित्यकारों का आह्वान करता हूं कि वे हिंदी को उसका यथोचित सम्मान दिलाने के लिए कार्य करें। हिंदी के विकास से ही देश का विकास संभव है।
-शशिकांत मिश्र ‘शशि’, जिला अध्यक्ष, राष्ट्रीय साहित्यिक संस्था शब्दाक्षर