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होली में दानवों के पुतले जलाते हैं थारू
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पलिया-चंदनचौकी (लखीमपुर खीरी)। होली को लेकर थारू क्षेत्र के लोगों में काफी उत्साह रहता है। अन्य स्थानों पर दशहरा पर पुतले जलाए जाते हैं तो यहां होली में दानवों के पुतले जलाने की परंपरा है। मान्यता है कि ऐसा करने से दैवी आपदा नहीं आती तो ऋतु परिवर्तन के कारण संक्रामक रोग भी पैर नहीं पसार पाते। साथ ही फसलें भी सुरक्षित रहती हैं। इस बार भी त्योहार पुतलों के दहन से शुरू होकर थारू नृत्य, फगवा मांगने तथा ठठेरा फोड़ने के बाद संपन्न होगा।
दुधवा टाइगर रिजर्व के करीब तीन दर्जन गांवों में बसे थारू लोगों में होली का खासा महत्व है। आदिवासी इस त्योहार को अपने ढंग से आठ दिनों तक धूमधाम से मनाते हैं। होली मनाने का तरीका भी अलग और अनूठा है। अनूठा इसलिए है कि जनजाति के लोग होलिका दहन करने की बजाय उस स्थान पर घास फूस से बनाए गए विशालकाय दानवों के पुतलों को जलाते हैं। होली के दिन ग्राम के मुखिया दानवों को आग लगाते हैं। थारू क्षेत्र के बुजुर्गों की माने तो यह दानव जलाने वाली परंपरा सदियों पुरानी है। पहले यह त्योहार एक माह तक चलता था लेकिन अब इस त्योहार को आठ दिन तक मनाया जाता है। इसमें थारू नृत्य के साथ फगवा मांगने सहित विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन होता है। जिसमें थारू जनजाति के लोग बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं।
मिट्टी की गोली पिरोकर जलाया जाता है दीया
होली के आठवें दिन ठठेरा फोड़ने के बाद होली का समापन किया जाता है। मिट्टी के घड़े के नीचे टूटे भाग में अनाज के दाने रखकर झाड़ू की सींकों में मिट्टी की गोली पिरोकर दीया जलाया जाता है जिसे ठठेरा कहते हैं। गांव की सीमा के बाहर दक्षिण दिशा में उसे फोड़ा जाता है और युवक-युवतियां टोली बनाकर आसपास के दुकानदारों और राहगीरों से पैसे मांगते हैं। इन एकत्र किए गए पैसों से सामूहिक दावत का आयोजन किया जाता है।
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परंपरागत पोशाकों में होता है नृत्य
होली के मौके पर थारू जांड मदिरा पीने के बाद सिंधरा मछली खाते हैं। अपनी परंपरागत आकर्षक पोशाक में थारू महिलाएं और पुरुष टोली बनाकर ढोलक, मृदंग, झांझ आदि वाद्य यंत्रों पर होली गीत गाकर लोकनृत्य करते हैं। इनके ढोलक बजाने का ढंग और हाथ में मोरपंख या रुमाल लेकर नृत्य करते समय उनकी भाव भंगिमाएं मनोरम एवं रोचक लगती हैं।
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दुधवा टाइगर रिजर्व के करीब तीन दर्जन गांवों में बसे थारू लोगों में होली का खासा महत्व है। आदिवासी इस त्योहार को अपने ढंग से आठ दिनों तक धूमधाम से मनाते हैं। होली मनाने का तरीका भी अलग और अनूठा है। अनूठा इसलिए है कि जनजाति के लोग होलिका दहन करने की बजाय उस स्थान पर घास फूस से बनाए गए विशालकाय दानवों के पुतलों को जलाते हैं। होली के दिन ग्राम के मुखिया दानवों को आग लगाते हैं। थारू क्षेत्र के बुजुर्गों की माने तो यह दानव जलाने वाली परंपरा सदियों पुरानी है। पहले यह त्योहार एक माह तक चलता था लेकिन अब इस त्योहार को आठ दिन तक मनाया जाता है। इसमें थारू नृत्य के साथ फगवा मांगने सहित विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन होता है। जिसमें थारू जनजाति के लोग बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं।
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मिट्टी की गोली पिरोकर जलाया जाता है दीया
होली के आठवें दिन ठठेरा फोड़ने के बाद होली का समापन किया जाता है। मिट्टी के घड़े के नीचे टूटे भाग में अनाज के दाने रखकर झाड़ू की सींकों में मिट्टी की गोली पिरोकर दीया जलाया जाता है जिसे ठठेरा कहते हैं। गांव की सीमा के बाहर दक्षिण दिशा में उसे फोड़ा जाता है और युवक-युवतियां टोली बनाकर आसपास के दुकानदारों और राहगीरों से पैसे मांगते हैं। इन एकत्र किए गए पैसों से सामूहिक दावत का आयोजन किया जाता है।
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परंपरागत पोशाकों में होता है नृत्य
होली के मौके पर थारू जांड मदिरा पीने के बाद सिंधरा मछली खाते हैं। अपनी परंपरागत आकर्षक पोशाक में थारू महिलाएं और पुरुष टोली बनाकर ढोलक, मृदंग, झांझ आदि वाद्य यंत्रों पर होली गीत गाकर लोकनृत्य करते हैं। इनके ढोलक बजाने का ढंग और हाथ में मोरपंख या रुमाल लेकर नृत्य करते समय उनकी भाव भंगिमाएं मनोरम एवं रोचक लगती हैं।