फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lakhimpur Kheri News ›   artificial nests lived Sparrow No

कृत्रिम घोंसलों को नहीं अपना रहीं गौरैया

Wed, 08 Jun 2016 11:28 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो लखीमपुर खीरी।
अमर उजाला ब्यूरो लखीमपुर खीरी। Updated Wed, 08 Jun 2016 11:28 PM IST
विज्ञापन
artificial nests lived Sparrow No
गौरैया - फोटो : demo pic
आपसी सहयोग से बनवाए गए थे हजारों घोंसले
विज्ञापन

मुख्यमंत्री की पहल पर मार्च, अप्रैल में गौरैया संरक्षण के लिए वन विभाग की ओर से इस बार एक अभिनव प्रयोग किया गया था। यह प्रयोग पूरी तरह फ्लाप साबित हुआ। 
एक अध्ययन में यह पाया गया था कि भवनों की आधुनिक निर्माण शैली और आबादी क्षेत्र में पेड़ों के कमी होने से गौरैयों के घोंसले बनाने के अनुकूल जगह की कमी हो रही है। इससे गौरैया की आबादी में कमी आ रही है। गौरैयों को उपयुक्त घर देने के लिए वन विभाग ने लकड़ी के घोंसले जगह-जगह स्थापित करने की योजना बनाई थी। हजारों की संख्या में घोंसले बनाकर लगाए भी गए लेकिन गौरैया ने इन्हें नहीं अपनाया। 
विज्ञापन

गौरैया संरक्षण अभियान के तहत वन विभाग ने हजारों की संख्या में लकड़ी के कृत्रिम घोंसले बनवाकर घरों और दफ्तरों में लगवाए थे, लेकिन इन घोंसलों को गौरैया ने  नहीं अपनाया। हालांकि इस अभियान में वन विभाग और पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाली स्वयंसेवी संस्थाओं ने काफी उत्साह दिखाया था। इन घोंसलों के गौरैया के न अपनाने से लोगों का उत्साह और कोशिशों पर पानी फिर गया। 
विज्ञापन
विज्ञापन

लोगों के सहयोग से दक्षिण खीरी वन प्रभाग और उत्तर खीरी वन प्रभाग ने एक-एक हजार प्लाईवुड के घोंसले बनवाए थे। इसके अलावा जिला प्रशासन की ओर से भी करीब एक हजार घोंसले और स्वयंसेवी संस्थाओं ने अपने स्तर से एक हजार घोंसले बनाकर स्कूली बच्चों, आम नागरिकों को वितरित किए। सरकारी दफ्तरों में भी यह घोंसले लगाए गए। स्कूली बच्चों और नागरिकों ने भी अपने घरों में यह घोंसले लगाए। 
लोग इंतजार करते रहे कि गौरैया इन घोंसलों में आएंगी और इसमें अंडे देंगी लेकिन एक भी घोंसला गौरैया से आबाद न हो सका। लोग अब तक इंतजार कर रहे हैं। गौरैया हैं कि इन कृत्रिम घोंसलों को किसी भी तरह अपनाने को तैयार नहीं हैं।  
वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि गौरैयों के नेस्ट बाक्स बनाने के लिए शासन से कोई बजट नहीं मिला था। सभी नेस्ट बाक्स आपसी सहयोग से बनाए गए थे। यह बात सही है कि गौरैया ने कृत्रिम घोंसले नहीं अपनाए है। यह बात सर्वे में स्पष्ट हो चुकी है। 

इस बाबत राज्य वन्यजीव सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य और पर्यावरणविद् डॉ. वीपी सिंह का कहना है कि गौरैया कृत्रिम घोंसले को कभी नहीं अपनाएंगी। इस बात की पहले ही आशंका थी। यह प्रयोग पूरी तरह विफल हुआ है। इतना जरूर हुआ कि लोगों में गौरैया संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ी है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed