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मनौती पूरी होने पर चढ़ता है झाड़ू और नमक का चढ़ावा
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मोहम्मदी। जिले में महाभारत काल के कई ऐतिहासिक और पौराणिक शिव मंदिर है। ऐसे ही मंदिरों में एक है पालननाथ शिव मंदिर। ऐतिहासिक गांव बढ़खर से करीब पांच किलोमीटर दूर स्थित इस प्राचीन मंदिर का निर्माण महाभारत काल में पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान कराया था। मंदिर की विशेषता यह है कि यहां मनौती पूरी होने पर श्रद्धालु झाड़ू, नमक और बैंगन का चढ़ावा चढ़ाते हैं।
मंदिर का निर्माण छाटी लखौरी ईटों से कराया गया है। मंदिर का जीर्णोद्घार वर्ष 2000 में श्रद्धालुओं ने आपसी सहयोग से मिलकर कराया था। पाल गांव में मंदिर होने के कारण इसका नाम पालननाथ शिव मंदिर पड़ा है। यहां से करीब पांच किमी दूर बड़खर गांव है। कहा जाता है कि बड़खर कभी महाभारत काल के राजा विराट के साम्राज्य का हिस्सा था। पांडवों ने 12 वर्ष के वनवास के बाद यहीं पर एक वर्ष का अज्ञातवास बिताया था। बड़खर गांव और उसके आसपास आज भी ऐसे प्रमाण मिलते हैं, जिससे इसके राजा विराट की नगरी होने की पुष्टि होती है। महाभारत काल के बने मंदिर, तालाब, पोखर और दूर दूर तक फैले खंडहर और टीले यहां आज भी यहां मौजूद है। कहते हैं कि कभी विराटनगर रहे इस नगर का नाम बिगड़कर बड़खर हो गया।
मोहम्मदी बरवर मार्ग पर चार किलोमीटर दूर स्थित यह प्राचीन मंदिर मनौतियां पूरी होने के लिए जाना जाता है। पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान यहां शिवलिंग स्थापित किया और राजा विराट ने भव्य मंदिर का निर्माण कराया। काल के थपेड़ों से मंदिर के जर्जर हो जाने के बाद स्थानीय लोगों ने पालननाथ मंदिर का पुनर्निमाण कराया। यहां एक प्राचीन कुआं आज ही मौजूद है। हालांकि अतिक्रमण के कारण उसका वजूद खत्म हो रहा है।
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मंदिर के पुजारी प्रमोद गिरी बताते हैं कि पहले उनके पिता यहां पूजा अर्चना करते थे। उनके निधन के बाद वह मंदिर की देखरेख और पूजा अर्चना की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। वह कहते हैं मंदिर के गर्भगृह का जीर्णोद्धार वर्ष 2000 में मोहम्मदी के ओमकार पुरी ने कराया था। मान्यता है कि किसी के पशु के बीमार होने पर लोग मंदिर के ताक पर नमक रख जाते हैं। अगले दिन यही नमक बीमार पशु को खिलाने से पशु ठीक हो जाता है। मान्यता है कि यहां मनौती मानने से मस्से भी ठीक हो जाते हैं। मनौती पूरी होने पर यहां नमक, झाड़ू और बैंगन का चढ़ावा चढ़ाने की प्रथा है।
यहां साल की सभी अमावस्या पर भक्तों की भीड़ जुटती है लेकिन सावन के महीने के हर सोमवार को तो मेले जैसा माहौल रहता है। दूर-दूर से आने वाले श्रद्घालु यहां आकर भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं।
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मंदिर का निर्माण छाटी लखौरी ईटों से कराया गया है। मंदिर का जीर्णोद्घार वर्ष 2000 में श्रद्धालुओं ने आपसी सहयोग से मिलकर कराया था। पाल गांव में मंदिर होने के कारण इसका नाम पालननाथ शिव मंदिर पड़ा है। यहां से करीब पांच किमी दूर बड़खर गांव है। कहा जाता है कि बड़खर कभी महाभारत काल के राजा विराट के साम्राज्य का हिस्सा था। पांडवों ने 12 वर्ष के वनवास के बाद यहीं पर एक वर्ष का अज्ञातवास बिताया था। बड़खर गांव और उसके आसपास आज भी ऐसे प्रमाण मिलते हैं, जिससे इसके राजा विराट की नगरी होने की पुष्टि होती है। महाभारत काल के बने मंदिर, तालाब, पोखर और दूर दूर तक फैले खंडहर और टीले यहां आज भी यहां मौजूद है। कहते हैं कि कभी विराटनगर रहे इस नगर का नाम बिगड़कर बड़खर हो गया।
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मोहम्मदी बरवर मार्ग पर चार किलोमीटर दूर स्थित यह प्राचीन मंदिर मनौतियां पूरी होने के लिए जाना जाता है। पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान यहां शिवलिंग स्थापित किया और राजा विराट ने भव्य मंदिर का निर्माण कराया। काल के थपेड़ों से मंदिर के जर्जर हो जाने के बाद स्थानीय लोगों ने पालननाथ मंदिर का पुनर्निमाण कराया। यहां एक प्राचीन कुआं आज ही मौजूद है। हालांकि अतिक्रमण के कारण उसका वजूद खत्म हो रहा है।
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मंदिर के पुजारी प्रमोद गिरी बताते हैं कि पहले उनके पिता यहां पूजा अर्चना करते थे। उनके निधन के बाद वह मंदिर की देखरेख और पूजा अर्चना की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। वह कहते हैं मंदिर के गर्भगृह का जीर्णोद्धार वर्ष 2000 में मोहम्मदी के ओमकार पुरी ने कराया था। मान्यता है कि किसी के पशु के बीमार होने पर लोग मंदिर के ताक पर नमक रख जाते हैं। अगले दिन यही नमक बीमार पशु को खिलाने से पशु ठीक हो जाता है। मान्यता है कि यहां मनौती मानने से मस्से भी ठीक हो जाते हैं। मनौती पूरी होने पर यहां नमक, झाड़ू और बैंगन का चढ़ावा चढ़ाने की प्रथा है।
यहां साल की सभी अमावस्या पर भक्तों की भीड़ जुटती है लेकिन सावन के महीने के हर सोमवार को तो मेले जैसा माहौल रहता है। दूर-दूर से आने वाले श्रद्घालु यहां आकर भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं।