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अंग्रेज महिला ने शुरू कराई थी लखीमपुर की रामलीला

Thu, 29 Sep 2016 11:35 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/लखीमपुर खीरी।
अमर उजाला ब्यूरो/लखीमपुर खीरी। Updated Thu, 29 Sep 2016 11:35 PM IST
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Enactment has been introduced by Englishwoman Lakhimpur
ramleela - फोटो : amar ujala
- रामलीला हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की है मिसाल
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- एतिहासिक रामलीला मेला एक अक्तूबर से, तैयारियां पूरी

शहर का रामलीला मेला का न केवल एक गौरवशाली इतिहास है, बल्कि यह सांप्रदायिक सौहार्द और हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल भी है। रामलीला के पात्रों के कपड़े सिलने का काम मुन्ने मियां कर रहे हैं तो रावण बनाने का काम बरकत अली के निर्देशन में हो रहा है। एक अक्तूबर से शुरू होने वाले रामलीला मेले की तैयारियां इन दिनों अंतिम चरण पर हैं।
इस साल रामलीला का 152वां वार्षिकोत्सव मनाया जा रहा है। रामलीला कमेटी और सेठ गया प्रसाद ट्रस्ट के सरवराकार विपुल सेठ बताते हैं कि लखीमपुर में रामलीला मेले का शुभारंभ 1864 में हुआ था। इस मेले की शुरुआत कराने का श्रेय एक अंग्रेज महिला को जाता है। तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर मिस्टर बाटले बनारस से तबादला होकर यहां आए थे। उनकी पत्नी ने रामनगर बनारस की रामलीला देखी थी। जो उन्हें बहुत पसंद आई। यहां आकर जब उन्हें पता चला कि यहां तो रामलीला होती ही नहीं तो उन्हें दुख हुआ। 
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कलेक्टर की पत्नी ने यहां रामलीला शुरू कराने का निश्चय किया। उन्होंने शहर के प्रभावशाली लोगों को बुलाकर अपनी इच्छा जाहिर की। साथ ही रामलीला कराने की जिम्मदारी सेठ मथुरा प्रसाद को सौंपी। पहली बार 1984 में यहां रामलीला हुई। तब से अनवरत यह रामलीला होती आ रही है। मथुरा प्रसाद के बाद रामलीला की जिम्मदारी क्रमश: गया प्रसाद सेठ, श्रीराम सेठ, ओंकारनाथ मेहरोत्रा, अजय कुमार मेहरोत्रा उर्फ छुल्लू सेठ, अजय मेहरोत्रा ने संभाली। अब यह दायित्व विपुल सेठ संभाल रहे हैं। यह रामलीला बनारस के रामनगर की तर्ज पर ही होती है। 
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हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल
लखीमपुर की रामलीला हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल है। रामलीला के सभी पात्रों के कपड़े तैयार करने का काम पिछले 65 साल से 75 वर्षीय मुन्ने मियां करते आ रहे हैं। इससे पहले उनके पिता नवाब अली और उससे पहले उनके दादा यह काम करते थे। इसी तरह रावण बनाने का काम इस बार बरकत अली के निर्देशन में हो रहा है। इससे पहले श्रीराम रावण का पुतला बनाया करते थे। कई साल पूरन ने भी रावण का पुतला बनाया।  


मथुरा भवन में 15 दिन रहता है उत्सव का माहौल
रामलीला की सवारियां मथुरा भवन से उठती हैं। तैयारी से लेकर रामलीला की समाप्ति और पात्रों की विदाई तक मथुरा भवन में उत्सव का माहौल रहता है। शाम को यहां धार्मिक नाटकों का आयोजन होता है। गणेश पूजन और ध्वजारोहण से राजतिलक तक कुल 12 दिन रामलीला चलती है। इस दौरान सेठ परिवार की महिलाएं उपवास रखती हैं और रामलीला पात्रों को भोग लगाने के बाद ही फलाहार करती हैं। समापन पर यज्ञ होता है।
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