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किताबों से निकलकर मोबाइल की स्क्रीन, कीबोर्ड तक पहुंची हिंदी
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हिंदी हैं हम
- फोटो : अमर उजाला
लखीमपुर खीरी। बोलचाल के अलावा किताबों तक सीमित रहने वाली हिंदी ने अब मोबाइल की स्क्रीन और कीबोर्ड पर अपनी धाक जमा ली है। तकनीकी विकास के साथ हिंदी ने आधुनिक रूप लिया है। यह हिंदी की वैज्ञानिकता और सर्वग्राह्यता का प्रमाण है।
साहित्यकारों का कहना है कि मोबाइल के प्रचलन के साथ अब हिंदी पहले से ज्यादा पढ़ी और लिखी जा रही है। बड़े साहित्यकारों की किताबें अब मोबाइल पर ही उपलब्ध हो जाती हैं। इससे पुस्तकालयों की उपयोगिता तो घटी है लेकिन हिंदी का पठन पाठन बढ़ा है। तकनीकी विकास से हिंदी के विकास की संभावनाएं भी प्रबल हो रही हैं। विचारों के अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम पहले भी हिंदी थी, आज भी है और भविष्य में भी रहेगी। सोशल मीडिया से इसे और बल मिल रहा है।
भगवानदीन आर्यकन्या महाविद्यालय की अवकाश प्राप्त प्राचार्या डॉ. निरुपमा अशोक का कहना है कि विश्व स्तर पर हिंदी को प्रतिष्ठा दिलाने में आधुनिक तकनीक का बड़ा योगदान है। खासकर मोबाइल और सोशल मीडिया के जरिये हिंदी देश के कोनेकोने में पहुंच रही है। विदेशों में बैठे लोग मोबाइल पर ही हिंदी साहित्यकारों की किताबें पढ़ रहे हैं और अपनी टिप्पणियां भी लिख रहे हैं। इससे हिंदी विकास को बल मिल रहा है। मोबाइल के जरिये हिंदी में संवाद सरल हुआ है। लोग अपने विचार लिखकर मोबाइल के जरिए दूसरों तक पहुंचा रहे हैं।
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युवराजदत्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय के हिंदी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. देशराज वर्मा का कहना है कि भारत ने तकनीकी क्षेत्र में काफी उन्नति की है और विश्व में भारत एक प्रमुख बाजार बन चुका है। जो देश भारत के साथ व्यापार करना चाहेंगे उन्हें हिंदी का उचित स्थान देना ही होगा। आज चीन जो मोबाइल और लैपटॉप भारत में बेच रहा है उसमें हिंदी की बोर्ड और हिंदी वर्जन जरूर होता है। विश्व बाजार में भारत के स्थान को हिंदी ने नए आयाम दिए हैं। मोबाइल और सोशल मीडिया के जरिए ही हिंदी विश्व पटल पर छा रही है।
08एलकेएच 23
लघु कथाकार सुरेश सौरभ कहते हैं कोरोना काल में जब सारे विद्यालय पुस्तकालय और कोचिंग आदि सब लॉकडाउन में बंद थे तब मोबाइल की स्क्रीन ही वह वरदान थी जिससे शिक्षा साहित्य व्यापार और रिश्तों की जीवंतता बनी रही। आज देश के प्रसिद्ध कोचिंग सेंटरों में यू ट्यूब चैनलों से विद्यार्थी लाभान्वित हो रहे हैं। मोबाइल के जरिए ही हिंदी वैश्विक भाषा के रूप में उभर कर आई है। यह हिंदी की ताकत ही है कि कार्य, व्यापार की भाषा के रूप में नए रंग रूप में मोबाइल स्क्रीन पर बन संवर रही है।
अवघी सम्राट पं. बंशीधर शुक्ल के पौत्र कवि गौरव शुक्ल का मानना है कि भाषा किसी भी सभ्यता और संस्कृति का सर्वश्रेष्ठ चित्र प्रस्तुुत करती है। आज के तकनीकी युग किताबों को प्रकाशित करवाने और उन्हें पढ़ने की प्रवृत्ति का लोप होता जा रहा है। इसके चलते हिंदी साहित्य किताबों से निकलकर मोबाइल स्क्रीन पर आ गया है। इससे पठन पाठन हिंदी का पठन पाठन तो बढ़ा है लेकिन आभाषी दुनिया को एक सीमा तक अपनाना अच्छा है। कागज की किताबों को पढ़ने में जो आनंद है वह मोबाइल या लैपटॉप पर नहीं।
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साहित्यकारों का कहना है कि मोबाइल के प्रचलन के साथ अब हिंदी पहले से ज्यादा पढ़ी और लिखी जा रही है। बड़े साहित्यकारों की किताबें अब मोबाइल पर ही उपलब्ध हो जाती हैं। इससे पुस्तकालयों की उपयोगिता तो घटी है लेकिन हिंदी का पठन पाठन बढ़ा है। तकनीकी विकास से हिंदी के विकास की संभावनाएं भी प्रबल हो रही हैं। विचारों के अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम पहले भी हिंदी थी, आज भी है और भविष्य में भी रहेगी। सोशल मीडिया से इसे और बल मिल रहा है।
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भगवानदीन आर्यकन्या महाविद्यालय की अवकाश प्राप्त प्राचार्या डॉ. निरुपमा अशोक का कहना है कि विश्व स्तर पर हिंदी को प्रतिष्ठा दिलाने में आधुनिक तकनीक का बड़ा योगदान है। खासकर मोबाइल और सोशल मीडिया के जरिये हिंदी देश के कोनेकोने में पहुंच रही है। विदेशों में बैठे लोग मोबाइल पर ही हिंदी साहित्यकारों की किताबें पढ़ रहे हैं और अपनी टिप्पणियां भी लिख रहे हैं। इससे हिंदी विकास को बल मिल रहा है। मोबाइल के जरिये हिंदी में संवाद सरल हुआ है। लोग अपने विचार लिखकर मोबाइल के जरिए दूसरों तक पहुंचा रहे हैं।
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युवराजदत्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय के हिंदी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. देशराज वर्मा का कहना है कि भारत ने तकनीकी क्षेत्र में काफी उन्नति की है और विश्व में भारत एक प्रमुख बाजार बन चुका है। जो देश भारत के साथ व्यापार करना चाहेंगे उन्हें हिंदी का उचित स्थान देना ही होगा। आज चीन जो मोबाइल और लैपटॉप भारत में बेच रहा है उसमें हिंदी की बोर्ड और हिंदी वर्जन जरूर होता है। विश्व बाजार में भारत के स्थान को हिंदी ने नए आयाम दिए हैं। मोबाइल और सोशल मीडिया के जरिए ही हिंदी विश्व पटल पर छा रही है।
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लघु कथाकार सुरेश सौरभ कहते हैं कोरोना काल में जब सारे विद्यालय पुस्तकालय और कोचिंग आदि सब लॉकडाउन में बंद थे तब मोबाइल की स्क्रीन ही वह वरदान थी जिससे शिक्षा साहित्य व्यापार और रिश्तों की जीवंतता बनी रही। आज देश के प्रसिद्ध कोचिंग सेंटरों में यू ट्यूब चैनलों से विद्यार्थी लाभान्वित हो रहे हैं। मोबाइल के जरिए ही हिंदी वैश्विक भाषा के रूप में उभर कर आई है। यह हिंदी की ताकत ही है कि कार्य, व्यापार की भाषा के रूप में नए रंग रूप में मोबाइल स्क्रीन पर बन संवर रही है।
अवघी सम्राट पं. बंशीधर शुक्ल के पौत्र कवि गौरव शुक्ल का मानना है कि भाषा किसी भी सभ्यता और संस्कृति का सर्वश्रेष्ठ चित्र प्रस्तुुत करती है। आज के तकनीकी युग किताबों को प्रकाशित करवाने और उन्हें पढ़ने की प्रवृत्ति का लोप होता जा रहा है। इसके चलते हिंदी साहित्य किताबों से निकलकर मोबाइल स्क्रीन पर आ गया है। इससे पठन पाठन हिंदी का पठन पाठन तो बढ़ा है लेकिन आभाषी दुनिया को एक सीमा तक अपनाना अच्छा है। कागज की किताबों को पढ़ने में जो आनंद है वह मोबाइल या लैपटॉप पर नहीं।