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जिला महिला अस्पताल आएं तो पंखा साथ लाएं
लखीमपुर खीरी
Updated Sun, 31 May 2015 10:28 PM IST
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डीएम किंजल सिंह ने भले ही महिलाओं की सेहत पर ध्यान देते हुए अस्पतालों की व्यवस्था ठीक करने के प्रयास किए हैं, लेकिन जिले में महिला चिकित्सा की दशा ठीक होने का नाम नहीं ले रही है। जिला महिला अस्पताल में डॉक्टरों की मौजूदगी तो दिखने लगी है, लेकिन तहसील अथवा ब्लाक मुख्यालयों की सीएचसी पर स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है। जिले में सिर्फ मोहम्मदी तहसील में संविदा डॉक्टर अंजना सिंह की तैनाती है। उधर गोला गोकर्णनाथ, पलियाकलां, निघासन, धौरहरा और मितौली में महिला डॉक्टर की तैनाती तक नहीं है, जबकि बिजुआ की सीएचसी में तैनात दो महिला चिकित्सक को जिला मुख्यालय पर अटैच्ड कर रखा गया है। इससे यहां महिला डॉक्टर की तैनाती के बाद भी गर्भवती महिलाओं को समुचित इलाज नहीं हो पा रहा है। जिले में महिला चिकित्सा बेहद लचर है। जिला अस्पताल में पंखे हवा नहीं देते। ऐसे में यहां मरीज को लेकर जाएं तो पंखा साथ लाएं अन्यथा भीषण गर्मी में परेशान हो जाएंगे। प्रस्तुत है जिला महिला अस्पताल में परेशान मरीज और तीमारदारों की व्यथा :
पेड़ों का सहारा लेकर मैदान में बैठे रहते हैं तीमारदार
जिला महिला अस्पताल में बिजली कनेक्शन है और जेनरेटर भी, लेकिन यहां के वार्डों में लगे पंखे इतनी धीमी गति से चलते हैं कि वे हवा नहीं दे पाते। परेशान तीमारदार वार्डों से निकलकर मैदान में पेड़ों की छाया में बैठ जाते है। गांव करनपुर की मीनाक्षी के भर्ती होने पर उनके तीमारदार रामस्वरूप और मालती ने बताया कि यहां पानी नहीं मिलता। डॉक्टर भी समय से देखने नहीं आते। बस, हम लोग भगवान भरोसे पड़े हैं।
बेड मिला नहीं, जमीन पर ही लेट गई गर्भवती
रविवार को फरधान इलाके की गर्भवती को बेड नहीं मिला तो वह ओपीडी के सामने जमीन पर ही लेट गई। अमर उजाला की टीम पहुंची तो उसके बाद स्टाफ ने उसे आनन फानन में लेबर रूम में ले जाकर बेड पर लिटा दिया। उसके साथ ही सुरेश कुमार और कांति ने कहा कि उनकी सुबह से किसी ने नहीं सुनी थी।
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जिला महिला अस्पताल के स्टाफ का हाल
52 बेड के जिला महिला अस्पताल में सीएमएस समेत छह महिला डॉक्टरों की तैनाती है। चूंकि सीएमएस ही एकमात्र सर्जन हैं, इसलिए प्रशासनिक कार्यों की व्यस्तता के कारण अनेक बार ऑपरेशन ज्यादा होने पर काफी दिक्कत होती है और मरीजों को रेफर करना पड़ता है। महिला अस्पताल की ओपीडी में रोजाना तीन से पांच सौ मरीज देखे जाते हैं, जबकि प्रसव के लिए 30 से 50 तक गर्भवती महिलाएं भर्ती होती हैं। ऐसे में यह स्टाफ काफी कम है। हालांकि डीएम के प्रयास से 10 स्टाफ नर्स नई मिल गईं हैं, जिससे इलाज में काफी सुविधा हो रही है।
कहां जाती हैं आयरन की गोलियां
महिलाओं में खून की कमी और हीमोग्लोबिन की कमी पाई गई है, जबकि विभाग द्वारा प्रचुर मात्रा में आयरन की गोलियां गर्भवती महिलाओं को खाने के लिए उपलब्ध कराई जाती हैं। सूत्र बताते हैं कि आशा जिम्मेदारियों को सही तरीके से नहीं निभा रही हैं। महिलाओं को गोलियां नहीं उपलब्ध हो पाती हैं, बल्कि प्राइवेट दुकानों पर या कूड़े के ढ़ेर पर पहुंच जाती हैं। सीएमएस ने भी महिलाओं में बढ़ते एनीमिया के खतरे पर चिंता व्यक्त की है।
अस्पताल पहुंचने में दिक्कत, गरीब बेहाल
ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को दिक्कतों का ज्यादा ही सामना करना पड़ता है। क्योंकि महिला विशेषज्ञ की अनुपस्थिति में ज्यादा ब्लीडिंग होने की स्थिति में प्रसव के दौरान महिला को रेफर कर दिया जाता है। फिर तीमारदार के सामने वाहन को लेकर दिक्कत पैदा हो जाती है, क्योंकि अस्पतालों में एंबुलेंस की सुविधा नहीं है। कई बार देरी होने की स्थित में महिलाओं का प्रसव अस्पताल गेट पर ही हो चुका है। यही वजह है, कई मामले रास्ते में प्रसव के भी सामने आ जाते हैं।
ग्रामीण इलाकों का बुरा हाल
ग्रामीण इलाकों पर नजर डालें तो सीएचसी गोला में महिला डॉक्टर की तैनाती नहीं है। एएनएम और आशा के सहारे ही प्रसव कराए जाते हैं, अगर जरूरत पड़ी तो पुरुष डॉक्टर मदद करता है। यही हाल निघासन, धौरहरा, पलिया और मितौली का है। उधर बिजुआ की सीएचसी में दो महिला डॉक्टरों की तैनाती कर रखी गई है, लेकिन उन्होंने जिला मुख्यालय पर अटैचमेंट करा लिया, जिससे यहां के मरीजों को सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। यही हाल लगभग सभी ब्लाक मुख्यालय की सीएचसी का है।
सीएमएस डॉ. मीरा वर्मा ने बताया कि सीमित संसाधनों के सहारे बेहतर परिणाम देने का प्रयास किया जाता है। चूंकि स्टाफ की काफी कमी है। ऐसे में मरीजों को रेफर करना मजबूरी होती है। फिलहाल डीएम के प्रयास से लगातार सुधार हो रहा है।
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पेड़ों का सहारा लेकर मैदान में बैठे रहते हैं तीमारदार
जिला महिला अस्पताल में बिजली कनेक्शन है और जेनरेटर भी, लेकिन यहां के वार्डों में लगे पंखे इतनी धीमी गति से चलते हैं कि वे हवा नहीं दे पाते। परेशान तीमारदार वार्डों से निकलकर मैदान में पेड़ों की छाया में बैठ जाते है। गांव करनपुर की मीनाक्षी के भर्ती होने पर उनके तीमारदार रामस्वरूप और मालती ने बताया कि यहां पानी नहीं मिलता। डॉक्टर भी समय से देखने नहीं आते। बस, हम लोग भगवान भरोसे पड़े हैं।
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बेड मिला नहीं, जमीन पर ही लेट गई गर्भवती
रविवार को फरधान इलाके की गर्भवती को बेड नहीं मिला तो वह ओपीडी के सामने जमीन पर ही लेट गई। अमर उजाला की टीम पहुंची तो उसके बाद स्टाफ ने उसे आनन फानन में लेबर रूम में ले जाकर बेड पर लिटा दिया। उसके साथ ही सुरेश कुमार और कांति ने कहा कि उनकी सुबह से किसी ने नहीं सुनी थी।
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जिला महिला अस्पताल के स्टाफ का हाल
52 बेड के जिला महिला अस्पताल में सीएमएस समेत छह महिला डॉक्टरों की तैनाती है। चूंकि सीएमएस ही एकमात्र सर्जन हैं, इसलिए प्रशासनिक कार्यों की व्यस्तता के कारण अनेक बार ऑपरेशन ज्यादा होने पर काफी दिक्कत होती है और मरीजों को रेफर करना पड़ता है। महिला अस्पताल की ओपीडी में रोजाना तीन से पांच सौ मरीज देखे जाते हैं, जबकि प्रसव के लिए 30 से 50 तक गर्भवती महिलाएं भर्ती होती हैं। ऐसे में यह स्टाफ काफी कम है। हालांकि डीएम के प्रयास से 10 स्टाफ नर्स नई मिल गईं हैं, जिससे इलाज में काफी सुविधा हो रही है।
कहां जाती हैं आयरन की गोलियां
महिलाओं में खून की कमी और हीमोग्लोबिन की कमी पाई गई है, जबकि विभाग द्वारा प्रचुर मात्रा में आयरन की गोलियां गर्भवती महिलाओं को खाने के लिए उपलब्ध कराई जाती हैं। सूत्र बताते हैं कि आशा जिम्मेदारियों को सही तरीके से नहीं निभा रही हैं। महिलाओं को गोलियां नहीं उपलब्ध हो पाती हैं, बल्कि प्राइवेट दुकानों पर या कूड़े के ढ़ेर पर पहुंच जाती हैं। सीएमएस ने भी महिलाओं में बढ़ते एनीमिया के खतरे पर चिंता व्यक्त की है।
अस्पताल पहुंचने में दिक्कत, गरीब बेहाल
ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को दिक्कतों का ज्यादा ही सामना करना पड़ता है। क्योंकि महिला विशेषज्ञ की अनुपस्थिति में ज्यादा ब्लीडिंग होने की स्थिति में प्रसव के दौरान महिला को रेफर कर दिया जाता है। फिर तीमारदार के सामने वाहन को लेकर दिक्कत पैदा हो जाती है, क्योंकि अस्पतालों में एंबुलेंस की सुविधा नहीं है। कई बार देरी होने की स्थित में महिलाओं का प्रसव अस्पताल गेट पर ही हो चुका है। यही वजह है, कई मामले रास्ते में प्रसव के भी सामने आ जाते हैं।
ग्रामीण इलाकों का बुरा हाल
ग्रामीण इलाकों पर नजर डालें तो सीएचसी गोला में महिला डॉक्टर की तैनाती नहीं है। एएनएम और आशा के सहारे ही प्रसव कराए जाते हैं, अगर जरूरत पड़ी तो पुरुष डॉक्टर मदद करता है। यही हाल निघासन, धौरहरा, पलिया और मितौली का है। उधर बिजुआ की सीएचसी में दो महिला डॉक्टरों की तैनाती कर रखी गई है, लेकिन उन्होंने जिला मुख्यालय पर अटैचमेंट करा लिया, जिससे यहां के मरीजों को सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। यही हाल लगभग सभी ब्लाक मुख्यालय की सीएचसी का है।
सीएमएस डॉ. मीरा वर्मा ने बताया कि सीमित संसाधनों के सहारे बेहतर परिणाम देने का प्रयास किया जाता है। चूंकि स्टाफ की काफी कमी है। ऐसे में मरीजों को रेफर करना मजबूरी होती है। फिलहाल डीएम के प्रयास से लगातार सुधार हो रहा है।