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जो अपराधी है वहीं पुलिस और एजेंसियों का मुखबिर
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लखीमपुर खीरी। सीमा सुरक्षा से जुड़ी एजेंसियां हों या फिर पुलिस महकमा। अपराधों और अपराधियों पर अंकुश लगाने के लिए वह अपना मुखबिर तंत्र बनाते हैं। इनमें अधिकतर अपराधी ही होते हैं। वह मुखबिरी करते हैं और कार्यखास बनकर अपने काले कारनामों को बखूबी अंजाम देने से भी नहीं चूकते। इस बात की पुष्टि टेरर फंडिंग मामले में सामने आए मुमताज से होती है। मगर मुमताज जैसे लोग मुखबिरी के आड़ में देश विरोधी गतिविधियों से लेकर मादक पदार्थों तक की तस्करी में लिप्त हैं।
भारत-नेपाल सीमा खुली होने के कारण काफी संवेदनशील है। करीब दो दशक पहले देश विरोधी ताकतों और सीमा से होने वाली तस्करी को रोकने के लिए प्रदेश सरकार ने पुलिस का एक स्पेशल बल बनाई थी। उसे सीमा पुलिस का नाम देकर भारत-नेपाल सीमा पर तैनात किया था, लेकिन देश की आतंरिक सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए भारत सरकार ने सीमा की जिम्मेदारी एसएसबी (सशस्त्र सीमा बल) के हाथों में सौंप दी थी। एसएसबी के सीमा पर आने के बाद काफी हद तक तस्करी और देश विरोधी गतिविधियों पर अंकुश लगा, लेकिन कुछ दिनों तक सुधरा सिस्टम एक बार फिर बेहाल हो चला।
आमतौर पर पुलिस हो या फिर अन्य सुरक्षा एजेंसियां अपराधों को रोकने के लिए वह अपने मुखबिर बनाती हैं। मुखबिर कोई आम व्यक्ति नहीं बल्कि अधिकतर अपराधी ही होता है। छोटे-मोटे मामलों की मुखबिरी कर खास बन जाता है। फिर बड़े मामलों में खेल करवाकर अपराधिक गतिविधियां करता है। मुखबिर होने के कारण पुलिस भी उस पर कोई खास शक नहीं करती है। तीन दिन पहले टेरर फंडिंग मामले में डांगा निवासी मुमताज के सामने आने के बाद इस बात की पुष्टि हुई है। सूत्रों के मुताबिक मुमताज के तस्करों के साथ ही पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों से अच्छे ताल्लुक थे। वह सीमा पर खाद, आलू-प्याज सहित छोटी-मोटी चीजों की तस्करी की मुखबिरी करता था। इसलिए वह पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों का खास था। ऐसे कई मुमताज बसही (संपूर्णानगर बॉर्डर), पलिया, गौरीफंटा, तिकुनियां, सुथना बरसोला, खमरिया, गंगानगर, डांगा आदि गांवों में हैं, जो पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के कार्य खास हैं। जो मुखबिरी की आड़ में तस्करी समेत अन्य अवैध धंधों को बखूबी चला रहे हैं।
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भारत-नेपाल सीमा खुली होने के कारण काफी संवेदनशील है। करीब दो दशक पहले देश विरोधी ताकतों और सीमा से होने वाली तस्करी को रोकने के लिए प्रदेश सरकार ने पुलिस का एक स्पेशल बल बनाई थी। उसे सीमा पुलिस का नाम देकर भारत-नेपाल सीमा पर तैनात किया था, लेकिन देश की आतंरिक सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए भारत सरकार ने सीमा की जिम्मेदारी एसएसबी (सशस्त्र सीमा बल) के हाथों में सौंप दी थी। एसएसबी के सीमा पर आने के बाद काफी हद तक तस्करी और देश विरोधी गतिविधियों पर अंकुश लगा, लेकिन कुछ दिनों तक सुधरा सिस्टम एक बार फिर बेहाल हो चला।
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आमतौर पर पुलिस हो या फिर अन्य सुरक्षा एजेंसियां अपराधों को रोकने के लिए वह अपने मुखबिर बनाती हैं। मुखबिर कोई आम व्यक्ति नहीं बल्कि अधिकतर अपराधी ही होता है। छोटे-मोटे मामलों की मुखबिरी कर खास बन जाता है। फिर बड़े मामलों में खेल करवाकर अपराधिक गतिविधियां करता है। मुखबिर होने के कारण पुलिस भी उस पर कोई खास शक नहीं करती है। तीन दिन पहले टेरर फंडिंग मामले में डांगा निवासी मुमताज के सामने आने के बाद इस बात की पुष्टि हुई है। सूत्रों के मुताबिक मुमताज के तस्करों के साथ ही पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों से अच्छे ताल्लुक थे। वह सीमा पर खाद, आलू-प्याज सहित छोटी-मोटी चीजों की तस्करी की मुखबिरी करता था। इसलिए वह पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों का खास था। ऐसे कई मुमताज बसही (संपूर्णानगर बॉर्डर), पलिया, गौरीफंटा, तिकुनियां, सुथना बरसोला, खमरिया, गंगानगर, डांगा आदि गांवों में हैं, जो पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के कार्य खास हैं। जो मुखबिरी की आड़ में तस्करी समेत अन्य अवैध धंधों को बखूबी चला रहे हैं।
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