{"_id":"699602762b09d3620202f419","slug":"dudhwa-home-to-rare-wildlife-gets-biodiversity-protection-cover-lakhimpur-news-c-120-1-lkh1010-168641-2026-02-18","type":"story","status":"publish","title_hn":"Lakhimpur Kheri News: दुर्लभ वन्यजीवों के घर दुधवा की जैव विविधता को मिला संरक्षण कवच","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Lakhimpur Kheri News: दुर्लभ वन्यजीवों के घर दुधवा की जैव विविधता को मिला संरक्षण कवच
Wed, 18 Feb 2026 11:48 PM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
Updated Wed, 18 Feb 2026 11:48 PM IST
विज्ञापन
लखीमपुर खीरी। साल के घने जंगल, दूर-दूर तक फैले घास के मैदान और आर्द्र भूमियों का अनूठा संगम दुधवा टाइगर रिजर्व सिर्फ एक संरक्षित वन क्षेत्र ही नहीं, बल्कि देश की सबसे समृद्ध जैव विविधताओं में से एक है। दुधवा की इसी अनूठी जैव विविधता और दुर्लभ वन्यजीवों के बसेरे को और अधिक संरक्षित करने के उद्देश्य से इसे इको सेंसेटिव जोन घोषित किया गया है।
दुधवा टाइगर रिजर्व का पूरा क्षेत्र करीब 2201.77 वर्ग किलोमीटर में फैला है। इसमें लगभग 1093.79 वर्ग किमी का कोर क्षेत्र और 1107.98 वर्ग किमी का बफर क्षेत्र शामिल है। कोर क्षेत्र में दुधवा राष्ट्रीय उद्यान (490.29 वर्ग किमी), किशनपुर वन्यजीव अभयारण्य (203.41 वर्ग किमी) और कतर्निया घाट वन्यजीव अभयारण्य (400.09 वर्ग किमी) शामिल हैं। इतने विस्तृत क्षेत्र में पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखना तभी संभव है, जब इसके चारों ओर अनियंत्रित गतिविधियों पर अंकुश रहे। इसी कारण इको सेंसटिव जोन के तहत आसपास के क्षेत्रों में प्रदूषण, अंधाधुंध निर्माण और औद्योगिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया गया है। संवाद
-- -सैकड़ों दुर्लभ जीवों का संसार है दुधवा-- --
दुधवा टाइगर रिजर्व क्षेत्र में 850 से अधिक प्रजातियों के फूल वाले पौधे पाए जाते हैं। घासभूमि, साल वन और दलदली क्षेत्र मिलकर ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र बनाते हैं, जहां 46 प्रजातियों के स्तनधारी, 450 प्रजातियों के पक्षी, 35 प्रजातियों के सरीसृप और 80 से अधिक प्रजातियों की मछलियां पाई जाती हैं। दुधवा की इन विशेषताओं का जिक्र इको सेंसटिव जोन घोषित किए जाने की अधिसूचना में भी किया गया है। दुर्लभ बंगाल फ्लोरिकन पक्षी और कुछ सर्पों समेत कई प्रजातियां ऐसी हैं, जिनका अस्तित्व दुधवा में सुरक्षित है।
विज्ञापन
-बाघों का स्वच्छंद विचरण है मुख्य आकर्षण-- -
दुधवा टाइगर रिजर्व वैसे तो बाघों के स्वच्छंद विचरण के लिए पूरे देश में जाना जाता है, पर यहां तेंदुआ, एशियाई हाथी, फिशिंग कैट और हिरणों की पांच प्रजातियां भी पाई जाती हैं। विशेष रूप से तराई का बारहसिंगा दुधवा की पहचान बन चुका है। गैंडों का प्राकृतिक वास भी दुधवा में है, जहां इनके पुनर्वास की दो परियोजनाएं संचालित हैं। कुछ गैंडों को जंगल में स्वच्छंद विचरण के लिए मुक्त भी किया गया है। दुधवा टाइगर रिजर्व के एफडी डॉ. एच. राजामोहन ने बताया कि इको सेंसटिव जोन का मतलब विकास रोकना नहीं, बल्कि उसे पारिस्थितिकी के अनुरूप ढालना है। छोटे स्तर की पारंपरिक गतिविधियां, कृषि और स्थानीय आजीविका जारी रह सकती हैं, लेकिन प्रदूषणकारी और बड़ी औद्योगिक गतिविधियों व निर्माण पर प्रतिबंध रहेगा।
विज्ञापन
दुधवा टाइगर रिजर्व का पूरा क्षेत्र करीब 2201.77 वर्ग किलोमीटर में फैला है। इसमें लगभग 1093.79 वर्ग किमी का कोर क्षेत्र और 1107.98 वर्ग किमी का बफर क्षेत्र शामिल है। कोर क्षेत्र में दुधवा राष्ट्रीय उद्यान (490.29 वर्ग किमी), किशनपुर वन्यजीव अभयारण्य (203.41 वर्ग किमी) और कतर्निया घाट वन्यजीव अभयारण्य (400.09 वर्ग किमी) शामिल हैं। इतने विस्तृत क्षेत्र में पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखना तभी संभव है, जब इसके चारों ओर अनियंत्रित गतिविधियों पर अंकुश रहे। इसी कारण इको सेंसटिव जोन के तहत आसपास के क्षेत्रों में प्रदूषण, अंधाधुंध निर्माण और औद्योगिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया गया है। संवाद
विज्ञापन
दुधवा टाइगर रिजर्व क्षेत्र में 850 से अधिक प्रजातियों के फूल वाले पौधे पाए जाते हैं। घासभूमि, साल वन और दलदली क्षेत्र मिलकर ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र बनाते हैं, जहां 46 प्रजातियों के स्तनधारी, 450 प्रजातियों के पक्षी, 35 प्रजातियों के सरीसृप और 80 से अधिक प्रजातियों की मछलियां पाई जाती हैं। दुधवा की इन विशेषताओं का जिक्र इको सेंसटिव जोन घोषित किए जाने की अधिसूचना में भी किया गया है। दुर्लभ बंगाल फ्लोरिकन पक्षी और कुछ सर्पों समेत कई प्रजातियां ऐसी हैं, जिनका अस्तित्व दुधवा में सुरक्षित है।
विज्ञापन
-बाघों का स्वच्छंद विचरण है मुख्य आकर्षण
दुधवा टाइगर रिजर्व वैसे तो बाघों के स्वच्छंद विचरण के लिए पूरे देश में जाना जाता है, पर यहां तेंदुआ, एशियाई हाथी, फिशिंग कैट और हिरणों की पांच प्रजातियां भी पाई जाती हैं। विशेष रूप से तराई का बारहसिंगा दुधवा की पहचान बन चुका है। गैंडों का प्राकृतिक वास भी दुधवा में है, जहां इनके पुनर्वास की दो परियोजनाएं संचालित हैं। कुछ गैंडों को जंगल में स्वच्छंद विचरण के लिए मुक्त भी किया गया है। दुधवा टाइगर रिजर्व के एफडी डॉ. एच. राजामोहन ने बताया कि इको सेंसटिव जोन का मतलब विकास रोकना नहीं, बल्कि उसे पारिस्थितिकी के अनुरूप ढालना है। छोटे स्तर की पारंपरिक गतिविधियां, कृषि और स्थानीय आजीविका जारी रह सकती हैं, लेकिन प्रदूषणकारी और बड़ी औद्योगिक गतिविधियों व निर्माण पर प्रतिबंध रहेगा।