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चार हजार पुलिस मित्र बनवाए, लेकिन मदद किसी से नहीं ले पाए
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लखीमपुर खीरी। पुलिस अफसरों ने बढ़ते क्राइम को कंट्रोल करने के लिए दो साल पहले लखीमपुर में करीब चार हजार पुलिस मित्र बनाए थे। उन्हें परिचय पत्र (आई कार्ड) भी जारी किए गए। थानों पर न तो इनके साथ बैठकें कीं, न ही उनके इलाके के अपराधों पर कोई चर्चा। इसका नतीजा यह है कि पुलिस मित्र चोरी, लूट, रंजिशन घटनाओं को रोकने में भी पुलिस की मदद नहीं कर रहे।
दो साल पहले सूचना तंत्र मजबूत करने के लिए पुलिस ने गांवों में मित्र बनाए थे। यह उसी तर्ज पर थे, जैसे पहले चौकीदार पुलिस को सूचनाएं देते थे। पुलिस की मंशा थी कि इन मित्रों से कहीं भी होने वाली चोरी, लूट, तस्करी समेत अन्य आपराधिक गतिविधियों की जानकारी मिलेगी। जनता से सीधा और बेहतर संवाद बनेगा। छोटी-छोटी बातों को लेकर होने वाले बड़े झगड़े रोकने में मदद मिलेगी। तत्कालीन डीजीपी सुलखान सिंह के आदेश पर लखीमपुर खीरी में भी उस समय 4000 पुलिस मित्र बने थे। प्रत्येक थाने पर इनका एक रजिस्टर भी बनाया गया। उसमें पुलिस मित्रों के नाम-पते और व्यवसाय लिखा रहता था। इनको आई कार्ड भी दिए गए। थाना स्तर पर उस समय पुलिस ने इनके साथ एक-दो बैठकें भी की। इसके परिणाम भी अच्छे मिलने लगे थे। काम का दबाव कहें या लापरवाही, पुलिस ने बाद में इनकी बैठकें करना बंद कर दिया। अफसरों ने भी ध्यान नहीं दिया। न ही बैठकों की समीक्षा की। इससे कम्यूनिटी पुलिसिंग की योजना परवान नहीं चढ़ी। नतीजा, पुलिस मित्रों से सूचनाएं मिलनी बंद हो गईं।
जनता से संवाद के लिए पुलिस मित्रों की मीटिंग जरूरी है। इस बात की समीक्षा की जाएगी कि पुलिस मित्रों की क्या भूमिका है। वैसे शहर और गांव के संभ्रांत नागरिकों की सूची बनी है। इनसे पुलिस का संपर्क भी रहता है। -पूनम, एसपी
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दो साल पहले सूचना तंत्र मजबूत करने के लिए पुलिस ने गांवों में मित्र बनाए थे। यह उसी तर्ज पर थे, जैसे पहले चौकीदार पुलिस को सूचनाएं देते थे। पुलिस की मंशा थी कि इन मित्रों से कहीं भी होने वाली चोरी, लूट, तस्करी समेत अन्य आपराधिक गतिविधियों की जानकारी मिलेगी। जनता से सीधा और बेहतर संवाद बनेगा। छोटी-छोटी बातों को लेकर होने वाले बड़े झगड़े रोकने में मदद मिलेगी। तत्कालीन डीजीपी सुलखान सिंह के आदेश पर लखीमपुर खीरी में भी उस समय 4000 पुलिस मित्र बने थे। प्रत्येक थाने पर इनका एक रजिस्टर भी बनाया गया। उसमें पुलिस मित्रों के नाम-पते और व्यवसाय लिखा रहता था। इनको आई कार्ड भी दिए गए। थाना स्तर पर उस समय पुलिस ने इनके साथ एक-दो बैठकें भी की। इसके परिणाम भी अच्छे मिलने लगे थे। काम का दबाव कहें या लापरवाही, पुलिस ने बाद में इनकी बैठकें करना बंद कर दिया। अफसरों ने भी ध्यान नहीं दिया। न ही बैठकों की समीक्षा की। इससे कम्यूनिटी पुलिसिंग की योजना परवान नहीं चढ़ी। नतीजा, पुलिस मित्रों से सूचनाएं मिलनी बंद हो गईं।
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जनता से संवाद के लिए पुलिस मित्रों की मीटिंग जरूरी है। इस बात की समीक्षा की जाएगी कि पुलिस मित्रों की क्या भूमिका है। वैसे शहर और गांव के संभ्रांत नागरिकों की सूची बनी है। इनसे पुलिस का संपर्क भी रहता है। -पूनम, एसपी
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